वीवीपी शर्मा | संस्थापक और उत्तराधिकारी: संकट क्यों बन जाता है राजनीतिक उत्तराधिकार
वरिष्ठ पत्रकार वीवीपी शर्मा के राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित रपट. जानिए कैसे मैक्स वेबर और रॉबर्ट मिशेल्स के सिद्धांतों के आलोक में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का हालिया संकट नेतृत्व परिवर्तन, विरासत और उत्तराधिकार की आंतरिक स्वीकार्यता की कमी को उजागर करता है.
आकार पटेल | नये भारत का जायजा
वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल के इस विशेष विश्लेषणात्मक लेख के अनुसार, असम और गुजरात जैसे राज्यों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ संपत्ति खरीद-बिक्री के नियमों को कड़ा कर 'घेटोकरण' और 'अपार्थेड' (अलगाव) जैसी व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया जा रहा है. असम में भाजपा द्वारा दो अलग-अलग धर्मों के बीच ज़मीन सौदों के लिए स्पेशल ब्रांच पुलिस जांच की अनिवार्यता और गुजरात में 'डिस्टर्ब्ड एरियाज़ एक्ट' (अशांत क्षेत्र अधिनियम) के तीन दशकों से जारी विस्तार पर लेखक ने गंभीर सवाल उठाए हैं. लेख में 2009 और 2019 के संशोधनों, कलेक्टर के विवेकाधीन अधिकारों, छह साल की जेल के प्रावधान और अमेरिका के 'फेयर हाउसिंग एक्ट' की तुलना के माध्यम से 'गुजरात मॉडल' की अंतर्निहित प्राथमिकताओं पर विस्तृत विश्लेषण पढ़ें.
सत्य सागर | भारत की ब्लिंकिट लोकतंत्र: धोखा एक बिज़नेस मॉडल के रूप में
वरिष्ठ पत्रकार सत्य सागर के इस विशेष विश्लेषणात्मक लेख के अनुसार, पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद हुए दलबदल ने साबित किया है कि भारतीय राजनीति अब विचारधारा या जनसेवा नहीं, बल्कि एक सफल व्यावसायिक उद्यम बन चुकी है. भाजपा ने समकालीन भारतीय पूंजीवाद और शहरी मध्यवर्ग की उपभोक्तावादी संस्कृति को मिलाकर एक ऐसा कॉर्पोरेट मॉडल तैयार किया है, जिसके सामने पारंपरिक विपक्ष एक छोटे पारिवारिक बिजनेस जैसा नजर आता है. लेखक ने चुनावी प्रणाली में आमूलचूल सुधार की वकालत करते हुए 'ब्लिंकिट लोकतंत्र' का विचार पेश किया है, जहां मतदाताओं को बंधुआ ग्राहक मानने के बजाय अमेज़न जैसी 'उत्पाद वापसी नीति' (राइट टू रीकॉल) और उपभोक्ता संरक्षण का अधिकार मिलना चाहिए. परीक्षा लीक और 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसे आंदोलनों के संदर्भ में पढ़ें राजनीति के इस नए बिज़नेस मॉडल की पूरी इनसाइड स्टोरी.
कैसे हिंदुत्व पश्चिम बंगाल में सत्ता-विरोधी लहर की भाषा बन गया
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ने राज्य के सियासी परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है, जहां भाजपा ने 207 सीटें जीतकर पहली बार सरकार बनाई है और सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. रिपोर्ट में विस्तार से विश्लेषण किया गया है कि कैसे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के खिलाफ उपजे जन-आक्रोश (जैसे स्कूल सर्विस कमीशन भर्ती घोटाला और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना) को भाजपा ने हिंदू पहचान और हिंदुत्व के वैचारिक ढांचे में समाहित किया. लेख में विजय रैलियों में बुलडोजर के इस्तेमाल, मायापुर में गौ-पूजा, तुष्टिकरण विरोधी संदेशों और बंगाल के दबे हुए सांप्रदायिक इतिहास पर शहरी मध्यवर्ग के बदलते रुख का पूरा राजनीतिक ब्योरा पढ़ें.
भारत की विपक्षी पार्टियों को ‘कॉकरोच आंदोलन’ से क्यों डरना चाहिए?
