41 प्रतिशत वोट और अकेली पड़ गईं ममता
‘हरकारा एक्सप्लेनर’ के लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और युवा पत्रकार विश्वजीत कुमार ने पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ती बगावत, ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति और बंगाल की बदलती सियासत का विस्तृत विश्लेषण किया है.
क्यों महत्वपूर्ण है:
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट अब विधानसभा से निकलकर संसद तक पहुंच गया है. यदि पार्टी के 28 में से 20 सांसद वास्तव में अलग गुट बनाते हैं, तो यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए बड़ा झटका होगा और संसद में विपक्षी राजनीति का समीकरण बदल सकता है.
3 जून को तृणमूल से निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी. उन्हें तृणमूल के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, जो अलग विधायी पहचान के लिए आवश्यक दो-तिहाई संख्या से अधिक है. इससे विधानसभा के भीतर एक अलग गुट औपचारिक रूप से अस्तित्व में आ गया. और अब विधानसभा से आग की लपट लोकसभा तक पहुंच चुकी है.
ताज़ा स्थिति:
टीएमसी के 20 सांसदों ने कथित तौर पर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन करने और अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है. इस समूह का नेतृत्व काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं.
संक्षेप में:
दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की बैठक हुई. बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद थे. बागी सांसदों का दावा है कि बंगाल के विकास के लिए एनडीए के साथ जाना जरूरी है.
पर्दे के पीछे:
विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था. पहले कई विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसलों का विरोध किया, अब यह असंतोष लोकसभा सांसदों तक पहुंच गया है. इसी बीच राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय भी पार्टी छोड़ चुके हैं. टीएमसी संसद कीर्ति आज़ाद ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा कि “चुनाव के बाद सुवेंदु शेखर ने अनेकों आरोप लगाए और इस्तीफा दे दिया. उनका आरोप सही है या गलत यह अलग बात है, लेकिन कम से कम उन्होंने एक राजनीतिक आचरण और नैतिकता दिखाई. आप में अगर नैतिकता है तो इस्तीफा दे दें और बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए आ जाएं.
मौजूदा स्थिति:
टीएमसी नेतृत्व ने अभी तक बागी सांसदों के दावों को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है. लोकसभा अध्यक्ष के सामने भेजे गए पत्र और संभावित संसदीय मान्यता पर सबकी नजर है.
दूसरी ओर:
बागी सांसदों का कहना है कि वे जनता के जनादेश का सम्मान कर रहे हैं और बंगाल के विकास के लिए एनडीए का समर्थन करना चाहते हैं. वहीं टीएमसी खेमे का मानना है कि पार्टी को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है.
काकोली घोष दस्तीदार ने कहा, ‘‘हमने जनादेश को स्वीकार किया है और मानते हैं कि हमारा भविष्य का राजनीतिक रास्ता राजग के साथ होना चाहिए.’’
आगे क्या :
अगर लोकसभा अध्यक्ष बागी सांसदों के दावे को मान्यता देते हैं, तो यह सिर्फ टीएमसी में टूट नहीं होगी, बल्कि संसद के शक्ति-संतुलन में बड़ा बदलाव भी होगा. 20 सांसदों का साथ बागियों को दल-बदल कानून से सुरक्षा दे सकता है, जबकि एनडीए को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी.
2024 में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 240 सीटों पर जीत मिली थी. ऐसा पहली बार हुआ कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार में बीजेपी के पास अपना बहुमत नहीं है.
फ़िलहाल लोकसभा में एनडीए के पास लगभग 293 सांसद हैं, जबकि विपक्षी इंडिया ब्लॉक के पास 234 सांसद हैं. अगर टीएमसी के 20 सांसद भी एनडीए में जुड़ जाएँ तो संख्या 313 हो जाएगी. ममता बनर्जी की पार्टी अलग थलग पड़ जाएगी. पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

