सुप्रीम कोर्ट ने कहा: एससी/एसटी एक्ट तभी लागू होगा जब जातिगत अपमान ‘सार्वजनिक रूप’ से किया गया हो
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी व्यक्ति पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला केवल तभी चलाया जा सकता है, जब जातिगत अपमानजनक टिप्पणी "सार्वजनिक रूप" से की गई हो. कोर्ट ने बिना किसी गवाह के निजी स्थानों पर होने वाले ऐसे अपराधों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा है.
‘टेलीग्राफ ब्यूरो’ के अनुसार, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने गुंजन उर्फ गिरिजा कुमारी और कुछ अन्य अपीलकर्ताओं द्वारा दायर एक अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया. इन अपीलकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ तय किए गए आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया था. इन लोगों पर कीर्ति नगर पुलिस स्टेशन में एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) तथा 34 (समान मंशा) के तहत कथित अपराधों के लिए आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे.
शीर्ष अदालत ने संज्ञान लिया कि अपीलकर्ताओं द्वारा कथित जातिगत गाली-गलौज शिकायतकर्ता और आरोपी व्यक्तियों के आवासीय परिसर के भीतर हुई बताई गई थी, जो एक ही स्थान पर रहते थे और वैवाहिक संबंध के कारण आपस में रिश्तेदार थे.
पीठ ने अपने फैसले में कहा, "तमाम भौतिक तथ्य यह संकेत देते हैं कि कथित घटना एक निजी स्थान पर और प्रतिवादी संख्या 2-शिकायतकर्ता (दलित) और अपीलकर्ताओं, जो सभी परिवार के सदस्य हैं, के घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी."
कोर्ट ने आगे कहा, "यह कहा जा सकता है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध बनने के लिए घटना का 'सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान' पर होना अन्य घटकों के बीच एक तरह की प्रमुख आवश्यकता है. अन्य पहलू जैसे 'जानबूझकर अपमान या धमकी' और 'अपमानित करने का इरादा', तब और अधिक गंभीर हो जाते हैं जब अपमान, धमकी या अपमानजनक शब्द सार्वजनिक सदस्यों की उपस्थिति में 'सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान' पर कहे जाते हैं."
शीर्ष अदालत के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति अंजारिया ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध बनने के लिए यह आवश्यक है कि जाति के नाम पर जानबूझकर किया गया अपमान, धमकी या गाली-गलौज 'सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान' पर हो और उसका उद्देश्य व्यक्ति को उसकी जाति को लेकर अपमानित करना हो.
न्यायमूर्ति अंजारिया ने स्पष्ट किया, "एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और/या धारा 3(1)(s) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए, घटना और जाति-आधारित गालियाँ देने का आचरण 'सार्वजनिक दृश्य वाले स्थान' पर होना चाहिए. यह सार्वजनिक दृष्टि के भीतर का स्थान होना चाहिए. यदि यह एक निजी स्थान भी है, तो ऐसी स्थिति में वहाँ तक सार्वजनिक पहुँच होनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि वहाँ क्या हो रहा है, तभी उसे 'सार्वजनिक दृश्य वाला स्थान' माना जाएगा."

