खोया हुआ राजकुमार: क्या पार्टी और उसके नेता के बीच आ गए अभिषेक बनर्जी?

‘द टेलीग्राफ’ में मेघदीप भट्टाचार्य ने लिखा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल के राजनीतिक पतन का सारा दोष अकेले अभिषेक बनर्जी पर मढ़ना पूरी तरह सही नहीं होगा. राज्य में भ्रष्टाचार, अवैध खनन और सिंडिकेट राज उनके आने से पहले से ही मौजूद थे, जिन्हें ममता बनर्जी के शासनकाल में बढ़ावा मिला.

फिर भी, मूल अंतर नेतृत्व की क्षमता का है. ममता बनर्जी तमाम कमियों के बाद भी अपने दम पर खड़ी हुई एक प्रामाणिक जननेता हैं.  इसके विपरीत, अभिषेक बनर्जी ने राज्य की सेवा करने या ज़मीनी स्तर पर सीखने की कोई इच्छा नहीं दिखाई. वे सीमित दूरदर्शिता वाले एक महत्वाकांक्षी कॉर्पोरेट बॉस की तरह ही व्यवहार करते रहे—एक ऐसा 'खोया हुआ राजकुमार' जिसने उत्तराधिकार में मिलने वाले पूरे साम्राज्य को ही अपने हाथों से गँवा दिया.

भट्टाचार्य के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी का शुरुआती जीवन बेहद साधारण और चकाचौंध से दूर था. 1990 और 2000 के दशक में उन्हें कोलकाता की गलियों में अकेले या स्थानीय बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते देखा जाता था. उनके राजनीतिक जीवन की नींव अगस्त 1990 में तब पड़ी, जब सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने ममता बनर्जी पर जानलेवा हमला किया. उस समय लगभग तीन वर्ष के अभिषेक ने अपनी बुआ पर हुए हमले का बदला लेने का संकल्प लिया था.

ममता बनर्जी के बड़े परिवार में कई योग्य भतीजे-भतीजियाँ थे, लेकिन अभिषेक के साथ उनका एक विशेष भावनात्मक जुड़ाव बन गया। ममता बनर्जी ने इस बचपन के संकल्प को एक राजनीतिक कथा (मिथक) का रूप दिया. वे चुनावी रैलियों और पार्टी बैठकों में अपने सिर पर पट्टी बंधी पुरानी तस्वीर दिखाकर अभिषेक के राजनीतिक अधिकारों को बचपन से ही न्यायसंगत ठहराने का प्रयास करती थीं.

अभिषेक बनर्जी का राजनीति में प्रवेश किसी क्रमिक विकास का परिणाम नहीं था. उन्हें सीधे सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली आधिकारिक तृणमूल युवा कांग्रेस के समानांतर, 'युवा' (YUVA) नामक एक नई विंग का प्रमुख बनाकर पार्टी के शीर्ष पर 'पैराड्रॉप' किया गया.  उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि कोलकाता के स्कूलों और दिल्ली के आईआईपीएम से प्रबंधन (बीबीए/एमबीए) की रही.

राजनीति में आते ही उन्होंने पूरी तरह से एक कॉर्पोरेट दृष्टिकोण अपनाया. उन्होंने सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने वाली पारंपरिक राजनीति के बजाय: साइबर टीमों का गठन किया, वेबसाइट के माध्यम से डिजिटल सदस्यता अभियान चलाया, सख्त प्रशासनिक और तकनीकी तौर-तरीकों को लागू किया. वे ज़मीनी राजनीति के बजाय तकनीकी और प्रबंधकीय विशेषज्ञों (जैसे प्रशांत किशोर, सैम पित्रोदा आदि) से सलाह लेने को प्राथमिकता देते थे.

