कश्मीर में वीपीएन बैन: सुरक्षा के नाम पर डिजिटल रोज़गार पर चोट
जम्मू-कश्मीर में वीपीएनपर लगाया गया प्रतिबंध अब केवल “सुरक्षा उपाय” भर नहीं रह गया है. इसका असर सीधे उन युवाओं की ज़िंदगी पर पड़ रहा है, जिनकी रोज़ी-रोटी इंटरनेट और रिमोट काम पर टिकी हुई है. श्रीनगर, शोपियां, कुलगाम, पुलवामा समेत नौ जिलों में दिसंबर 2025 के अंत में लागू किए गए इस प्रतिबंध ने पत्रकारों, आईटी कर्मचारियों और फ्रीलांसरों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है.
प्रशासन का दावा है किवीपीएन का इस्तेमाल “अफवाह फैलाने” और “अशांति भड़काने” के लिए किया जा रहा था. लेकिन ज़मीनी तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है. जिन लोगों के लिए वीपीएन पेशेवर आवश्यकता था, वे अचानक संदेह के घेरे में आ गए हैं.
श्रीनगर की 28 वर्षीय एक स्वतंत्र पत्रकार बताती हैं कि वीपीएन उनके लिए केवल तकनीकी सुविधा नहीं बल्कि सुरक्षा कवच था. अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग करते हुए वह एन्क्रिप्टेड संचार और सुरक्षित डेटा ट्रांसफर के लिए वीपीएन का इस्तेमाल करती थीं. प्रतिबंध के बाद उनके दो असाइनमेंट रुक गए और लगभग 10 हजार रुपये का नुकसान हुआ.
उनके शब्दों में, “वीपीएन के बिना संवेदनशील रिपोर्टिंग करना जोखिम भरा हो गया है.”
इसी तरह शोपियां के एक आईटी कर्मचारी, जो बेंगलुरु स्थित कंपनी के लिए घर से काम करते हैं, अब अपने दफ्तर के सर्वर तक सुरक्षित तरीके से पहुंच ही नहीं पा रहे. उनका कहना है कि वीपीएन के बिना कंपनी के सुरक्षा प्रोटोकॉल पूरे नहीं हो सकते. उन्हें डर है कि अगर स्थिति लंबी चली तो नौकरी बचाना मुश्किल हो जाएगा.
कश्मीर में यह संकट इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां बेरोज़गारी पहले से ही राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में शहरी युवाओं के बीच बेरोज़गारी दर 30 प्रतिशत से अधिक रही है. निजी उद्योगों की कमी और सरकारी भर्तियों में देरी के कारण बड़ी संख्या में युवा ऑनलाइन फ्रीलांसिंग और रिमोट नौकरियों पर निर्भर हो चुके हैं. ऐसे में वीपीएन प्रतिबंध सीधे उनकी आय और भविष्य को प्रभावित कर रहा है.
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू सिर्फ इंटरनेट प्रतिबंध नहीं बल्कि उसके बाद शुरू हुई निगरानी प्रक्रिया है. कई जिलों में पुलिस द्वारा सड़कों और बाज़ारों में लोगों के मोबाइल फोन चेक करने की खबरें सामने आई हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनसे फोन अनलॉक करवाकर न केवल वीपीएन ऐप्स देखे गए बल्कि निजी फोटो और इंटरनेट गतिविधियां भी खंगाली गईं.
यहीं से यह मामला सुरक्षा बनाम निजता की बहस में बदल जाता है.
सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2017 के पुट्टस्वामी फैसले में निजता को मौलिक अधिकार घोषित कर चुका है. वहीं 2020 के अनुराधा भसीन मामले में अदालत ने इंटरनेट तक पहुंच को अभिव्यक्ति और पेशे की स्वतंत्रता से जोड़ा था. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रकार का प्रतिबंध “अस्थायी, तार्किक और समीक्षा योग्य” होना चाहिए.
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या व्यापक स्तर पर वीपीएन प्रतिबंध और मोबाइल फोन की जांच संवैधानिक सीमाओं के भीतर है? या फिर सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं का दायरा लगातार सिकुड़ता जा रहा है?
कश्मीर के युवाओं के लिए यह बहस केवल सिद्धांत की नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की है. किसी के लिए यह नौकरी का सवाल है, किसी के लिए पत्रकारिता का, और किसी के लिए अपने निजी जीवन की सुरक्षा का.
सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा होती है. लेकिन जब नागरिक खुद को हर समय संदेह और निगरानी के दायरे में महसूस करने लगें, तब यह सवाल और भी जरूरी हो जाता है कि आखिर लोकतंत्र में “सुरक्षा” की सीमा कहां खत्म होती है और “अधिकार” कहां से शुरू होते हैं।
आर्टिकल 14 की इस रिपोर्ट में लेखक का नाम उजागर नहीं किया गया है. पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.