जून के पहले सप्ताहांत में दिल्ली की तपती गर्मी के बीच सैकड़ों युवाओं ने कॉकरोच के मुखौटे पहनकर एक अनोखा प्रदर्शन किया, जिसने सोशल मीडिया पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' नामक आंदोलन का रूप ले लिया है. शुरुआत में एक व्यंग्य और इंटरनेट मीम दिखने वाला यह अभियान अब भारत में बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ युवाओं की गहरी निराशा का प्रतीक बन चुका है. लेख में भाजपा की लगातार चुनावी सफलताओं के समानांतर आम जनता की वास्तविक चिंताओं के दरकिनार होने, पारंपरिक राजनीतिक दलों से नागरिकों के टूटते जुड़ाव और मुख्यधारा के विपक्ष के लिए इसे एक गंभीर चेतावनी के रूप में विश्लेषित किया गया है.
गिल्स वर्नियर्स | पार्टी का खेल बिगाड़ने वाले मतदाताओं की पसंद को खारिज कर रहे हैं
"राजनीतिक वैज्ञानिक गिल्स वर्नियर्स के इस विशेष वैचारिक लेख में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों द्वारा पाला बदलकर एनडीए (NDA) को समर्थन देने की अटकलों के बीच भारतीय राजनीति में बढ़ते दलबदल संकट का गहरा विश्लेषण किया गया है. लेखक ने महाराष्ट्र (शिवसेना-एनसीपी), मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गोवा के उदाहरणों के जरिए स्पष्ट किया है कि सामूहिक इस्तीफे और विभाजन कभी स्वतःस्फूर्त नहीं होते, बल्कि इनके पीछे सत्ताधारी दल (BJP) की सुनियोजित इंजीनियरिंग होती है. लेख में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के क्रूर क्षेत्रीय कारक, कमजोर वैचारिक आधार, व्यावसायिक राजनीति, दलबदल विरोधी कानून (1985) की कानूनी खामियों और लोकसभा व राज्यसभा के संसदीय गणित पर इसके दूरगामी लोकतांत्रिक प्रभावों का विस्तृत ब्योरा दिया गया है.
बिहार से बंगाल तक: कैसे गढ़े गए चुनावी नैरेटिव
बिहार और पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति में कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. बिहार में 2025 के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 243 में से 202 सीटें जीत लीं, जबकि पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनाव में भाजपा 77 से बढ़कर 207 सीटों तक पहुंच गई. दूसरी तरफ राजद और तृणमूल कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां बुरी तरह सिमट गईं. इन नतीजों ने विपक्षी दलों के साथ-साथ राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी चौंका दिया.
पराकला प्रभाकर : ममता को चुनाव अस्वीकार्य है, तो नतीज़ों का बहिष्कार करना चाहिए
इन विधानसभा चुनावों के बाद ही लोग यह सोचने लगे हैं कि चुनाव और अदालतें कोई उपाय नहीं हैं. भारत का विचार ख़तरे में है. यह सब चुनावी अंकगणित और हिसाब-किताब बनकर रह गया है. मैं काफ़ी समय से यह तर्क देता रहा हूँ कि समस्त विपक्ष को चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए और सभी विधायिकाओं — लोकसभा और राज्य विधानसभाओं — से अपनी सीटें छोड़ देनी चाहिए.
एसआइआर से सीआरपीएफ तक: वे पाँच कारक जिन्होंने बंगाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित की
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का संकेत देता है. जिस राज्य में लंबे समय तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, वहां भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार दो-तिहाई बहुमत के साथ जीत दर्ज की. यह जीत अचानक नहीं आई, बल्कि कई रणनीतिक, सामाजिक और संस्थागत कारकों के संयोजन का परिणाम है. इन कारकों को समझे बिना इस जनादेश का सही विश्लेषण संभव नहीं है.
जिस मगरमच्छ के लिए ममता ने नहर खोदी थी, उसी ने अंततः उन्हें निगल लिया; बंगाल जनादेश के निहितार्थ
जैसा कि ममता बनर्जी निस्संदेह महसूस करेंगी जब हार का अहसास गहराने लगेगा—किस्मत एक चंचल प्रेमिका की तरह होती है. वह हमेशा की तरह खुद को छोड़कर बाकी सभी को दोष देंगी, लेकिन बंगाल 2026 के फैसले का बड़ा निहितार्थ स्पष्ट है: उन्होंने उस उम्मीद और विश्वास को गंवा दिया है जो राज्य ने डेढ़ दशक तक चुनाव दर चुनाव उन पर जताया था.
