सुभाष चंद्र गर्ग | भारत के शेयर बाजार अब वैश्विक रैंकिंग में ऊपर क्यों नहीं चढ़ रहे हैं
कहावत है कि जब मुसीबत आती है, तो चारों तरफ से आती है. रुपये के अवमूल्यन (कमजोरी) और महंगाई की बुरी खबरों के बाद, अब एक और झटका लगा है कि भारत वैश्विक मार्केट-कैपिटलाइजेशन (बाजार पूंजीकरण) रैंकिंग में नीचे खिसक गया है.
पिछले महीने, 26 मई को ताइवान ने भारत को पछाड़कर पांचवां स्थान हासिल कर लिया था; ताइवान के शेयरों का मूल्य जहाँ $4.95 ट्रिलियन (लाख करोड़ डॉलर) था, वहीं भारत का पूंजीकरण $4.92 ट्रिलियन था. इसके बाद 1 जून को, दक्षिण कोरिया भी भारत से आगे निकल गया. भारतीय पूंजीकरण गिरकर $4.84 ट्रिलियन पर आ गया, जबकि दक्षिण कोरिया का मार्केट कैप $5.04 ट्रिलियन को पार कर गया. इस तरह भारत सातवें स्थान पर आ गया है.
‘द क्विन्ट’ में सुभाष चंद्र गर्ग लिखते हैं कि ये दोनों घटनाक्रम विशेष रूप से परेशान करने वाले हैं, क्योंकि महज़ 18 महीने पहले भारत का मार्केट कैप दक्षिण कोरिया से लगभग 3.5 गुना और ताइवान से दोगुना था.
पिछले लगभग दो वर्षों से भारत दोनों तरफ से मार खा रहा है. जहाँ एक ओर इसके शेयर बाजार गिर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजार नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं.
भारतीय शेयर बाजार पूर्ण और तुलनात्मक—दोनों रूपों में इतना खराब प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? क्या भारत और नीचे खिसकेगा? क्या यह वापस नौवें स्थान पर चला जाएगा, जहाँ यह 2013 में मोदी सरकार के सत्ता संभालने से पहले था?
गर्ग ने ‘द क्विन्ट’ में प्रकाशित अपने लेख की सूचना देते हुए ‘लिंक्डइन’ पर लिखा, “भारतीय शेयर बाज़ार का बाज़ार पूंजीकरण, जो वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान तक पहुँच गया था, इस महीने गिरकर सातवें स्थान पर आ गया है. छोटे हांगकांग और ताइवान तथा तेज़ी से बढ़ते दक्षिण कोरिया ने भारत को पीछे छोड़ दिया है.
भारत चिंताजनक रूप से वैश्विक प्रभाव और रुचि खो रहा है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) ऐसे बेच रहे हैं मानो भारत में अब कोई अच्छा भविष्य नहीं बचा हो. ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स में ताइवान की एक कंपनी टीसीएमसी का वज़न सभी भारतीय कंपनियों के संयुक्त वज़न से अधिक है. इसके कई कारण हैं. मुख्यतः, दुनिया भारत की विकास गाथा पर विश्वास नहीं करती. भविष्य के विकास चालकों की अनुपस्थिति निराशावाद को बढ़ावा देती है. रुपये की गलत संभाल और गिरावट हमारी परेशानियों को और बढ़ाती है. कुछ लोगों के लिए रुपया 100 तक गिरना कोई मायने नहीं रखता—यह सिर्फ़ एक संख्या है, किसी ने सिस्टम में कहा. लेकिन विदेशी निवेशकों के लिए इसका बहुत महत्व है.
तीसरा कार्यकाल भारतीय अर्थव्यवस्था को नीचे की ओर ले जा रहा है, जिससे यह दुनिया की सबसे असुरक्षित बड़ी अर्थव्यवस्था बन रही है.
(सुभाष चंद्र गर्ग भारत सरकार के वित्त एवं आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव हैं)

