लोकतंत्र की अप्रत्याशित घर वापसी
131वें संविधान संशोधन विधेयक को हराने का विपक्ष का कदम महिला आरक्षण के बारे में बिल्कुल नहीं था. यह सशक्तिकरण की आड़ में सरकार को भारत के चुनावी मानचित्र को फिर से तैयार करने से रोकने के बारे में था.
17 अप्रैल, 2026 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण तारीखों में से एक के रूप में दर्ज किया जाएगा. इस दिन, विपक्षी दलों ने लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति उस खतरे के बारे में एक सामूहिक जागरूकता प्रदर्शित की, जो 2019 में नदारद थी—जब नागरिकता संशोधन विधेयक पारित किया गया था या जब अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था. इस बार, वे एक साथ खड़े हुए और संसद की संरचना और संगठन को बदलने के सरकार के प्रयास को विफल कर दिया.
भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए यह हार ज़रूरी थी. इसे न केवल सरकार की हार, बल्कि विपक्ष की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए. इसने विपक्ष में आत्मविश्वास बहाल किया है. जनता के बीच भी अब विपक्ष के नज़रिए को लेकर उत्सुकता बढ़ रही है. नागरिकों ने इस बार संसदीय बहसों को बहुत ध्यान से देखा और सुना. वे यह समझने के लिए "मुख्यधारा" के मीडिया से इतर देख रहे हैं कि सरकार कहाँ और कैसे धोखे का सहारा लेती है. ऐसा प्रतीत होता है कि जनता सरकार के इस दावे को स्वीकार करने वाली नहीं है कि वह केवल महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए कानून ला रही थी और उसे एक "स्त्री-द्वेषी" विपक्ष ने रोक दिया.
आज की जनता विपक्ष के इस तर्क को सुनने के लिए अधिक तैयार है: यदि सरकार विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर इतनी चिंतित है, तो उसने सितंबर 2023 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित महिला आरक्षण अधिनियम को अभी तक लागू क्यों नहीं किया? उसने 16 अप्रैल, 2026 तक—संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान की पूर्व संध्या तक—अधिनियम को अधिसूचित क्यों नहीं किया? क्या महिला आरक्षण को 543 सदस्यों की मौजूदा संख्या के भीतर लागू नहीं किया जा सकता? महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सदन का विस्तार क्यों आवश्यक है?
सिद्धार्थ वरदराजन जैसे टिप्पणीकारों ने सही गौर किया है कि सरकार का असली इरादा महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि विधायिकाओं में पुरुष वर्चस्व को बनाए रखना था. विपक्षी दलों ने भी सही आरोप लगाया है कि महिला सशक्तिकरण की बयानबाज़ी के पीछे छिपा असली मक़सद संसदीय सीटों का पुनर्वितरण है, जो गैर-हिंदी भाषी राज्यों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाएगा और हिंदी पट्टी के वर्चस्व को मज़बूत करेगा.
सरकार का खोखला बचाव
सरकार का बचाव दयनीय रूप से कमज़ोर है. उसका दावा है कि यदि विपक्ष सहमत होता, तो वह सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की एकसमान वृद्धि का प्रावधान जोड़ देती. यदि वास्तव में ऐसा था, तो जैसा कि विपक्षी दलों ने रेखांकित किया, यह विधेयक के मूल पाठ (टेक्स्ट) का हिस्सा क्यों नहीं था?
सरकार, मज़ेदार रूप से, इस बात से दुखी है कि विपक्ष इतना "असभ्य" है कि वह प्रधानमंत्री के आश्वासन पर भी विश्वास करने से इनकार करता है. ऐसा नहीं है कि सरकार ने यह दिखाया हो कि उस पर भरोसा किया जा सकता है; और सरकारें तथा अदालतें लिखित शब्दों पर चलती हैं, विश्वास या मौखिक आश्वासनों पर नहीं.
प्रियंका गांधी यह दावा करने में सही हैं कि इस प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. जो सरकार योजनाबद्ध तरीके से हर संवैधानिक प्रक्रिया को नष्ट करती है, वह भरोसे की मांग नहीं कर सकती. नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री सच बोलने में असमर्थ हैं. यहाँ तक कि सरकार के समर्थक भी स्वीकार करते हैं कि इसने खुद को झूठ और धोखे का उस्ताद साबित किया है—वे इस बात पर गर्व करते हैं कि इसके झूठ को लगातार सच के रूप में स्वीकार किया गया है. वे इसे "चतुराई" कहते हैं.
