हर 36 मिनट में एक मौत. भारत का मानसिक स्वास्थ्य संकट कितना गहरा है?
‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, भारत में मानसिक बीमारी अब सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रही. यह एक ऐसा सामाजिक संकट बन चुकी है जो हर 36 मिनट में एक जान ले रहा है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि बीते साल मानसिक बीमारी से जुड़ी आत्महत्याओं के 14,305 मामले दर्ज किए गए. यानी साल भर में हर दिन लगभग 39 लोग और हर 36 मिनट में एक व्यक्ति ने मानसिक पीड़ा के कारण अपनी जान गंवाई.
यह आँकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है. इसके पीछे टूटते परिवार, अकेलेपन से जूझते युवा, आर्थिक दबाव में दबे कामकाजी लोग और मदद न मिलने की त्रासदी छिपी हुई है. रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि कर्नाटक इस सूची में सबसे ऊपर है और बेंगलुरु देश का वह शहर बन गया है जहाँ मानसिक बीमारी से जुड़ी आत्महत्याएँ सबसे अधिक दर्ज हुईं.
कर्नाटक में 2024 के दौरान ऐसे 2,465 मामले सामने आए. यह पूरे देश के कुल मामलों का लगभग 17 प्रतिशत है. इनमें 1,644 पुरुष और 821 महिलाएँ थीं. अकेले बेंगलुरु में 455 लोगों ने मानसिक बीमारी के कारण आत्महत्या की. तुलना करें तो दिल्ली में यह संख्या 78, मुंबई में 85 और चेन्नई में 52 रही. यानी बेंगलुरु बाकी महानगरों से बहुत आगे दिखाई देता है.
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर देश की तकनीकी राजधानी और “भारत के सबसे आधुनिक शहर” की छवि रखने वाला बेंगलुरु इस संकट का केंद्र क्यों बन रहा है. तेज़ रफ्तार दफ्तर संस्कृति, अकेलापन, महँगा जीवन, नौकरी का दबाव और सामाजिक टूटन इसके पीछे के कारण हो सकते हैं. लेकिन सरकारी आँकड़े कारणों की व्याख्या नहीं करते. वे सिर्फ यह दिखाते हैं कि संकट कितना गहरा है.
रिपोर्ट बताती है कि 18 से 45 वर्ष की उम्र के लोग सबसे अधिक प्रभावित हुए. 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग में 4,258 मौतें दर्ज हुईं जबकि 30 से 45 वर्ष आयु वर्ग में यह संख्या 4,375 रही. यानी कुल मौतों का लगभग 60 प्रतिशत उन लोगों का है जिन्हें समाज सबसे उत्पादक उम्र मानता है. नौकरी, परिवार, भविष्य, रिश्ते और आर्थिक जिम्मेदारियों का दबाव मानसिक स्वास्थ्य को किस हद तक प्रभावित कर रहा है, यह आँकड़े साफ दिखाते हैं.
लेकिन संकट सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है. 45 से 60 वर्ष आयु वर्ग में 3,008 और 60 वर्ष से ऊपर के लोगों में 1,820 मौतें दर्ज हुईं. सबसे भयावह तथ्य यह है कि 18 वर्ष से कम उम्र के 844 बच्चों ने भी मानसिक बीमारी के कारण आत्महत्या की. यानी लगभग हर 10 घंटे में एक बच्चा मानसिक पीड़ा के कारण अपनी जान गंवा रहा था.
यह स्थिति भारत की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता को भी उजागर करती है. देश में प्रति एक लाख आबादी पर मनोचिकित्सकों की संख्या बेहद कम है. छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर हैं. दूसरी ओर मानसिक बीमारी को लेकर सामाजिक कलंक इतना गहरा है कि लोग मदद लेने से डरते हैं. परिवार अक्सर अवसाद, चिंता या मानसिक तनाव को कमजोरी या नाटक समझते हैं.
दक्षिण भारत के आँकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं. राष्ट्रीय आत्महत्या दर जहाँ 12.2 प्रति लाख आबादी है, वहीं केरल में यह दर 30.2, तेलंगाना में 28.6, तमिलनाडु में 25.9 और कर्नाटक में 19.3 रही. यानी दक्षिण भारत लगातार राष्ट्रीय औसत से कहीं ऊपर बना हुआ है.
लिंग आधारित आँकड़े भी गंभीर संकेत देते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर पुरुषों की संख्या महिलाओं से लगभग दोगुनी रही. लेकिन बेंगलुरु में 162 महिलाओं की आत्महत्या दर्ज हुई, जो देश के किसी भी शहर में सबसे अधिक है. यह बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट महिलाओं के बीच भी तेजी से गहराता जा रहा है.
सरकारें अक्सर जागरूकता अभियान चलाने और सहायता क्रमांक शुरू करने की बात करती हैं. लेकिन 14,305 मौतें बताती हैं कि केवल घोषणाएँ काफी नहीं हैं. मानसिक स्वास्थ्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के केंद्र में लाने की जरूरत है. स्कूलों, महाविद्यालयों और कार्यस्थलों में पेशेवर परामर्श को अनिवार्य बनाना होगा. मानसिक बीमारी को शर्म नहीं बल्कि इलाज की जरूरत समझना होगा.
क्योंकि हर 36 मिनट में रुकती एक जिंदगी सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं होती. वह इस बात का प्रमाण होती है कि समाज किसी को समय रहते सुन नहीं पाया.

