विवेक कौल | मोदी क्यों चाहते हैं कि आप सोना खरीदना बंद करें

विवेक कौल का न्यूज लॉंड्री में प्रकाशित लेख उस असली आर्थिक संकट की परतें उधेड़ता है जिसे सरकार सीधे शब्दों में कहने से बच रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में अपील की कि देशवासी एक साल तक सोने के गहने न खरीदें, विदेश यात्राएँ कम करें, और पेट्रोल-डीज़ल बचाने के लिए मेट्रो व कारपूलिंग अपनाएँ. लेकिन यह अपील महज़ एक नैतिक संदेश नहीं है. इसके पीछे भारत का गहराता डॉलर संकट है.

भारत अपनी ज़रूरत का लगभग सारा सोना आयात करता है और यह आयात डॉलर में होता है. 2025-26 में भारत ने 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया, जो दो साल पहले की तुलना में 58 प्रतिशत अधिक था. इसी तरह विदेश यात्राएँ और अंतरराष्ट्रीय शादियाँ भी डॉलर की माँग बढ़ाती हैं. समस्या यह है कि एक तरफ डॉलर की माँग बढ़ रही है, और दूसरी तरफ उनकी आपूर्ति सिकुड़ रही है. विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से पैसा निकाल रहे हैं, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उन स्तरों से कहीं नीचे है जो 2019-20 में था, और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की वजह से वहाँ से आने वाले प्रेषण भी प्रभावित हो रहे हैं.

सबसे बड़ा झटका तेल की कीमतों से आया है. फरवरी 2026 में कच्चे तेल की कीमत 69 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मई 2026 तक 109 डॉलर प्रति बैरल हो गई. यानी 58 प्रतिशत की छलाँग. भारत अपनी 89 प्रतिशत कच्चे तेल की ज़रूरत आयात से पूरा करता है. इसका मतलब है कि डॉलर की खपत और बढ़ेगी, और रुपया कमज़ोर होता रहेगा. फरवरी के अंत से अब तक रुपया 5 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है.

इस दबाव को संभालने के लिए आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेच रहा है, लेकिन भंडार भी तेज़ी से घट रहा है. फरवरी 2026 के 728.5 अरब डॉलर से गिरकर मई की शुरुआत में 690.7 अरब डॉलर पर आ गया. आयात कवर भी 9 महीने से घटकर 8.7 महीने पर आ गया है और आगे और गिरने की आशंका है. खाद की कीमतें दो महीनों में 81 प्रतिशत बढ़ी हैं, सरकारी सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है, पेट्रोल-डीज़ल पर तेल कंपनियाँ प्रतिदिन 1,000 करोड़ रुपये का घाटा उठा रही हैं, और सरकार का राजकोषीय घाटा भी बढ़ने की राह पर है.

कौल का तर्क है कि सरकार फिलहाल "नैतिक दबाव" की रणनीति अपना रही है. यानी नियमों की बजाय अपीलों और देशभक्ति की भावना के ज़रिये लोगों का व्यवहार बदलने की कोशिश. लेकिन यह तरकीब सीमित समय तक ही काम करती है. आगे पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ाने होंगे, ब्याज दरें बढ़ सकती हैं जिससे ईएमआई महँगी होगी, महँगाई बढ़ेगी, और आर्थिक विकास की रफ़्तार धीमी पड़ेगी. दीर्घकालिक समाधान के लिए भारत को चीन पर व्यापारिक निर्भरता कम करनी होगी. जहाँ व्यापार घाटा 2025-26 में 112 अरब डॉलर तक पहुँच गया और ईरान के साथ संबंध सुधारने होंगे, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य अब पहले जैसा खुला नहीं रहेगा.

यह लेख इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह उस असली तस्वीर को सामने रखता है जिसे सरकारी बयानबाज़ी अक्सर छुपाती है. मोदी की अपील सुनने में सरल लगती है, लेकिन उसके पीछे एक बहुत जटिल और गंभीर आर्थिक संकट है. यह लेख आम नागरिक को समझाता है कि सोना, पेट्रोल, उर्वरक, रुपये की गिरावट और पश्चिम एशिया का युद्ध  ये सब एक ही बड़ी कहानी के टुकड़े हैं. और अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके असर को "मैनेज" करना क्रमशः मुश्किल होता जाएगा.

Previous
Previous

अदाणी पर मुकदमा वापस लेने की तैयारी में अमेरिकी न्याय विभाग - ट्रंप के वकील की दखल और 10 अरब डॉलर का 'लालच'

Next
Next

मणिपुर में तीन आदिवासी चर्च नेताओं की हत्या, कुकी और नागा समुदाय के 38 से अधिक लोगों को बंधक बनाया