विद्या कृष्णन | मोदी कॉकरोच को मारने के लिए तोप का इस्तेमाल कर रहे हैं
हाल के हफ्तों में भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की गहरी असुरक्षा एक ऐसे घटनाक्रम में दिखाई दी है, जिसमें कुछ कॉलेज छात्रों द्वारा बनाए गए एक व्यंग्यात्मक मंच "कॉकरोच जनता पार्टी" को निशाना बनाया गया. यह मंच कोई राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया पर शुरू हुआ एक मज़ाक था, जिसने देखते ही देखते लाखों युवाओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.
कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत उस समय हुई जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोजगार युवाओं के पत्रकारिता और एक्टिविज्म की ओर जाने की प्रवृत्ति की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से की. इस टिप्पणी के जवाब में युवाओं ने व्यंग्य के माध्यम से एक काल्पनिक राजनीतिक मंच खड़ा कर दिया. इंस्टाग्राम और एक्स पर इस पहल को लाखों लोगों का समर्थन मिला. इसके बाद बीबीसी, सीएनएन, द गार्जियन और फ्रांस 24 जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी इसकी चर्चा की, जिससे सरकार का ध्यान इस ओर गया.
लेकिन युवाओं के असंतोष को समझने या उससे संवाद करने के बजाय सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की संप्रभुता के लिए खतरे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. इस समूह के सोशल मीडिया पेज भारत में उपलब्ध नहीं रहे. इसकी वेबसाइट भी बंद कर दी गई. सरकार के मंत्रियों ने इसके संस्थापक अभिजीत दिपके पर विदेशी प्रभाव में काम करने के आरोप लगाए और उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई की मांग तक पहुंच गई.
सोशल मीडिया पर बने एक व्यंग्यात्मक मंच के खिलाफ इस तरह की प्रतिक्रिया किसी कॉकरोच को मारने के लिए तोप चलाने जैसी लगती है.
यह व्यंग्यात्मक पहल भारत के युवाओं की उस बेचैनी का संकेत है जो बेरोजगारी, अनिश्चित भविष्य और लगातार बढ़ती चुनौतियों के बीच जी रहे हैं. वे ऐसे रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं जहां अवसर सीमित हैं. वे भीषण गर्मी, प्रदूषण और आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं. साथ ही उन्हें लगातार त्याग और धैर्य का पाठ पढ़ाया जाता है.
पिछले महीने ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने का मामला सामने आया. दूसरी ओर स्कूली छात्रों को मूल्यांकन से जुड़े विवादों का सामना करना पड़ा. इन घटनाओं पर निराशा जताने वाले छात्रों को सरकारी प्रसारक दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में "पाकिस्तानी" तक कहा गया. यह स्थिति बताती है कि अब हम ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां अपनी चिंता व्यक्त करने वाले युवाओं पर भी देशभक्ति के पैमाने लागू किए जा रहे हैं.
इन परीक्षा घोटालों से जुड़े तनाव के कारण कई छात्रों ने आत्महत्या तक कर ली, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उनके लिए कोई सार्वजनिक संवेदना नहीं दिखाई दी.
यह उदासीनता केवल शिक्षा के क्षेत्र तक सीमित नहीं है. मोदी की राजनीति का एक पैटर्न यह भी रहा है कि उनकी संवेदनाएं अक्सर भारतीय सीमाओं से दूर होने वाली त्रासदियों के लिए अधिक दिखाई देती हैं. तेलंगाना में एक ही दिन में 67 लोगों की मौत का कारण बनी भीषण गर्मी पर उन्होंने सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन चीन के शांक्सी प्रांत में खनन दुर्घटना में हुई मौतों पर शोक व्यक्त किया.
मोदी का शासन एक ऐसे कठोर प्रबंधक की तरह दिखाई देता है जहां हर आदेश के साथ निष्ठा की परीक्षा भी जुड़ी होती है. कभी लोगों से ईंधन बचाने को कहा जाता है, कभी विदेशी यात्राएं कम करने की सलाह दी जाती है, कभी उपभोग घटाने और अधिक काम करने का संदेश दिया जाता है. लेकिन यही संदेश तब विरोधाभासी लगते हैं जब प्रधानमंत्री स्वयं विदेश यात्राओं पर जाते दिखाई देते हैं.
हाल ही में यूरोप यात्रा के दौरान मोदी ने वहां की स्वतंत्र प्रेस के सवालों का सामना करने से भी परहेज किया. नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग स्वेंडसन ने उनसे पूछा कि वे दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते. मोदी बिना प्रतिक्रिया दिए आगे बढ़ गए. भारत से यह दृश्य देखना असामान्य था, क्योंकि यहां वर्षों से प्रधानमंत्री की खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस देखने को नहीं मिली है.
नॉर्वे दुनिया के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में पहले स्थान पर है जबकि भारत काफी पीछे है. इस घटना के बाद भारतीय दूतावास ने प्रेस वार्ता आयोजित की, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे मूल प्रश्न का उत्तर नहीं मिला.
स्वेंडसन को बाद में वही अनुभव झेलना पड़ा जिससे भारतीय पत्रकार अक्सर गुजरते हैं. उन्हें विदेशी एजेंट कहा गया, उनका निजी विवरण सार्वजनिक किया गया और सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान चलाया गया.
लेखिका का तर्क है कि चाहे मामला कॉकरोच जनता पार्टी का हो या नॉर्वे की पत्रकार का, स्वतंत्र सवाल और स्वतंत्र सोच मोदी सरकार तथा उसके समर्थक तंत्र को असहज कर देते हैं. यह प्रतिक्रिया सवाल पूछने वालों के बारे में कम और सत्ता की मानसिकता के बारे में अधिक बताती है.
पिछले कुछ वर्षों में नोटबंदी, अनुच्छेद 370, कोविड-19 प्रबंधन, पुलों के गिरने की घटनाएं, जल संकट और परीक्षा घोटालों जैसी घटनाओं ने लोगों के भीतर भरोसे को कमजोर किया है. आर्थिक विकास और प्रचार अभियानों के बावजूद आम लोगों के जीवन में मौजूद समस्याओं को छिपाना कठिन होता जा रहा है.
हर समाज को उम्मीद, अवसर और बेहतर भविष्य पर विश्वास की जरूरत होती है. लेकिन जब युवाओं को लगता है कि उनकी समस्याएं सुनी नहीं जा रहीं, तब व्यंग्य और विरोध नए रूपों में सामने आते हैं. कॉकरोच जनता पार्टी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है.
लोकतंत्र में व्यंग्य हमेशा से एक सुरक्षा वाल्व की तरह काम करता रहा है. युवाओं की शिकायतों को दबाने से असहमति खत्म नहीं होगी, बल्कि वह और तीखी हो सकती है. दक्षिण एशिया के कई देशों में युवा आंदोलनों ने राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत की है और अक्सर उनकी शुरुआत भी छोटे और साधारण दिखने वाले अभियानों से ही हुई थी.
विडंबना यह है कि जिस कॉकरोच जनता पार्टी को महत्वहीन साबित करने की कोशिश की जा रही है, वही आज भी चर्चा में है. दूसरी तरफ सरकार की बेचैनी लगातार दिखाई दे रही है. शायद यही कारण है कि यह बहस अब किसी सोशल मीडिया मजाक से कहीं बड़ी हो चुकी है. यह भारत के युवाओं, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े बड़े सवालों की बहस बन गई है.
विद्या कृष्णन एक खोजी पत्रकार हैं जो सामाजिक न्याय, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं.

