अजित साही | यह नाराज़गी पिछले दस दिनों में पैदा नहीं हुई है. यह वर्षों से लोगों के भीतर जमा असंतोष का विस्फोट है.
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को लेकर देशभर में बहस जारी है. क्या यह केवल परीक्षा प्रणाली और पेपर लीक के खिलाफ गुस्सा है या भारतीय राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत? ‘हरकारा डीप डाइव’ में वरिष्ठ पत्रकार अजित साही ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी की राजनीति अपने "पॉइंट ऑफ नो रिटर्न" पर पहुंच चुकी है और इतिहास में तानाशाही व्यवस्थाओं के पतन के जो पैटर्न दिखाई देते हैं, भारत में भी वैसी ही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.
अजित साही का कहना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक परिवर्तन से पहले जनता के भीतर लंबे समय से जमा असंतोष अचानक दिखाई देने लगता है. उनके मुताबिक, जंतर-मंतर का आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ है, बल्कि यह वर्षों से जमा हो रहे असंतोष का विस्फोट है. उन्होंने मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और अन्य वैश्विक उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि राजनीतिक सत्ता का पतन अक्सर बेहद तेज़ी से होता है.
इस बातचीत में एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी रखा गया कि मौजूदा आंदोलन पारंपरिक छात्र आंदोलनों से अलग है. इसमें छात्रों के अलावा अभिभावक, नौकरीपेशा लोग, छोटे शहरों के नागरिक और अलग-अलग सामाजिक वर्गों के लोग शामिल दिखाई दे रहे हैं. अजित साही ने इसे "ट्रांसफॉर्मेशनल मूवमेंट" बताते हुए कहा कि यह केवल एक नीति के विरोध का आंदोलन नहीं है, बल्कि सत्ता, मीडिया और सामाजिक संरचनाओं के खिलाफ व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है.
बातचीत के दौरान उन्होंने चार तरह की "बगावत" की बात की. पहली, सरकार के खिलाफ राजनीतिक असंतोष. दूसरी, नई पीढ़ी का अपने माता-पिता की राजनीतिक सोच से टकराव. तीसरी, मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर सवाल. और चौथी, राज्य की दमनकारी संस्थाओं के प्रति बढ़ता अविश्वास. उनके अनुसार, यही कारण है कि यह आंदोलन केवल एक छात्र आंदोलन बनकर नहीं रह गया है.
निधीश त्यागी ने बातचीत में यह सवाल भी उठाया कि क्या भाजपा और आरएसएस की राजनीति, जो लंबे समय से सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण के मुद्दों पर टिकी रही है, इस आंदोलन को समझने और संभालने में असहज दिखाई दे रही है. इस पर अजित साही का कहना था कि मौजूदा आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसमें "दूसरे" नहीं हैं, बल्कि वही सामाजिक समूह शामिल हैं जिन्हें भाजपा का समर्थक वर्ग माना जाता रहा है.
दोनों ने इस बात पर भी चर्चा की कि यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा कमज़ोर होता है और नागरिकों को अपनी बात रखने के संस्थागत रास्ते बंद दिखाई देने लगते हैं, तो जन आंदोलनों का स्वरूप अधिक व्यापक हो सकता है. इसी संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया, संस्थाओं की भूमिका और सरकार की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठाए गए.
बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जुड़ा था. वॉशिंगटन डीसी में रहने वाले अजित साही ने कहा कि वैश्विक स्तर पर भारत की लोकतांत्रिक छवि और उसकी सॉफ्ट पावर पर भी गंभीर चर्चा हो रही है. उनके अनुसार, भारत को दुनिया मुख्यतः उसके लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक विविधता के कारण पहचानती रही है और यदि इन मूल्यों पर सवाल उठते हैं तो इसका असर भारत की वैश्विक साख पर भी पड़ सकता है.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