आकार पटेल | ध्रुवीकरण की राजनीति
अगर आप एक सामान्य नागरिक हैं, तो आपके पास समर्थन करने और वोट देने के लिए अनेक पार्टियाँ हैं. डीएमके, एडीएमके, टीडीपी, एनसीपी, पीडीपी, टीएमसी, आईएनसी, जेडी(एस) और जेडी(यू) हैं, एनसीपी, टीआरएस, नई टीवीके, सीपीएम, सीपीआई और भी बहुत-सी पार्टियाँ हैं. अलग-अलग एजेंडे वाली पार्टियों की कोई कमी नहीं है.
श्रवण गर्ग | बंगाल चुनाव: ‘अमित शाह का दांव’ और ममता की हार के संकेत
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों और उनके व्यापक राजनीतिक असर पर चर्चा हुई. शुरुआती विश्लेषण में यह स्पष्ट किया गया कि यह चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम टीएमसी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘अमित शाह बनाम ममता बनर्जी’ का मुकाबला बन गया था, जिसमें बढ़त भाजपा के पक्ष में जाती दिख रही है.
चौराहे पर इंडिया गठबंधन: क्या जनता पार्टी जैसा प्रयोग संभव है?
इंडिया गठबंधन, भाजपा और एनडीए के अभेद्य चुनावी रथ को रोकने के लिए 1977 की जनता पार्टी की तर्ज पर एक ठोस और एकीकृत इकाई क्यों नहीं बन पाया? हालांकि विपक्षी एकता की कोशिशें जारी हैं, लेकिन एक पूर्ण 'विलय' या जनता पार्टी जैसा ऐतिहासिक प्रयोग अब भी एक दूर का सपना नजर आता है. इसके पीछे वैचारिक मतभेद, नेतृत्व का संकट और क्षेत्रीय राजनीति की विवशताएं प्रमुख कारण हैं.
नागरिकता की रेखाओं को फिर से खींच रहा है बंगाल का ‘एसआईआर’
पश्चिम बंगाल में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करती है. रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया अब केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं रह गई है, बल्कि यह "कौन भारत का नागरिक होने के योग्य है" इसकी रेखाएं फिर से खींच रही है. मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया (जैसे 'तार्किक विसंगति') इतनी धुंधली है कि लोगों को समझ नहीं आ रहा कि उनके नाम क्यों कटे?
श्रवण गर्ग | मोदी के डर से मुक्त होने का क्या यही सबसे अच्छा अवसर नहीं है ?
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के इस विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द बने प्रभावशाली तंत्र, उनकी छवि के ‘कल्ट’ में बदलने और उसके सामाजिक-राजनीतिक असर की गहराई से पड़ताल की गई है. लेख में यह सवाल उठाया गया है कि क्या देश की राजनीति एक व्यक्ति केंद्रित विमर्श में सिमटती जा रही है और इसका लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है. साथ ही, विपक्ष की रणनीति, जनता के मनोविज्ञान, डर की राजनीति और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की गई है. लेख पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह समय डर से मुक्त होकर लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने का सबसे उपयुक्त अवसर है.
आकार पटेल: भाजपा मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार चाहती है
ख़ासकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले अपने मौजूदा स्वरूप में, इस तथ्य के बारे में स्पष्ट है कि वह भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग का पूर्ण बहिष्कार चाहती है, जिसके ख़िलाफ़ वह ऐतिहासिक नाराज़गी रखती है. हमें इस भावना के गुण-दोषों में जाने की ज़रूरत नहीं है, सिवाय यह स्वीकार करने के कि पार्टी और उसके कई समर्थक ऐसा ही महसूस करते हैं. विचार करने वाला मुद्दा कुछ और है: जब भाजपा—और विशेष रूप से प्रधानमंत्री—इस बहिष्कार को बढ़ावा देने को लेकर इतने स्पष्ट हैं, तो फिर हम 'सबका साथ, सबका विश्वास' जैसे नारे और '140 करोड़ भारतीयों' के संदर्भ क्यों सुनते हैं?

