‘बहुमत के समर्थन’ के आग्रह के पीछे राष्ट्रपति शासन की छाया
तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय को विधानसभा में बहुमत का समर्थन साबित करना चाहिए, यह आग्रह एक समय की कसौटी पर परखे गए कानूनी सिद्धांत पर आधारित है. यह सिद्धांत कहता है कि राज्यपाल की पहली प्राथमिकता एक स्थिर सरकार का गठन करना है, ताकि राज्य संवैधानिक तंत्र के पूरी तरह विफल होने की स्थिति में न फिसल जाए, जिससे राष्ट्रपति शासन लागू होने की नौबत आए.
‘द हिंदू’ में एक विश्लेषण के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के उदाहरणों में कहा गया है कि बहुमत स्थापित हो जाने के बाद राज्यपाल सरकार बनाने की अनुमति देने से इनकार नहीं कर सकते. इसका एकमात्र अपवाद वह स्थिति हो सकती है, जहाँ राज्यपाल की राय हो कि दावेदारों द्वारा एक स्थिर सरकार नहीं बनाई जा सकती. दूसरी ओर, अदालत ने यह भी कहा है कि राज्यपाल से अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, क्योंकि इस प्रक्रिया में दलबदल या अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है.
सर्वोच्च न्यायालय और सरकारिया आयोग ने एक स्थिर सरकार बनाने के लिए राज्यपालों द्वारा "राजनीतिक दलों, समूहों और स्वतंत्र विधायकों के साथ विकल्पों को तलाशने" के लिए उचित समय दिए जाने के महत्व पर प्रकाश डाला है. हालांकि, 'उचित समय' वाक्यांश को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है.
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल के सामने 'विकल्प' यह होंगे कि वे सबसे पहले उन दलों के चुनाव-पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें जिनके पास सीटों की संख्या सबसे अधिक है. दूसरा विकल्प वह सबसे बड़ा अकेला दल होगा जो बहुमत का समर्थन दिखा सके. चुनाव के बाद का गठबंधन राज्यपाल के सामने अंतिम विकल्प होता है.
1994 के एस.आर. बोम्मई मामले में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने वरीयता के इस क्रम का समर्थन करते हुए स्पष्ट रूप से जोड़ा है कि राज्यपाल या तो सबसे बड़े अकेले दल या "समूह" के पास जा सकते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह 'समूह' चुनाव से पहले बना था या बाद में. यदि ये विकल्प विफल हो जाते हैं और कोई भी दल या समूह लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल करने में सक्षम नहीं होता है, तो यह संवैधानिक तंत्र की विफलता का मामला माना जाएगा.
बोम्मई फैसले में अदालत ने टिप्पणी की थी: "मान लीजिए कि आम चुनाव के बाद, कोई भी राजनीतिक दल या दलों का गठबंधन या समूह विधानसभा में पूर्ण बहुमत सुरक्षित करने में सक्षम नहीं है, और राज्यपाल द्वारा विकल्पों की तलाश करने के बावजूद ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें कोई भी दल स्थिर सरकार बनाने में सक्षम नहीं है, तो यह किसी भी राजनीतिक दल की स्थिर सरकार बनाने में पूरी तरह से प्रमाणित असमर्थता का मामला होगा जिसे विधायिका के बहुसंख्यक सदस्यों का विश्वास प्राप्त हो. यह संवैधानिक तंत्र की विफलता का मामला होगा."
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ मामले में अपनी सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले में राज्यपालों द्वारा पक्षपातपूर्ण राजनीति के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने के खिलाफ चेतावनी भी दी है. अदालत ने कहा, "चाहे वह मौजूदा सरकार द्वारा बहुमत खोने का मामला हो या नए चुनाव के बाद नई सरकार की स्थापना का, विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने में राज्यपाल का कार्य केवल संविधान के संरक्षण के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि किसी एक या दूसरे दल के राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए."
रामेश्वर प्रसाद मामले में सरकारिया आयोग में दर्ज उस आलोचना को भी रेखांकित किया गया कि राज्यपालों ने अक्सर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने की अपनी शक्तियों का उपयोग "केंद्र में सत्ताधारी दल के राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने" के लिए किया है.
अदालत ने एक "कूलिंग-ऑफ पीरियड" (राजनीति से दूरी बनाए रखने की अवधि) की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा था: "यह देखा गया है कि एक दिन कोई व्यक्ति सक्रिय राजनीति में होता है, यहाँ तक कि वह मुख्यमंत्री, मंत्री या किसी दलीय पद पर आसीन होता है, और लगभग अगले ही दिन या उसके तुरंत बाद, उसी व्यक्ति को बिना किसी 'कूलिंग पीरियड' के दूसरे राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर दिया जाता है. साधारणतया, ऐसे व्यक्ति से राज्यपाल के रूप में संवैधानिक कार्यों का निर्वहन करते समय दलीय राजनीति से विरक्ति या तटस्थता की उम्मीद करना कठिन होता है."
सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों ने यह स्वीकार किया है कि हाल के वर्षों में गठबंधन सरकारें एक दुर्लभता के बजाय एक सामान्य नियम बन गई हैं. अदालत ने टिप्पणी की है: "कई राज्यों में और वास्तव में केंद्र में भी गठबंधन सरकारें कार्यरत हैं. चुनाव के बाद के तालमेल में कुछ भी गलत नहीं है, और जब वैचारिक समानता किसी राजनीतिक दल को दूसरे दल का समर्थन करने के लिए प्रेरित करती है, भले ही उनके बीच चुनाव-पूर्व कोई गठबंधन न रहा हो... तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है."

