डरपोक मीडिया नहीं बताता; ‘मोदी ने देश “बदलने के लिए 10 साल” मांगे थे, पर आर्थिक मोर्चे पर वह विफल’
‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में संजय बारू ने लिखा है कि बारह वर्ष पहले अपनी शानदार चुनावी जीत के बाद, नरेंद्र मोदी ने देश को "बदलने के लिए 10 साल" मांगे थे. आज सरकार की बारहवीं वर्षगांठ पर यह साफ है कि वे भारत को राजनीतिक रूप से बदलने में तो सफल रहे, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर विफल रहे हैं. राजनीतिक और नीति विश्लेषकों के बीच अब यह आम सहमति है कि प्रधानमंत्री अपनी राजनीतिक सफलता को आर्थिक प्रदर्शन में तब्दील नहीं कर पाए. बारू के अंग्रेजी के इस लंबे लेख के हिंदी में अनुदित अंश इस प्रकार हैं:
आर्थिक मोर्चे पर इस नाकामी के लिए अलग-अलग तर्क दिए जाते हैं. अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला और प्रधानमंत्री के कई वफादार इसके लिए 'डीप स्टेट' या प्रशासनिक ढांचे (नौकरशाही) को जिम्मेदार ठहराते हैं. उनका मानना है कि वास्तविक बाधा 'स्टील फ्रेम' में लगी जंग है.
दूसरी ओर, कुछ विश्लेषक भाजपा की अंतर्मुखी 'स्वदेशी' सोच और 'आत्मनिर्भरता' व 'मेक इन इंडिया' की विरोधाभासी व्याख्याओं से उपजे भ्रम को दोषी मानते हैं. कुछ लोग नीतियों के क्रियान्वयन में कमी के लिए कैबिनेट मंत्रियों की अक्षमता को कोसते हैं. दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस काल में मंत्रियों के मतभेद (जैसे प्रणब मुखर्जी और पी. चिदंबरम के बीच) मीडिया में खुलकर सामने आते थे, लेकिन वर्तमान मंत्रिपरिषद के आंतरिक मतभेद जगजाहिर होने के बावजूद आज का मीडिया इन्हें रिपोर्ट नहीं करता.
राजनीतिक अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर का दृष्टिकोण इस विषय में बिल्कुल अलग है. वे इसके लिए नौकरशाही को नहीं, बल्कि सीधे राजनीतिक स्तर पर प्रबंधकीय 'अक्षमता' को जिम्मेदार मानते हैं. नोटबंदी का तरीका, कोविड के दौरान रातों-रात लगा लॉकडाउन, कृषि व भूमि कानून और विदेशी निवेश नीतियां इसके उदाहरण हैं.
यहाँ प्रबंधन का प्रसिद्ध 'पीटर का सिद्धांत' लागू होता दिखाई देता है—"कर्मचारी अपने पूर्व पदों की सफलता के आधार पर तब तक प्रमोट होते हैं, जब तक कि वे एक ऐसे पद पर न पहुँच जाएं जहाँ वे अक्षम साबित हों." चुनाव जीतना एक कला है, लेकिन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को लंबे समय तक संभालना बिल्कुल अलग बात है. यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरू भी अपने शुरुआती सफल दशक (1947-57) के बाद गलतियाँ करने लगे थे. आज यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या प्रशासनिक और आर्थिक मोर्चों पर मोदी सरकार के 'घटते प्रतिफल' का दौर शुरू हो चुका है?
2014 में भारत को बदलने के वादे का वास्तविक ध्यान देश को 'हिंदू बहुसंख्यक राजनीति' में ढालने पर था. दक्षिण भारत को छोड़कर, वे इस उद्देश्य में काफी हद तक सफल रहे हैं. हालांकि, सार्वजनिक जीवन में धार्मिक पूर्वाग्रहों के घालमेल से पैदा हुए सामाजिक तनाव ने व्यापारिक जगत की 'एनिमल स्पिरिट्स' (उत्साह और जोखिम लेने की क्षमता) को भारी नुकसान पहुँचाया है. राजनीतिक दिशा को लेकर घरेलू और विदेशी निवेशकों में पैदा हुए डर और चिंता ने उन्हें जोखिम लेने से पीछे धकेल दिया है. पूंजी का पलायन और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) में गिरावट इसी राजनीतिक माहौल का नतीजा हैं.
अर्थशास्त्री अक्सर व्यापारिक निर्णयों पर राजनीतिक प्रबंधन के प्रभाव को नजरअंदाज करते हैं. 1990-91 का भुगतान संतुलन संकट इसका सटीक उदाहरण है, जहाँ वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर सरकारों की अनिर्णायक नीतियों के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगा गया था, जिसे बाद में पी.वी. नरसिम्हा राव के साहसिक फैसलों ने बहाल किया. इसके विपरीत, 2004 में वाजपेयी सरकार की हार के बाद उपजी बाजार की अस्थिरता को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के त्वरित आर्थिक आश्वासनों ने शांत कर दिया था. दोनों ही मामलों में नेतृत्व की साख ने बड़ा अंतर पैदा किया था.
आज स्थिति फिर वैसी ही है, लेकिन अंतर यह है कि आज का मीडिया डरपोक हो चुका है और व्यापारिक वर्ग भयभीत है, जिससे सरकार पर सुधारात्मक कदमों के लिए कोई दबाव नहीं बन पा रहा है. अच्छी खबरों का बढ़ा-चढ़ाकर जश्न मनाया जाता है और विफलताएं दबा दी जाती हैं. जब भारत तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर था, तब खूब ढोल बजाए गए, लेकिन आज जब वह छठे स्थान पर फिसल गया है, तो सब खामोश हैं. 2017 में घोषित '2020 तक 5 ट्रिलियन डॉलर' का लक्ष्य लगातार आगे खिसकाकर अब भुला दिया गया है और साल 2026 में हमारी अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास ही संघर्ष कर रही है.
1990 से 2025 तक भारत की औसत वार्षिक विकास दर लगभग 6% रही है. यदि हमें 2047 तक 'विकसित भारत' का लक्ष्य हासिल करना है, तो अगले दो दशकों तक 8% की निरंतर विकास दर की आवश्यकता होगी. सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो आर्थिक रफ्तार हमें 1990-2010 के बीच मिली थी, वह पिछले एक दशक में क्यों खो गई?
(संजय बारू पूर्व संपादक और लेखक है, जिनकी नवीनतम पुस्तक 'सेसेशन ऑफ द सक्सेसफुल: द फ्लाइट आउट ऑफ न्यू इंडिया' है)

