श्रवण गर्ग | प्रियांक खड़गे अगर मोदी जी नहीं मिले हुए हैं तो संघ से दोस्ती कर कर लें

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने निधीश त्यागी से बातचीत में कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर उठाए गए सवालों और उसके राजनीतिक असर का विश्लेषण किया. उन्होंने कहा कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष को अपनी राजनीतिक रणनीति पर गंभीरता से विचार करना होगा. उनके मुताबिक संघ पर सीधे हमले करने के बजाय विपक्ष को यह समझना चाहिए कि ऐसे बयानों का सबसे अधिक राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है.

श्रवण गर्ग का कहना था कि भाजपा की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं. उनके अनुसार यदि किसी नेता को संभावित उत्तराधिकारी मानकर राजनीतिक बहस खड़ी की जाती है तो उसी पैमाने पर दूसरे नेताओं को भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भाजपा और संघ के रिश्तों को समझे बिना इस पूरी बहस का सही आकलन नहीं किया जा सकता.

उन्होंने तर्क दिया कि संघ का भाजपा पर केवल वैचारिक ही नहीं, बल्कि नैतिक प्रभाव भी बना रहता है. ऐसे में यदि विपक्ष लगातार संघ को ही अपना मुख्य निशाना बनाता है तो इसका परिणाम उल्टा भी हो सकता है. उनके मुताबिक इससे भाजपा नेतृत्व और संघ के बीच दूरी कम होने के बजाय एकजुटता बढ़ सकती है और इसका राजनीतिक लाभ नरेंद्र मोदी को मिल सकता है.

चर्चा के दौरान श्रवण गर्ग ने कहा कि यदि विपक्ष वास्तव में भाजपा की राजनीति को चुनौती देना चाहता है तो उसे अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना चाहिए. उनके अनुसार प्रियांक खड़गे और राहुल गांधी को फिलहाल संघ पर सीधे हमलों को स्थगित कर सरकार की जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित के मुद्दों पर अधिक जोर देना चाहिए. उनका मानना था कि इससे विपक्ष की राजनीति अधिक प्रभावी हो सकती है.

उन्होंने कहा कि विपक्ष को यह भी स्पष्ट करना होगा कि उसका मुख्य राजनीतिक मुकाबला किससे है. क्या उसका निशाना नरेंद्र मोदी हैं, अमित शाह हैं, योगी आदित्यनाथ हैं या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं होगा, तब तक चुनावी रणनीति में भ्रम बना रहेगा.

श्रवण गर्ग ने कहा कि 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव विपक्ष के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगा. उनके अनुसार राजनीतिक रणनीति केवल बयानों से तय नहीं होती, बल्कि चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची से जुड़े विवाद, एसआईआर जैसी प्रक्रियाएं और चुनावी प्रबंधन भी परिणामों को प्रभावित करते हैं. इसलिए विपक्ष को केवल आक्रामक बयानबाजी के बजाय व्यापक राजनीतिक तैयारी और स्पष्ट रणनीति पर ध्यान देना चाहिए.

चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले विपक्ष को अपनी राजनीतिक दिशा और प्राथमिकताओं का नए सिरे से आकलन करना होगा. श्रवण गर्ग के मुताबिक केवल तीखे हमले पर्याप्त नहीं होते, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि उनके राजनीतिक परिणाम अंततः किसके पक्ष में जा रहे हैं. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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