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विनोद कुमार शुक्ल का जाना और हमारे भीतर खुलता हुआ सन्नाटा #harkara

‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.

विनोद कुमार शुक्ल का जाना हिंदी साहित्य के लिए सिर्फ एक लेखक का जाना नहीं है, बल्कि एक पूरी संवेदना, एक पूरी दृष्टि का खो जाना है. इस बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मधुकर उपाध्याय, विनोद कुमार शुक्ल को एक व्यक्ति, एक रचनाकार और एक अनुभव के रूप में याद करते हैं.

विनोद कुमार शुक्ल को किसी परिभाषा, विशेषण या खांचे में बांधना मुश्किल है. उनकी कविताएं, कहानियां और उपन्यास समय, स्थान और विचारधाराओं की सीमाओं से बाहर जाकर पाठक को भीतर की उन जगहों तक ले जाते हैं, जिन्हें हम अक्सर भूल चुके होते हैं. उनका लेखन उपदेश नहीं देता, बल्कि साथ चलकर देखने और महसूस करने का अनुभव देता है.

यह बातचीत विनोद कुमार शुक्ल के लेखन के शिल्प, उनकी बालसुलभ दृष्टि, उनकी चुप्पियों, उनके विराम और उनकी उस मानवीय उपस्थिति पर है, जो उन्हें पढ़ते हुए आज भी जीवित महसूस होती है. यह स्मृति नहीं, एक साझा यात्रा है.

अपील :

आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.

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