विवाह और हाई-प्रोफाइल संबंध

साल 2012 में अभिषेक का विवाह दिल्ली के एक बड़े व्यवसायी की पुत्री रुजिरा नरूला से हुआ, जिनका व्यवसाय थाईलैंड में फैला हुआ था और वे एक थाई नागरिक हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विवाह भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली के सहयोग से तय हुआ था. इस विवाह ने अभिषेक को देश के शीर्ष उद्योगपतियों और राजनेताओं के बीच एक नया रसूख प्रदान किया, जिसने ममता बनर्जी की पुरानी, सादगीपूर्ण जीवनशैली (जिसमें 2011 में उनकी कुल संपत्ति मात्र ₹15 लाख थी) से एक बड़ा विरोधाभास पैदा किया.

बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार करना और 2016 की दुर्घटना

अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के पुराने दिग्गजों (जैसे सुब्रत बख्शी, फिरहाद हाकिम, पार्थ चटर्जी) का सीधा सामना करने के बजाय उन्हें पूरी तरह दरकिनार करना शुरू कर दिया. जब भी पुराने नेताओं ने 'टीम अभिषेक' की डिजिटल और कंप्यूटर आधारित कार्यशैली पर आपत्ति जताई, ममता बनर्जी ने इसे "हानिरहित यूथ क्लब" कहकर खारिज कर दिया. 2014 में उन्होंने डायमंड हार्बर सीट से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता.

अभिषेक के राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा मोड़ 18 अक्टूबर 2016 को आया, जब दुर्गापुर एक्सप्रेसवे पर उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई. उनके चेहरे और आँख की हड्डी पर गंभीर चोटें आईं. इस दुर्घटना के बाद ममता बनर्जी का उनके प्रति सुरक्षात्मक रवैया चरम पर पहुँच गया.  अब जो भी नेता अभिषेक की तानाशाही कार्यशैली की आलोचना करता, उसे ममता की नाराजगी और सीधे निलंबन का सामना करना पड़ता था. इसी के परिणामस्वरूप मुकुल रॉय जैसे वफादार नेताओं ने 2017 में पार्टी छोड़ दी.

आई-पैक का उदय और ‘एबीओ’ संस्कृति

समय के साथ अभिषेक का स्वरूप बदला और वे महंगे ब्रांड्स, गैजेट्स और राष्ट्रीय स्तर के युवा नेताओं (जैसे राहुल गांधी, अखिलेश यादव, राघव चड्ढा) के मित्र बन गए. उन्होंने राजनीतिक परामर्शदाता संस्था आई-पैक के माध्यम से तृणमूल को एक नए सांचे में ढाला:

भावनाहीन राजनीति: पार्टी की पारंपरिक, भावनात्मक और विकेंद्रीकृत शैली को बदलकर डेटा, स्प्रेडशीट और डिजिटल सर्विलांस पर आधारित एकल संस्कृति लागू की गई.

एबीओ का नियंत्रण: ज़मीनी और कद्दावर नेताओं को कैमैक स्ट्रीट स्थित 'अभिषेक बनर्जी कार्यालय' (एबीओ) के 20-22 साल के युवा सलाहकारों के अधीन काम करने पर मजबूर किया गया.

इसके कारण पार्टी के भीतर "पुराने बनाम नए" का एक गंभीर आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया.

चुनावी विफलता और पार्टी का बिखराव

अभिषेक बनर्जी के इस वर्चस्व की भारी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ी.  सुवेंदु अधिकारी (जो वर्तमान में राज्य के एक प्रमुख नेता हैं), अर्जुन सिंह और तापस रॉय जैसे कद्दावर जननेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया. 2026 के चुनावों में अभिषेक की जिद पर पार्टी ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को दिए और 15 नेताओं की सीटें बदल दीं.  यह प्रयोग पूरी तरह असफल रहा—74 में से 51 नए उम्मीदवार चुनाव हार गए और बदले गए 15 नेताओं में से केवल 3 ही जीत दर्ज कर सके. यदि पार्टी जीत जाती, तो अभिषेक का उपमुख्यमंत्री बनना और गृह व वित्त जैसे मंत्रालयों को संभालना निश्चित था, लेकिन इस रणनीति ने पार्टी को भारी नुकसान पहुँचाया.

भट्टाचार्य के इस लेख का यह हिंदी में अनुदित सारांश है. अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है.

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