राकेश कायस्थ | ये डिक्टेटरशिप का आखिरी दौर है
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के आंगन में फली-फूली फासिस्ट सत्ता अब बिल्कुल नंगी होकर खड़ी है. इस सत्ता का स्वरूप ऐसा है, जैसा किसी तानाशाही हुकूमत के आखिरी दौर में होता है. बात थोड़ी लंबी है, इसलिए शब्द और वक्त बर्बाद किए बिना सिलसिलेवार तरीके से बताता हूं कि ये यात्रा किस तरह शुरू हुई, यहां तक कैसे पहुंची और आगे कहां तक जा सकती है. क्रोनोलॉजी को समझना हम सबके लिए जरूरी है.
यूपीए-1 के दौर में यानी 2004-09 तक देश की आर्थिक विकास दर औसतन 8.9 फीसदी थी. ऐसा 2008 में आए ग्लोबल मेल्टडाउन के बावजूद था. भारतीय जीडीपी के आंकड़े आज की तरह संदेहास्पद नहीं थे और दुनिया उन पर यकीन कर रही थी. मीडिया से राजनीतिक खबरें बिल्कुल गायब थीं और न्यूज़ चैनल सांप-बिच्छू, मंदिर का रहस्य और कौन जीतेगा इंडियन आइडल जैसी हेडलाइन बना रहे थे. या दूसरे शब्दों में कहें तो जाने-अनजाने में जनता की राजनीतिक स्मृतियां मिटा रहे थे.
इसी दौर में गुजरात के मुख्यमंत्री अपने दामन पर पड़े दंगों के छींटों को हटाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे. इमेज मेकओवर के लिए कई देशी-विदेशी एजेंसियां हायर की जा चुकी थीं. अमेरिका की APCO Worldwide से अनुबंध करके उसे ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट 'वाइब्रेंट गुजरात' आयोजित करने की जिम्मेदारी सौंपी जा चुकी थी, ताकि मोदी की सांप्रदायिक छवि को तोड़कर उन्हें इनवेस्टमेंट-फ्रेंडली लीडर के रूप में स्थापित किया जा सके.
भारत के कई बड़े पब्लिक फिगर, या उस दौर के इंफ्लुएंसर, धीरे-धीरे लोकमानस में यह बात स्थापित करने में जुटे थे कि नरेंद्र मोदी एक ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें गलत समझा गया है. सिवाय डेवलपमेंट के उनकी राजनीति में और कुछ नहीं है. अपने दावे को सही साबित करने के लिए मोदी इस्लामिक बैंकिंग के आइडिया को आगे बढ़ाने वाले गुजराती मुस्लिम उद्यमी जफर सरेशवाला को साथ घुमाया करते थे.
RSS से जुड़े संगठन गुपचुप तरीके से अपना काम कर रहे थे. अजीत डोभाल के एनजीओ विवेकानंद फाउंडेशन को 2012 के आसपास केंद्र सरकार को डिस्क्रेडिट करने का मौका मिला और तय पटकथा के हिसाब से दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना का गन्ना बोया गया. उसके बाद जो हुआ, वह पूरी दुनिया को पता है.
नरेंद्र मोदी 2014 में आज के मुकाबले एक बिल्कुल अलग चेहरा लेकर सामने आए. वादा था करप्शन मिटाकर भारत को अगला सिंगापुर बना देने का. हर साल दो करोड़ नए रोजगार और लगातार दस प्रतिशत की रफ्तार से विकास का दावा था. राम मंदिर बीजेपी के घोषणा-पत्र में 70वें पेज पर था. आज की तरह हिंदू, हिंदू एकता, 'बंटेंगे तो कटेंगे' अगर 2014 के चुनावी एजेंडे में होते, तो मुमकिन है बीजेपी को 100 सीटें भी नहीं मिलतीं.
मोदी सत्ता के गलियारे में उसी तरह दाखिल हुए, जिस तरह कोई फासिस्ट ताकत होती है, यानी असली चेहरा छिपाकर. बीजेपी को 2014 में अविश्वसनीय तरीके से प्रचंड बहुमत मिला. नितिन गडकरी ने एक इंटरव्यू में हंसते हुए सच बोला था. तब गडकरी ने कहा था, "हमने नामुमकिन से वादे किए थे. हमें क्या पता था कि जनता इतनी आसानी से यकीन कर लेगी." मोदी सरकार के शुरुआती साल नाम बदलने, यूपीए की पुरानी योजनाओं की रीब्रांडिंग करके उन्हें अपना बताने में खर्च हुए. योजना आयोग का नीति आयोग हुआ. रेल बजट को आम बजट में मिला दिया गया. लेकिन ये सब करते-कराते सबकी समझ में आ गया कि गाल बजाने और सचमुच कुछ कर दिखाने में बहुत अंतर होता है.
