राहुल देव | इतने कई दशकों में हिंदुत्व ढांचे को इससे बड़ी चुनौती नहीं मिली है, जितनी मंदिर से जुड़े इन खुलासों से मिली है.
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव से राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े हालिया विवादों, चंदे और दान के प्रबंधन पर उठे सवालों, संघ-भाजपा की भूमिका और लोकतंत्र में जवाबदेही के संकट पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा का केंद्र केवल अयोध्या में सामने आए कथित वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन तक पहुंचा जिसने पिछले चार दशकों में भारत की राजनीति की दिशा बदल दी.
राहुल देव ने अपने पत्रकारिता अनुभव का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने 1984 में राम मंदिर आंदोलन की शुरुआती गतिविधियों को करीब से देखा था. उनके अनुसार राम भारतीय समाज की गहरी आस्था का विषय रहे हैं, लेकिन जिस तरीके से मंदिर आंदोलन आगे बढ़ा, उसने धार्मिक भावना को राजनीतिक परियोजना में बदल दिया. उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति की धुरी को बदल दिया और भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व राजनीतिक लाभ पहुंचाया. हालांकि, इसकी कीमत समाज ने सांप्रदायिक तनाव, हिंसा और सामाजिक विभाजन के रूप में चुकाई.
बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा राम मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन और हाल में सामने आए आरोपों पर केंद्रित रहा. निधीश त्यागी ने सवाल उठाया कि यदि चंदे, जमीन और खातों से जुड़े विवाद सामने आ रहे हैं तो इसकी जवाबदेही किसकी है. राहुल देव का तर्क था कि केवल ट्रस्ट के पदाधिकारियों तक जिम्मेदारी सीमित नहीं की जा सकती. उनके अनुसार यह परियोजना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में आगे बढ़ी और इसके राजनीतिक संरक्षक भी स्पष्ट रूप से सामने रहे हैं. इसलिए जवाबदेही का दायरा भी व्यापक होना चाहिए.
चर्चा में यह सवाल भी उठा कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई के मामलों में जिस कठोरता का प्रदर्शन किया जाता है, वही कठोरता राम मंदिर से जुड़े आरोपों की जांच में क्यों दिखाई नहीं देती. राहुल देव ने इसे दोहरे मानदंडों का उदाहरण बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बच सकती है जब कानून सभी पर समान रूप से लागू हो.
मीडिया की भूमिका पर भी दोनों ने गंभीर चिंता व्यक्त की. राहुल देव का कहना था कि मुख्यधारा का बड़ा हिस्सा सत्ता के प्रति आलोचनात्मक भूमिका निभाने के बजाय उसके साथ खड़ा दिखाई देता है. ऐसे समय में स्वतंत्र डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, जहां अब भी असुविधाजनक सवाल पूछे जा सकते हैं.
चर्चा का निष्कर्ष लोकतंत्र और समाज के भविष्य को लेकर चिंता के साथ सामने आया. राहुल देव ने कहा कि जब नागरिकों को जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय के रास्ते कमजोर होते दिखाई देते हैं, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी होती है. उनके अनुसार राम मंदिर विवाद केवल एक धार्मिक स्थल या ट्रस्ट का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बड़े प्रश्न से जुड़ा है कि लोकतंत्र में सत्ता, आस्था और जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए.पूरी बातचीत यहाँ देख सकते हैं.

