शोभन सक्सेना | अगर अमेरिका अपना हाथ खींच ले, तो इज़राइल आर्थिक और राजनीतिक तौर पर टिक नहीं पाएगा
हरकारा डीप डाइव के इस विस्तृत इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार नितीश त्यागी और ब्राज़ील से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना ने ईरान-इज़राइल युद्ध, डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों, अमेरिका की वैश्विक रणनीति, पेट्रो-डॉलर राजनीति, भारत की विदेश नीति और पश्चिम एशिया के बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर क्यों अमेरिका और इज़राइल द्वारा शुरू किया गया युद्ध अब उनके नियंत्रण से बाहर जाता दिखाई दे रहा है और क्यों दुनिया भर के बाज़ार, तेल व्यापार और कूटनीतिक समीकरण इससे अस्थिर हो गए हैं.
शोभन सक्सेना ने कहा कि शुरुआत में दावा किया गया था कि ईरान को “दो दिन” या “दो हफ्तों” में झुका दिया जाएगा, लेकिन कई हफ्ते गुजरने के बाद भी युद्ध निर्णायक स्थिति तक नहीं पहुंच पाया है. उनके अनुसार ईरान लगातार अपनी “रेड लाइंस” दोहराता रहा है और उसने जल्दबाज़ी में युद्धविराम स्वीकार करने के संकेत नहीं दिए.उन्होंने कहा कि इस स्थिति ने अमेरिका और इज़राइल की उस छवि को कमजोर किया है जिसमें वे स्वयं को निर्णायक सैन्य शक्ति के रूप में पेश करते रहे हैं.
बातचीत में कहा गया कि अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर दबाव बढ़ रहा है. शोभन सक्सेना ने दावा किया कि डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता गिर रही है, तेल और गैसोलीन की कीमतें बढ़ रही हैं, महंगाई का दबाव बढ़ रहा है और आगामी चुनावों को देखते हुए ट्रंप के लिए लंबे युद्ध को राजनीतिक रूप से संभालना कठिन होता जा रहा है. चर्चा में यह भी कहा गया कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश जैसे सऊदी अरब, यूएई और कुवैत अब पहले की तरह अमेरिकी सैन्य रणनीति के साथ खुलकर खड़े दिखाई नहीं दे रहे हैं.
इंटरव्यू में यह दावा भी किया गया कि कई गल्फ देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा है और अमेरिका के “सुरक्षा कवच” की छवि कमजोर हुई है. चर्चा के दौरान अमेरिकी और इज़राइली रणनीति को “अव्यवस्थित” बताते हुए कहा गया कि लगातार बदलते बयान यह संकेत देते हैं कि कोई स्पष्ट दीर्घकालिक रणनीति मौजूद नहीं है. शोभन सक्सेना ने कहा कि बड़ी शक्तियां आम तौर पर “ग्रैंड स्ट्रेटजी” पर चलती हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन का रवैया प्रतिक्रियात्मक और तात्कालिक दिखाई देता है.
चर्चा में अमेरिका की अर्थव्यवस्था और डॉलर की वैश्विक भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए. शोभन सक्सेना ने कहा कि अमेरिका पर भारी कर्ज है और उसकी आर्थिक शक्ति काफी हद तक “पेट्रो-डॉलर” व्यवस्था पर आधारित है, जिसमें दुनिया का तेल व्यापार डॉलर में होता है. उन्होंने कहा कि यदि देश तेल व्यापार स्थानीय मुद्राओं में करने लगें तो डॉलर की वैश्विक स्थिति कमजोर हो सकती है. इसी संदर्भ में चीन, रूस और ईरान के बीच बढ़ते सहयोग को अमेरिका के लिए रणनीतिक चुनौती बताया गया.
भारत और इज़राइल के रिश्तों पर भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्रित रहा. निधीश त्यागी ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों बेंजामिन नेतन्याहू बार-बार यह दावा करते हैं कि भारत में उनके लिए भारी समर्थन मौजूद है. शोभन सक्सेना ने कहा कि भारत और इज़राइल के बीच व्यापार अपेक्षाकृत सीमित है और मुख्य रूप से रक्षा, अंतरिक्ष और निगरानी तकनीक तक केंद्रित है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के वास्तविक आर्थिक हित खाड़ी देशों से अधिक जुड़े हुए हैं, जहां बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और जहां से भारत को भारी मात्रा में ऊर्जा आपूर्ति मिलती है.
भारतीय विदेश नीति पर शोभन सक्सेना ने कहा कि भारत को अपने दीर्घकालिक हितों के आधार पर निर्णय लेने चाहिए, न कि “दोस्ती” की भावनात्मक राजनीति के आधार पर. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी दोस्ती नहीं बल्कि स्थायी हित होते हैं. पूरी वीडियो यहाँ देखि जा सकती है.

