सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए मामलों में खराब दोषसिद्धि दर पर जताई चिंता, 94-98 प्रतिशत मुकदमों में आरोपी होते हैं बरी
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (यूएपीए) के तहत दर्ज मामलों में खराब दोषसिद्धि दर (कन्विकशन रेट) पर संज्ञान लिया और टिप्पणी की कि ऐसे 90 प्रतिशत से अधिक मुकदमों का अंत बरी होने (एक्विटल) के साथ होता है (सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम एनआईए, जम्मू).
‘बार एंड बेंच’ के अनुसार, न्यायामूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने एक नार्को-आतंकवाद मामले में मुकदमे की प्रतीक्षा में जून 2020 से जेल में बंद कुपवाड़ा के एक निवासी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की.
अदालत ने आधिकारिक अपराध आंकड़ों का हवाला देते हुए नोट किया कि 2019 और 2023 के बीच यूएपीए मामलों में अखिल भारतीय दोषसिद्धि दर 2-6 प्रतिशत थी, जिसका अर्थ है कि 94-98 प्रतिशत संभावना थी कि एक यूएपीए आरोपी को उसके मुकदमे के अंत में बरी कर दिया जाएगा.
अदालत ने कहा, "हमने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी ) के आंकड़े उद्धृत किए हैं. 2019 से 2023 तक के पांच वर्षों के लिए, अखिल भारतीय आंकड़े बताते हैं कि दोषसिद्धि की न्यूनतम दर 1.5% और अधिकतम 4% है, जबकि जम्मू-कश्मीर के मामले में, 2019 में दोषसिद्धि की दर शून्य थी, और अधिकतम 2022 में 0.89% थी। इसलिए, अखिल भारतीय आंकड़ों के लिए, हमारे पास 2% से 6% दोषसिद्धि है, जिसका अर्थ है कि देश में ऐसे मामलों में बरी होने की 94% से 98% संभावना है."
अदालत ने आगे नोट किया कि जम्मू-कश्मीर में वार्षिक दोषसिद्धि दर और भी कम थी, जो 1 प्रतिशत से नीचे थी. इसका मतलब यह हुआ कि एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 99 प्रतिशत संभावना थी कि ऐसा विचाराधीन (अंडरट्रायल) यूएपीए आरोपी मुकदमे के अंत में बरी हो सकता है.
अदालत ने टिप्पणी की, "जहाँ तक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का सवाल है, वार्षिक दोषसिद्धि दर हमेशा 1% से कम होती है. इसका मतलब है कि मुकदमे के अंत में, ऐसे मामलों में बरी होने की 99% संभावना होती है."
इसी फैसले में, अदालत ने दिल्ली दंगे के बड़े षड्यंत्र मामले में एक्टिविस्ट उमर खालिद और शारजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले अपनी ही एक अन्य पीठ (बेंच) के फैसले की टिप्पणियों की सत्यता पर भी सवाल उठाए हैं. दोनों यूएपीए के आरोपों में 2020 से जेल में बंद हैं. गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य के मामले में, सुप्रीम कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने उसी मामले में कुछ अन्य आरोपियों को जमानत देते हुए खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था.

