45 साल बाद सरकार ने कहा जमीन उसकी है, अब उजड़ रहे हैं शालीमार गांव के घर

 “मैं इतनी डरी हुई हूं कि न ठीक से काम कर पा रही हूं और न सो पा रही हूं. मैं अपना घर छोड़कर कहीं किराये पर नहीं रह सकती.” यह कहते हुए 50 वर्षीय चंद्रकला अपने घर के बाहर बैठी थीं. उत्तर दिल्ली के शालीमार गांव में रहने वाली चंद्रकला उन सैकड़ों लोगों में शामिल हैं जिनके घर और दुकानें अब ध्वस्तीकरण की जद में हैं.

‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 में शालीमार गांव के निवासियों को नोटिस मिला कि उनकी संपत्तियां अतिक्रमण हैं. सरकार का कहना था कि जिस जमीन पर ये मकान बने हैं, उसका अधिग्रहण 1980 में किया जा चुका था. यह जमीन दिल्ली मास्टर प्लान की सड़क संख्या 320 के राइट ऑफ वे का हिस्सा है और सड़क चौड़ीकरण के लिए इसे खाली कराया जाना जरूरी है.

6 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट ने लगभग 150 मकानों और दुकानों को हटाने के आदेश को बरकरार रखा. अदालत ने कहा कि सड़क का विस्तार व्यापक जनहित में है और इससे अस्पतालों तक पहुंचने वाले एम्बुलेंस जैसे आपातकालीन वाहनों की आवाजाही आसान होगी. 29 मई को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को कायम रखा, जिसके बाद 31 मई से ध्वस्तीकरण शुरू हो गया.

लेकिन शालीमार गांव के निवासियों का सवाल है कि यदि जमीन का अधिग्रहण 45 साल पहले हो चुका था तो सरकार ने इतने वर्षों तक उस पर कब्जा क्यों नहीं लिया. 48 वर्षीय करण सिंह कहते हैं, “मेरा जन्म यहीं हुआ है. हमारा परिवार पिछले पांच दशकों से यहां रह रहा है. अगर हमें हटाया गया तो हम सड़क पर आ जाएंगे.”

नोटिस मिलने के बाद से ही इलाके के लोग एक छोटे से दुकाननुमा स्थल पर धरना दे रहे थे. दीवारों पर ‘हमारे घर बचाइए’ और ‘घर बचाओ आंदोलन’ के पोस्टर लगे हुए थे. निवासी अदालत में भी गए और दावा किया कि वे इस जमीन के वैध मालिक हैं, लेकिन अदालत ने उनके दावों को स्वीकार नहीं किया.

विवाद का एक बड़ा मुद्दा मुआवजे को लेकर है. प्रशासन का कहना है कि भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 के तहत मुआवजे की राशि 1981 में राजस्व विभाग को हस्तांतरित कर दी गई थी. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि मूल किसानों को कभी मुआवजा नहीं मिला. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मुकेश कुमार पूछते हैं, “अगर मुआवजा दिया गया था तो सरकार बताए कि वह किसे मिला.”

निवासियों का तर्क है कि उन्होंने जमीन मूल मालिकों से खरीदी थी और उन्हें कभी यह जानकारी नहीं दी गई कि जमीन का अधिग्रहण हो चुका है. कई लोगों के पास बिक्री समझौते, पावर ऑफ अटॉर्नी, वसीयत, संपत्ति कर रसीदें, बिजली-पानी के कनेक्शन और अन्य सरकारी दस्तावेज हैं.

सबसे बड़ा सवाल पीएम-उदय योजना को लेकर उठ रहा है. 2019 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले लोगों को संपत्ति अधिकार देना था. शालीमार गांव भी उन कॉलोनियों में शामिल था जिन्हें नियमितीकरण की प्रक्रिया में रखा गया था. कई निवासियों को आधिकारिक कन्वेयंस डीड भी जारी की गई थी.

70 वर्षीय प्रेम सिंह को 2021 में पीएम-उदय के तहत कन्वेयंस डीड मिली थी. उन्हें लगा था कि अब उनकी संपत्ति को कानूनी मान्यता मिल गई है. लेकिन ध्वस्तीकरण नोटिस के साथ ही उन्हें यह भी बताया गया कि उनकी डीड रद्द की जा रही है क्योंकि उनकी संपत्ति सड़क के राइट ऑफ वे में आती है.

निवासियों का कहना है कि यदि सरकार ने जांच-पड़ताल के बाद दस्तावेज जारी किए थे तो अब उन्हें अमान्य कैसे घोषित किया जा सकता है. स्थानीय वकील आर.के. वर्मा कहते हैं, “अगर सरकार ने आधिकारिक दस्तावेज दिया है तो उसे वापस लेने का क्या आधार है?”

विवाद केवल पीएम-उदय तक सीमित नहीं है. कई परिवारों के पास लाल डोरा प्रमाणपत्र भी हैं. प्रशासन का कहना है कि लाल डोरा प्रमाणपत्र केवल यह बताता है कि संपत्ति गांव की आबादी क्षेत्र में आती है, जबकि निवासी दावा करते हैं कि यही प्रमाणपत्र स्वामित्व का आधार माना जाता रहा है.

स्थानीय लोगों के पास ऐसे दस्तावेज भी हैं जिनमें अतीत में सरकारी स्तर पर उनके घर न तोड़ने का आश्वासन दिया गया था. 2010 में तत्कालीन उपराज्यपाल कार्यालय की ओर से कहा गया था कि यहां के घर नहीं तोड़े जाएंगे. इससे पहले 1981 में भी प्रशासनिक स्तर पर आबादी वाले हिस्से को यथावत रखने की बात कही गई थी. ये दस्तावेज अदालत के सामने भी रखे गए, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली.

स्थानीय लोग यह भी पूछ रहे हैं कि अगर वे अवैध रूप से रह रहे थे तो सरकार ने वर्षों तक उन्हें बिजली, पानी और अन्य सुविधाएं क्यों उपलब्ध कराईं. मुकेश कुमार कहते हैं, “सरकार ने सड़कें बनाईं, सीवर डाले, बिजली-पानी दिया. अगर हम अवैध थे तो हमें यहां बसने क्यों दिया गया?”

अदालत ने प्रभावित परिवारों के लिए अनुग्रह सहायता पर विचार करने की बात कही थी. इसके बाद दिल्ली सरकार ने पात्र परिवारों को तीन लाख रुपये की एकमुश्त सहायता और कुछ मामलों में अस्थायी आवास देने की घोषणा की. लेकिन अधिकांश निवासियों का कहना है कि यह उनके घरों और जीवनभर की कमाई की भरपाई नहीं कर सकता.

शालीमार गांव में आज सबसे बड़ी चिंता भविष्य को लेकर है. कई परिवारों के सामने यह सवाल खड़ा है कि वे अब कहां जाएंगे. कुछ लोग अब भी संघर्ष कर रहे हैं, जबकि कुछ ने उम्मीद छोड़ दी है. हरियाणा के गोहाना से संबंध रखने वाले जय भगवान ने फैसला कर लिया है कि वे अपने परिवार के साथ गांव लौट जाएंगे.

शालीमार गांव का संघर्ष केवल एक सड़क परियोजना का मामला नहीं रह गया है. यह उन सवालों का प्रतीक बन गया है जिनमें विकास, सरकारी जवाबदेही, संपत्ति अधिकार और विस्थापन आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं.

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