हॉर्मुज़ के ठप होने से वैश्विक आपूर्ति संकट के बीच भारत-चीन की तेल पर टक्कर, बढ़ सकती हैं कीमतें!  

‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ की रिपोर्ट है कि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के ठप पड़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा है. अमेरिका, ईरान और इज़राइल से जुड़े संघर्ष ने समुद्री रास्तों को बाधित कर दिया है, जिसके कारण लाखों बैरल कच्चा तेल फंस गया है. इस संकट ने दुनिया की दो सबसे बड़ी ऊर्जा खपत करने वाली अर्थव्यवस्थाओं भारत और चीन को सीधे टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया है. यह टकराव सीमाओं पर नहीं, बल्कि रूसी कच्चे तेल के लिए बाजार में हो रही प्रतिस्पर्धा में दिख रहा है.

रूस, जो पहले कम किमतों पर तेल बेच रहा था, अब इस संकट के घड़ी में सबसे अहम आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. भारत और चीन दोनों अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूसी तेल पर निर्भर होते जा रहे हैं. अप्रैल के आंकड़ों को देखें तो दोनों देशों ने लगभग 1.5 से 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रूसी तेल आयात किया, हालांकि यह मार्च के मुकाबले कम है जब भारत ने करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक आयात किया था.

आपूर्ति में यह गिरावट कई कारणों से हुई है, जिनमें लॉजिस्टिक बाधाएं, रूसी बंदरगाहों पर अवरोध और वैश्विक स्तर पर बढ़ती मांग शामिल हैं. हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल में भारी कमी आई है. चीन का आयात जहां पहले 4.45 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, वह घटकर करीब 2.22 लाख बैरल रह गया है. भारत का आयात भी फरवरी के 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन से गिरकर लगभग 2.47 लाख बैरल पर आ गया है.भारत की कुल खरीद मार्च के उच्च स्तर से लगभग 21 प्रतिशत गिर गई है, जिससे रिफाइनरियों को अपने स्रोतों में बदलाव करना पड़ा है.

इस स्थिति ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव बढ़ा दिया है. भारत के पास महज 30 दिन का तेल भंडार है, और अगर कीमतें ऊंची रहीं तो इसका असर जल्द ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दिख सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि कीमतें 25-28 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती हैं. इससे आम उपभोक्ता और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकते हैं. वहीँ चीन के पास फिलहाल कुछ राहत है क्योंकि उसने 3-4 महीने का भंडार जमा कर रखा है.

प्रतिस्पर्धा अब केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है. फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश भी रूसी तेल के लिए बाजार में उतर रहे हैं. इससे आपूर्ति और भी सीमित हो गई है और कीमतों पर दबाव बढ़ा है.

इस संकट के बीच भारत अपने स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. वेनेजुएला, ब्राज़ील और अफ्रीकी देशों से तेल खरीदकर कमी को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है. वहीं, सऊदी अरब और यूएई वैकल्पिक मार्गों के जरिए आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

हॉर्मुज़ संकट ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की नाजुकता को उजागर कर दिया है. आने वाले समय में भारत और चीन के बीच यह तेल प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

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