आकार पटेल: भाजपा मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार चाहती है
इस महीने इस शीर्षक के तहत एक ख़बर आई: 'भाजपा की बंगाल सूची में किसी भी मुस्लिम नाम को जगह नहीं मिली'. इस ख़बर में आगे पाठकों को आँकड़े दिए गए—यानी, कितने टिकट बाँटे गए वग़ैरह—लेकिन उस शीर्षक के परे, जोड़ने के लिए बहुत कुछ नहीं है. यह हम में से ज़्यादातर लोगों को हैरान नहीं करता है, क्योंकि 2014 से आए आँकड़ों ने हमें सिखा दिया है कि भाजपा क्या चाहती है. पिछली तीन लोक सभाओं में, भारतीय जनता पार्टी ने 282, 303 और 260 सीटें जीती हैं, जिनमें कोई भी मुस्लिम नहीं है. राज्य सभा में इसके 100 से अधिक सांसद हैं जिनमें कोई मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं है.
लगभग एक दशक पहले, यह ख़बर आई थी कि पूरे भारत में इसके एक हज़ार से अधिक विधायक थे, जिनमें से सिर्फ़ एक मुस्लिम था. केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है—ऐसा हम 1947 के बाद पहली बार देख रहे हैं. फिर से, यह हमें हैरान नहीं करता है क्योंकि, अगर भाजपा के बारे में किसी एक चीज़ की तारीफ़ की जानी चाहिए, तो वह उसकी ईमानदारी है.
पार्टी, ख़ासकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले अपने मौजूदा स्वरूप में, इस तथ्य के बारे में स्पष्ट है कि वह भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग का पूर्ण बहिष्कार चाहती है, जिसके ख़िलाफ़ वह ऐतिहासिक नाराज़गी रखती है. हमें इस भावना के गुण-दोषों में जाने की ज़रूरत नहीं है, सिवाय यह स्वीकार करने के कि पार्टी और उसके कई समर्थक ऐसा ही महसूस करते हैं. विचार करने वाला मुद्दा कुछ और है: जब भाजपा—और विशेष रूप से प्रधानमंत्री—इस बहिष्कार को बढ़ावा देने को लेकर इतने स्पष्ट हैं, तो फिर हम 'सबका साथ, सबका विश्वास' जैसे नारे और '140 करोड़ भारतीयों' के संदर्भ क्यों सुनते हैं? पार्टी और इसके नेता उतने ही ईमानदार हो सकते हैं और ऐसे नारे गढ़ सकते हैं जो उनके व्यवहार की तरह ही बहिष्कार वाले हों, लेकिन वे ऐसा नहीं करते हैं. क्यों? इसका जवाब देने के दो तरीक़े हैं, और पहला वाला कम पेचीदा है. ये नारे उन लोगों को शांत करने के लिए गढ़े और दोहराए जाते हैं जो ऐसे मुद्दों को लेकर चिंतित रहते हैं. इनके बहुत मायने नहीं हैं क्योंकि बहिष्कार की वास्तविकता व्यवहार में स्पष्ट है. यह जवाब ख़ास तौर पर संतोषजनक नहीं है, क्योंकि यह इस बात को संबोधित नहीं करता कि भाजपा को अपनी कार्यप्रणाली की पारदर्शिता को देखते हुए, आख़िर ऐसा करने की ज़रूरत ही क्यों है. यह इस तथ्य का भी हिसाब नहीं देता है कि, मुसलमानों के बहिष्कार और उत्पीड़न के बारे में पूरी तरह से मुखर और बेझिझक होकर, प्रधानमंत्री ने ऐसे कई लोगों का दिल जीत लिया है जो इस तरह का व्यवहार और इस तरह का समाज चाहते हैं.