अर्थव्यवस्था को पीछे धकेलने वाली नोटबंदी जैसी योजनाओं के सुपर फ्लॉप होने के बाद नरेंद्र मोदी ने समझ लिया कि केंद्र सरकार चलाना उनके बस का नहीं है. खुद को बचाए रखने के लिए अब मोदी ने दो तरह के पैंतरे अपनाए. हाइपर-नेशनलिज्म का दौर शुरू हुआ और उसके साथ-साथ उन सांप्रदायिक ताकतों को बेलगाम छोड़ दिया गया, जिनके वजूद से मोदी 2014 तक इनकार करते थे.
गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग का सिलसिला शुरू हुआ. मोदी चुपचाप इस बात का आकलन करने में जुटे थे कि देश इस तरह की घटनाओं पर किस तरह की प्रतिक्रिया दे रहा है. ज्यादातर प्रतिक्रियाएं ऐसी थीं, जिनसे यह साबित होता था कि इस देश का डीएनए बदलने की जो कोशिशें संघ बरसों से कर रहा है, उनमें सफलता मिलती दिख रही है. इसके बावजूद मोदी की हिम्मत नहीं हुई कि 2019 का चुनाव खुलकर सांप्रदायिकता के एजेंडे पर लड़ लें.
मोदी के भाग्य से 2019 के चुनाव से ठीक पहले पुलवामा का छींका टूटा. संदेहास्पद परिस्थितियों में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमला हुआ और 40 जवान शहीद हुए. प्रियंका गांधी समेत तमाम विपक्षी नेताओं ने शहीदों को श्रद्धांजलि देकर अपने कार्यक्रम स्थगित किए, वहीं जंगल में मंगल कर रहे मोदी ने सूचना आने के बाद भी आराम से Man vs Wild की अपनी शूटिंग पूरी की और फिर अपने मेलोड्रामैटिक अंदाज में देश के सामने आए.
यह याद रखने लायक बात है कि 2019 में बेरोजगारी की दर पिछले 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर थी. सरकार पर राफेल घोटाले जैसे करप्शन के गंभीर इल्जाम थे. मोदी का गुब्बारा फूट चुका था. इसके बावजूद पुलवामा के शहीदों के अस्थि-कलश घुमाकर मोदी ने 2019 का चुनाव भी जीत लिया. अब मोदी को यह बात समझ आ चुकी थी कि सिर्फ दो बातें ही उन्हें सत्ता में बनाए रख सकती हैं. पहली—हिंदू-मुसलमान की विभाजक रेखा इतनी गहरी करना कि लोग बाकी बातें भूलकर सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर वोट करें. दूसरी—सांसद और विधायक खरीदने के लिए जो अथाह पैसा चाहिए, उसके लिए पूरी बेशर्मी से क्रोनी कैपिटल का तंत्र खड़ा करना. मोदी का आगे का सारा काम इन्हीं दोनों नीतियों को आगे बढ़ाने पर रहा.
मोदी सरकार ने सबसे ज्यादा ढोल विकास का पीटा है. विकास का मोदी मॉडल क्या है? सरल भाषा में कहें तो बड़े कर्जे उठाकर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों में अंधाधुंध पैसे डालना, ताकि ऐसी तस्वीर गढ़ी जा सके जो वोटर को चमकीली लगे. विकास का मतलब स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक सभी मानकों पर आगे बढ़ना होता है, लेकिन मोदी रिजीम ने इसे ठेके बांटने में बदल दिया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि लेन-देन का इकोसिस्टम तेजी से फले-फूले और चुनाव जीतने के लिए धन कभी कम न पड़े. तथाकथित विकास परियोजनाएं चीख-चीखकर बता रही हैं कि डेढ़ अरब के देश में किस तरह की लूट चल रही है. हाइवे से लेकर एथेनॉल तक हर जगह घोटाले ही घोटाले हैं. ये घोटाले तभी तक दबे रह सकते हैं, जब तक हिंदू-मुसलमान का शोर इतना हो कि कुछ और सुनाई न दे.
