प्रेम पणिकर: विजय ने द्रविड़ राजनीति की जड़ों को हिला डाला
संपादक, पत्रकार प्रेम पणिकर ने सबस्टैक पर अपने पेज “स्मोक सिग्नल्स” पर तमिलनाडु के चुनाव नतीजों पर अंग्रेजी में लंबा लेख लिखा है. हम यहां हिंदी में लेख के संपादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं:
अगस्त 2025 में, जब मैंने अभिनेता विजय के राजनीतिक उभार पर एक लेख लिखा था, तब बहुत से लोगों को लगा था कि यह केवल फिल्मी चकाचौंध से प्रेरित एक अस्थायी लहर है. लेकिन हाल ही में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उस लेख को न केवल प्रासंगिक बना दिया, बल्कि उसे सोशल मीडिया पर एक नया जीवन दे दिया है.
मैंने उस लेख की शुरुआत प्रसिद्ध शोमैन पी.टी. बरनम के एक किस्से से की थी. जब उनके पास एक ऐसा 'एक्ट' लाया गया जहाँ एक व्यक्ति भीड़ के सामने जान देने वाला था, तो बरनम ने पूछा था—"शानदार, लेकिन इसके बाद आप 'एन्कोर' (अगले प्रदर्शन) में क्या करेंगे?" मदुरै रैली के बाद विजय के सामने भी यही यक्ष प्रश्न था. क्या वह अपनी शुरुआती सफलता और उम्मीदों के भारी बोझ को वोटों में बदल पाएंगे? राजनीति सिनेमा नहीं है, यहाँ गति (मोमेंटम) का जीवनकाल बहुत छोटा होता है.
विजय ने 234 सीटों वाली विधानसभा में 108 सीटें जीतकर न केवल 'एन्कोर' पेश किया (पुनरावृत्ति), बल्कि द्रविड़ राजनीति की आधी सदी पुरानी जड़ों को हिलाकर रख दिया.
भले ही टीवीके बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से कुछ कदम दूर है, लेकिन 108 सीटों का आंकड़ा ऐतिहासिक है. यह द्रमुक (59) की सीटों से लगभग दोगुना और अन्नाद्रमुक (47) से कहीं अधिक है. यह जीत एक ऐसी पार्टी की है जिसका दो साल पहले कोई वजूद नहीं था. विजय ने उन दो दिग्गजों को पछाड़ दिया है जिन्होंने दशकों तक बारी-बारी से राज्य पर राज किया था.
एक विश्लेषक के रूप में जवाबदेही जरूरी है. अगस्त 2025 में जब मैंने टीवीके के लिए 7-9% वोट शेयर का अनुमान लगाया था, तो वह एक 'किंगमेकर' की भूमिका की तैयारी जैसा था.
1. कोंगू बेल्ट (पश्चिम): यहाँ मेरा अनुमान सटीक रहा. अन्नाद्रमुक का यह गढ़ एक त्रिकोणीय मुकाबले में तब्दील हो गया. टीवीके ने 68 में से 27 सीटें जीतकर 'प्रतिस्पर्धी विखंडन' का लाभ उठाया.
2. दक्षिणी तमिलनाडु: यहाँ विजय ने बढ़त तो बनाई (25 सीटें), लेकिन उस स्तर का दबदबा नहीं दिखा पाए जिसकी उम्मीद उनकी मदुरै रैली ने जगाई थी. यहाँ मुकाबला बराबरी का रहा.
3. उत्तरी तमिलनाडु (सबसे बड़ी चूक): यहाँ मेरा आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। मैंने चेन्नई और आसपास के क्षेत्रों को "द्रमुक की मुट्ठी में" माना था. इसके विपरीत, टीवीके ने यहाँ 69 में से 44 सीटें जीतकर 'होस्टाइल टेकओवर' कर लिया. शहरी युवाओं और आकांक्षी मतदाताओं ने पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया.
उत्तरी तमिलनाडु के नतीजों ने ही विजय की सत्ता की राह प्रशस्त की. इसका सबसे चौंकाने वाला उदाहरण कोलाथुर सीट है. एम.के. स्टालिन ने इस क्षेत्र को एक मॉडल के रूप में विकसित किया था, लेकिन वे अपनी ही सीट द्रमुक के एक पूर्व कार्यकर्ता से हार गए. यह हार शासन की विफलता नहीं, बल्कि एक नए विकल्प के प्रति जनता के आकर्षण का परिणाम थी.
चेन्नई की गलियों में घूमने पर एक अजीब सी 'असमंजस' वाली भावना दिखाई देती है. युवा और पहली बार के मतदाता तो उत्साहित हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग और मध्यम वर्ग "यह हमने क्या कर दिया?" वाली मुद्रा में हैं. ऐसा लगता है कि मतदाता केवल सुधार चाहते थे, लेकिन उन्होंने व्यवस्था में एक संपूर्ण विस्थापन कर दिया.