जनता इन झूठों को क्यों स्वीकार करती है? मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि मीडिया उन्हें स्थापित तथ्य के रूप में प्रसारित करता है. अब भी, मीडिया ने यह दावा करते हुए शोर मचाया कि विपक्ष ने महिला आरक्षण विधेयक को "गिरा" दिया है. यह झूठ है. सच तो यह है कि विपक्ष ने महिला आरक्षण के बहाने संसद और राज्य विधानसभाओं की संरचना और ढांचे को बदलने के सरकार के प्रयास को विफल कर दिया. यदि ऐसा नहीं है, तो निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को महिला आरक्षण से क्यों जोड़ा गया? उद्देश्य महिलाओं के लिए जगह बढ़ाना नहीं था, बल्कि भारत के चुनावी मानचित्र को फिर से तैयार करने के लिए उन्हें एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करना था. दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों के प्रतिनिधित्व को हाशिए पर डालने और उन्हें अप्रभावी बनाने की साज़िश को समझना मुश्किल नहीं है. हम पहले ही देख चुके हैं कि कैसे असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की प्रक्रिया का उपयोग मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अधिकारहीन करने के लिए किया गया था. महिलाओं को उनका हक देने के लिए परिसीमन क्यों आवश्यक है?
यह सबसे सरल सवाल है जो मीडिया को पूछना चाहिए, लेकिन वह चुप है. इसके बजाय, वह सरकारी दुष्प्रचार का ऐसा तूफ़ान खड़ा करता है कि लोग देख ही न सकें कि वास्तव में क्या किया जा रहा है. विश्लेषकों की एक जमात अब पूरे घटनाक्रम की व्याख्या नरेंद्र मोदी के एक और "मास्टरस्ट्रोक" के रूप में करने में व्यस्त है. इस टोली का दावा है कि सरकार जानती थी कि विधेयक गिर जाएगा, लेकिन फिर भी उसने इसे इसलिए पेश किया ताकि विपक्ष को महिला-विरोधी चित्रित किया जा सके. अब, वे कहते हैं, विपक्ष को इसे गलत साबित करना होगा.
यह तर्क खोखला है. सरकार इतनी दूरदर्शी नहीं है कि उसे पहले से पता हो कि वह इस बार विपक्ष को तोड़ने में असफल रहेगी. उसने कोशिश की. लेकिन बिहार, बंगाल और अन्य जगहों पर एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के सामूहिक अन्याय ने विपक्ष की सतर्कता को पहले ही बढ़ा दिया था. उन्होंने पहचान लिया है कि यह सरकार अपने स्थायित्व को सुनिश्चित करने के लिए हर उपलब्ध साधन का उपयोग करती है. यह लोकतांत्रिक सतर्कता ही थी जिसने विपक्ष को सरकार के चारे को स्वीकार करने से इनकार करने पर अडिग रखा.
संसद में हारने के बाद, सरकार अब सड़कों पर उतर आई है—जैसे कि वह खुद विपक्ष हो—महिला आरक्षण के लिए अभियान चलाने के लिए. एक ऐसा विधेयक जो 2023 में ही पारित हो गया था! एक निर्णायक हार की टीस को छिपाने के लिए, उसने पुराने हथकंडों का सहारा लिया है, लेकिन वे केवल इस एहसास को फैला रहे हैं कि नरेंद्र मोदी—जो खुद को अजेय पेश करते हैं—को वास्तव में हराया जा सकता है.
प्रधानमंत्री ने विधेयक की विफलता के लिए विपक्ष पर हमला करने के लिए दूरदर्शन पर राष्ट्र के नाम संबोधन की पवित्रता का उपयोग किया. मोदी ने विशेष रूप से कांग्रेस, तृणमूल और द्रमुक को निशाना बनाया—तीनों ही पार्टियाँ आगामी तमिलनाडु और बंगाल चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. यह सरकार अपनी ओछी और अनैतिक राजनीति के लिए जानी जाती है, लेकिन चुनावों की पूर्व संध्या पर ऐसा संबोधन अस्वीकार्य है. चुनाव आयोग को नोटिस जारी करना चाहिए था और मोदी को चुनाव प्रचार से रोकना चाहिए था. लेकिन हम जानते हैं कि चुनाव आयोग अब भाजपा की एक शाखा के रूप में कार्य करता है, जिसका उद्देश्य भाजपा की चुनावी हार को जीत में बदलना है.
यह देखना दिलचस्प होगा कि कितने अखबार और टेलीविजन चैनल प्रधानमंत्री के इस अनैतिक कृत्य की आलोचना करते हैं. इससे पता चलेगा कि इस देश में वास्तव में लोकतंत्र के अस्तित्व की किसे परवाह है.
चाहे मीडिया या किसी और को लोकतंत्र की परवाह हो या न हो, हमें—जनता को—होनी चाहिए. जिस तरह नोएडा और पानीपत के मज़दूर या ओडिशा के आदिवासी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, हमें अपनी लोकतांत्रिक आज़ादी की रक्षा के लिए विपक्ष के साथ एकजुट होना चाहिए. यह लोकतंत्र की घर वापसी का क्षण हो सकता है, या हम अपनी लापरवाही से इसे हमेशा के लिए खो सकते हैं. चुनाव हमारा है.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आलोचना लिखते हैं. यह लेख फ्रंटलाइन के ऑनलाइन संस्करण से साभार लिया गया.