सीएए-एनआरसी इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. दक्षिण एशिया के बाकी देशों से आए हिंदुओं को नागरिकता देने में कहीं कोई कानूनी अड़चन नहीं थी, लेकिन मोदी ने जानबूझकर संविधान संशोधन का वितंडा इसलिए रचा कि समाज धर्म के नाम पर विभाजित हो सके. सीएए-एनआरसी प्रकरण के साथ बीजेपी ने धर्म-आधारित द्विराष्ट्रवाद को स्वीकार करते हुए एक तरह से यह मान लिया कि भारत में जिन्ना के वैचारिक वारिस वही हैं. 2024 का चुनाव आते-आते भारतीय फासिज्म के सारे कपड़े उतर चुके थे. नरेंद्र मोदी की सांप्रदायिकता पूरी तरह नंगी खड़ी थी. वोट उसी तरह मांगे गए, जिस तरह गुजरात दंगों के बाद हुए चुनाव में मांगे गए थे.
इसके बावजूद बीजेपी सिर्फ 240 के आंकड़े पर अटक गई. यह साफ हो गया कि बीजेपी के कोर वोटर तक सरकार के नकारेपन और हिंदू-मुसलमान के ओवरडोज से उकताने लगे हैं. विपक्ष 2024 के नतीजों का जश्न मना रहा था, तब मोदी और शाह की जोड़ी यह सुनिश्चित करने में जुटी थी कि आने वाले दिनों में हर चुनाव का नतीजा बिल्कुल वैसा ही होगा, जैसा वह चाहेगी.
पिछले 12 साल में मोदी-शाह की जोड़ी ने जो पाप बोए हैं, उसके बाद यह सत्ता उनके लिए शेर की सवारी बन चुकी है. लगभग सभी राज्यों में सरकारें हैं. सिस्टम के चेक एंड बैलेंस खत्म करने के बाद सारी संस्थाओं पर नियंत्रण हासिल किया जा चुका है. असीमित राजनीतिक शक्ति है, पैसे की अकूत ताकत है. अगर कुछ नहीं है, तो वह है इकबाल. नरेंद्र मोदी शक्ति और अलोकप्रियता के दो अतिवादी ध्रुवों पर खड़े हैं. उन्हें वोट देते आए लोग भी अब यह बिना किसी बहस के मान लेते हैं कि यह सरकार किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है और देश में सब कुछ गैरकानूनी और अनैतिक तरीके से चल रहा है.
साल 2014 से अब तक की नरेंद्र मोदी की यात्रा को हम एक सरल फॉर्मूले से समझ सकते हैं.
विकास + गवर्नेंस → राष्ट्रवाद → सांप्रदायिकता + क्रोनी कैपिटलिज्म → चुनावी लूट → खुली तानाशाही.
मोदी की यह यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. चुनावी लूट से लेकर विधायक और सांसदों की खरीद तक न्यू इंडिया में सब कुछ न्यू नॉर्मल है. शेर की सवारी कर रहे मोदी के लिए अब नीचे उतरना या लौटना संभव नहीं है. डिक्टेटरशिप का आखिरी स्टेज अब बाकी है और वह है खुली और घोषित तानाशाही. इसके लिए कानूनी रूप से जायज दिखने वाला जो तरीका अपनाया जा सकता है, वह है ज्यादा से ज्यादा सांसद खरीदकर दो-तिहाई बहुमत हासिल करना.
परिसीमन करके मनमाफिक सीटें बढ़ाना, जिससे चुनावी प्रक्रिया अर्थहीन हो जाए और इस देश में सिर्फ एक पार्टी का शासन स्थापित हो जाए. संसद के मानसून सत्र में मोदी इस दिशा में आगे बढ़ते नजर आएंगे.
घरेलू से लेकर अंतरराष्ट्रीय, यानी हर मोर्चे पर फंसे मोदी के लिए इसके अलावा कोई और चारा नहीं है. डिक्टेटरशिप अपने आखिरी चरण में दाखिल हो रही है. यह छह महीने चलेगी, छह साल या और ज्यादा—इसका जवाब सिर्फ वक्त दे सकता है.