विजय ने रणनीति के तहत पुराने द्रविड़ गढ़ों में सेंध लगाई. उन्होंने तिरुचिरापल्ली पूर्व और पेरम्बूर जैसी कठिन सीटों से चुनाव लड़कर यह संदेश दिया कि उनकी राजनीति केवल व्यक्तिगत नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक क्षेत्रीय विस्तारवादी महत्वाकांक्षा है.
अन्नाद्रमुक का अवसान: 47 सीटें मिलना अन्नाद्रमुक के लिए केवल हार नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व का संकट है. 1991 में द्रमुक 7 सीटों पर सिमटी थी, लेकिन वह अपने कैडर और करुणानिधि के बौद्धिक नेतृत्व के कारण बच गई. अन्नाद्रमुक हमेशा 'व्यक्तित्व-आधारित' पार्टी रही है. एमजीआर और जयललिता के बाद, एडप्पादी पलानीस्वामी (ईपीएस) के पास वह करिश्मा नहीं था जो पार्टी को एकजुट रख सके. आज अन्नाद्रमुक एक ढांचागत रूप से घायल जानवर की तरह है.
द्रमुक की स्थिति: 59 सीटों के साथ द्रमुक अभी भी मैदान में है. एक कैडर-आधारित संगठन होने के नाते वह इस हार को झेल सकती है. हालांकि, स्टालिन के नेतृत्व और उत्तराधिकार के सवालों पर अब पार्टी के भीतर और बाहर चर्चाएं तेज होंगी.
सत्ता का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अब विजय की ओर खिसक गया है. नतीजों के 24 घंटे के भीतर कांग्रेस का द्रमुक की बैठक से दूरी बनाना इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक अवसरवाद अब विजय के पक्ष में झुक रहा है. यदि कांग्रेस और पीएमके जैसे दल विजय का समर्थन करते हैं, तो यह न केवल सरकार को स्थिरता देगा, बल्कि टीवीके को भविष्य की धुरी के रूप में स्थापित कर देगा.
वहीँ दूसरी ओर, कमल हासन की राजनीति अब एक फुटनोट बनकर रह गई है. जहाँ हासन की विचारधारा 'बुफे' की तरह थी, वहीं विजय ने स्पष्टता और कैडर अनुशासन के साथ खुद को साबित किया.
भाजपा का प्रभाव और द्रविड़ गौरव
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए तमिलनाडु के नतीजे निराशाजनक रहे. 2.9% वोट शेयर और केवल एक सीट (उधगमंडलम) यह बताती है कि भाजपा की 'हिंदी' और 'मंदिर' आधारित राजनीति द्रविड़ गौरव (मुत्तमिल) के सामने नहीं टिक सकी. अमित शाह के हिंदी थोपने के प्रयासों ने तमिल मानस को भाजपा से और दूर कर दिया. अब भाजपा के लिए विजय के साथ एक 'लेन-देन' वाला रिश्ता बनाना ही एकमात्र विकल्प बचा है.
शासन की चुनौतियां: क्या विजय सफल होंगे?
विजय के लिए असली परीक्षा अब शुरू होती है. एक विद्रोही आंदोलन से सरकार चलाने तक का सफर कठिन होता है. उनके सामने तीन मुख्य चुनौतियां हैं:
1. प्रशासनिक अनुभव की कमी: उनके पास पहली बार के विधायकों की बड़ी फौज है, जिन्हें नौकरशाही को संभालने का अनुभव नहीं है.
2. गठबंधन प्रबंधन: यदि वे बैसाखियों पर सरकार चलाते हैं, तो उन्हें अपने सहयोगियों की मांगों और जन-आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा.
3. उम्मीदों का भारी बोझ: जनता उन्हें द्रमुक और अन्नाद्रमुक के विकल्प के रूप में देख रही है. उन्हें जल्द ही परिणाम देने होंगे, वरना जनता का मोहभंग होने में देर नहीं लगेगी.
निचोड़ यह है कि तमिलनाडु अब एक 'द्वि-ध्रुवीय' से 'त्रि-ध्रुवीय' या उससे भी अधिक जटिल प्रणाली की ओर बढ़ गया है. विजय ने खेल के मैदान को खोल दिया है, लेकिन वह मैदान अभी उनका नहीं हुआ है.
पुनश्च: वर्तमान में तमिलनाडु की राजनीति अस्थिर है. अफवाहें हैं कि अन्नाद्रमुक के 30 विधायक टीवीके में शामिल हो सकते हैं. यदि ऐसा होता है, तो यह विजय के लिए आत्मघाती हो सकता है. खरीद-फरोख्त की राजनीति उनकी 'साफ-सुथरी' छवि को धूमिल कर देगी. लेकिन यदि अन्नाद्रमुक टूटती है, तो तमिलनाडु की राजनीति फिर से दो घोड़ों की दौड़ में बदल जाएगी, जहाँ विजय की टीवीके, अन्नाद्रमुक की जगह लेकर द्रमुक की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन जाएगी.
विजय ने तमिलनाडु की राजनीति को अस्त-व्यस्त कर दिया है. अब देखना यह है कि वे इसे नया रूप दे पाते हैं या व्यवस्था उन्हें अपने वजन तले दबा देती है.

