कैसे एक बंगाली विज्ञापन एजेंसी ने भाजपा के ‘भय नॉय भरोसा’ अभियान को आकार दिया

पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले भाजपा एक ऐसी विज्ञापन एजेंसी की तलाश में थी जो बंगाली संस्कृति की बारीकियों और वहाँ की जनता की संवेदनाओं को गहराई से समझती हो. इसके लिए कोलकाता की एजेंसी ‘रिस्पॉन्स इंडिया’ को चुना गया. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य राज्य में व्याप्त कथित 'भय' के माहौल को खत्म कर भाजपा के प्रति 'भरोसा' जगाना था. विज्ञापन जगत के विशेषज्ञों के अनुसार, इस अभियान की सफलता का बड़ा कारण इसकी स्थानीय और रणनीतिक भाषा थी.

प्रसून चौधरी के अनुसार, इस अभियान के तहत टेलीविजन, सिनेमाघरों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए 13 लघु फिल्में तैयार की गईं. इस पूरे प्रोजेक्ट को बेहद गुप्त रखा गया था. इसके निर्माण की प्रक्रिया इतनी तेज़ थी कि स्क्रिप्ट को मंजूरी मिलने, कलाकारों के चयन और लोकेशन ढूंढने से लेकर शूटिंग पूरी करने तक का सारा काम 48 घंटों के भीतर निपटाया गया. गोपनीयता बनाए रखने के लिए कई समानांतर टीमें काम कर रही थीं, जिनमें से एक टीम को दूसरी टीम के काम की भनक तक नहीं थी. समय की कमी और विपरीत परिस्थितियों के कारण छोटे पर्दे और थिएटर के पेशेवर कलाकारों को इस अभियान से जोड़ा गया.

फिल्म निर्माता द्रोण आचार्य के अनुसार, जमीनी स्तर पर शूटिंग करना एक बड़ी चुनौती थी. भ्रष्टाचार, जर्जर शिक्षा व्यवस्था और महिला उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दों को दिखाने के लिए वास्तविक लोकेशन्स की जरूरत थी. हालांकि, राजनीतिक गुंडों के डर से स्थानीय लोग अपने घरों या मोहल्लों में शूटिंग की अनुमति देने से कतरा रहे थे.

इस डर के कारण क्रू को 'गुरिल्ला स्टाइल' या 'रन-एंड-गन' (बिना अनुमति के भागते-दौड़ते तुरंत शूट करना) तरीका अपनाना पड़ा. भारी-भरकम उपकरणों के बजाय छोटे कैमरों और छिपे हुए माइक्रोफोन्स का इस्तेमाल किया गया. डायमंड हार्बर के पास एक गाँव में सत्तारूढ़ दल की चेतावनी के कारण क्रू को पीछे भी हटना पड़ा. इसके बावजूद, भाजपा (क्लाइंट) द्वारा एआई दृश्यों के उपयोग पर सख्त पाबंदी होने के कारण, क्रू ने भारी जोखिम उठाकर बांटला और अन्य इलाकों में रात के समय वास्तविक और जर्जर लोकेशन्स पर ही शूटिंग पूरी की.

लघु फिल्मों के अलावा, इस एजेंसी ने तृणमूल सरकार के खिलाफ एक 'चार्जशीट' अभियान भी तैयार किया, जिसमें विभिन्न घोटालों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को रेखांकित किया गया. इसके अतिरिक्त, भाजपा के घोषणापत्र को 'भरोसार शपोथ' (भरोसे की शपथ) नाम देकर उसका मूल डिज़ाइन, पोस्टर और पैम्फलेट भी इसी एजेंसी द्वारा तैयार किए गए. इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके नारे या संवाद अंग्रेजी या हिंदी से अनुवादित नहीं थे, बल्कि मूल रूप से बंगाली में ही लिखे गए थे. इस सरल, स्पष्ट और स्थानीय भाषा ने सीधे आम जनता के दिलों को छुआ.

बहरहाल, बंगाल में नई सरकार को सत्ता संभाले एक महीने से अधिक का समय हो चुका है. उम्मीदें तैर रही हैं, सड़े हुए अंडे फेंके जा रहे हैं, और 'भय' तथा 'भरोसा' के बीच का खेल लगातार जारी है.

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