पार्टी और प्रधानमंत्री के इस विरोधाभास में मजबूर होने की असली वजह यह है कि पूर्ण बहिष्कार की उनकी इच्छा भारतीय समाज और संस्कृति के अनुकूल नहीं बैठती है. अपने घोषणापत्र में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' जैसे वाक्यांशों का आह्वान कौन करता है? यह विपक्ष या बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है— यह भाजपा है. पार्टी अपना संदेश पेश करते समय भारतीय ज्ञान का सहारा लेती है, भले ही वह किसी और चीज़ को बढ़ावा दे रही हो. बेशक, भाजपा के अधिक स्पष्ट एजेंडे के लिए एक समर्थक वर्ग मौजूद है, लेकिन यह उसके कुल मतदाता आधार से छोटा है. यही कारण है कि 'विकास' पार्टी के मंच का एक इतना बड़ा हिस्सा है, या कम से कम हुआ करता था. कठोर तत्वों को औपचारिक घोषणाओं में छिपाया जाना चाहिए, ख़ासकर जब व्यापक दुनिया के साथ जुड़ रहे हों. हमारे बेचारे राजनयिकों को इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि स्वदेश में बर्बरतापूर्वक काम करें और विदेश में उदार होने का दिखावा करें.
अमेरिका की अपनी एक यात्रा पर, विदेश मंत्री जयशंकर का डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जनरल एच.आर. मैकमास्टर के साथ एक साक्षात्कार हुआ था. जनरल, जो भारत से परिचित हैं और यहाँ का दौरा भी कर चुके हैं, ने पूछा: 'मैं आपसे यह पूछना चाहता था कि आप अपने देश में हो रहे राजनीतिक घटनाक्रमों को कैसे देखते हैं. आप कोई पक्षपाती व्यक्ति नहीं हैं. आपने कई प्रशासनों में बड़ी विशिष्टता के साथ काम किया है. महामारी के बीच, इनमें से कुछ हिंदुत्ववादी नीतियों को लेकर चिंता है जो भारतीय लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को कमज़ोर कर सकती हैं... क्या भारत के मित्रों का इन हालिया रुझानों में से कुछ को लेकर चिंतित होना सही है?' जयशंकर ने सीधे तौर पर सवाल का जवाब देने से परहेज़ किया और इसके बजाय राशन वितरण और नक़द हस्तांतरण के बारे में बात की. उन्होंने मैकमास्टर द्वारा उठाई गई हिंदुत्ववादी नीतियों से जुड़ी विशिष्ट चिंताओं का समाधान नहीं किया. ये चिंताएँ क्या हैं? इनमें नागरिकता में धर्म को शामिल करना; मुस्लिम विवाह और तलाक़ के पहलुओं को अपराध की श्रेणी में डालने वाले नए क़ानून; गोमांस रखने को अपराध घोषित करने वाले क़ानून; गुजरात में मुसलमानों को ज़बरदस्ती अलग-थलग बस्तियों में सीमित करना; भारत के केवल एक हिस्से — कश्मीर — में भीड़ पर शॉटगन का इस्तेमाल; और सरकार द्वारा मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना शामिल है, जिसमें कोविड फैलाने का आरोप भी शामिल है. ये वे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर भारत के मित्र चिंतित थे. जयशंकर ने एक बार भी 'हिंदुत्व' शब्द का इस्तेमाल किए बिना और उन क़ानूनों का ज़िक्र किए बिना जवाब दिया, जिनके लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा है.
बेशक, उनके द्वारा इस बहस से बचने की वजह यह है कि इसके बचाव में कहने के लिए बहुत कम है. इस आरोप—जिसे आलोचक वैध मानते हैं—कि भारत ऐसी नीतियों के ज़रिए ख़ुद को और अपने लोगों को नुक़सान पहुँचा रहा है, का जवाब देने का एकमात्र तरीक़ा बातों को घुमाना और टालमटोल करना ही था. इससे उन लोगों को कुछ उम्मीद मिलनी चाहिए, भले ही वह महज़ एक किरण ही क्यों न हो, जो हमारे समाज के बारे में चिंता करते हैं—कि यह कहाँ आ गया है और किधर जा रहा है. यदि धर्म के आधार पर बँटवारे को बढ़ावा देने वालों को भी चुनौती दिए जाने पर खुले तौर पर अपने रुख़ का बचाव करना असहज लगता है, तो यह दर्शाता है कि अंततः हम ऐसा नहीं बनना चाहते, और न ही हम वास्तव में ऐसे हैं.
आकार पटेल भारतीय लेखक, स्तंभकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.

