ताश के पत्तों की तरह क्यों बिखर रही है तृणमूल कांग्रेस?
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे बड़े संकट से गुजरती दिखाई दे रही है. विधानसभा चुनाव में हार के कुछ ही सप्ताह बाद पार्टी के भीतर बगावत, सांसदों और विधायकों की नाराजगी तथा संगठनात्मक कमजोरी खुलकर सामने आने लगी है. जिस पार्टी ने पिछले डेढ़ दशक तक बंगाल की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा, वही अब अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती का सामना कर रही है.
हार के बाद बढ़ती गई मुश्किलें
24 मई को ममता बनर्जी ने भाजपा को चेतावनी देते हुए कहा था कि बंगाल में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर जितना दबाव बनाया जाएगा, दिल्ली में भाजपा को उतनी ही राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी. लेकिन इसके बाद घटनाक्रम कुछ ऐसा बदला कि संकट भाजपा की बजाय तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ा हो गया.
सबसे पहले पार्टी के अधिकांश विधायकों ने नेतृत्व की इच्छा के खिलाफ जाकर अपना नेता प्रतिपक्ष चुन लिया. इसके बाद लोकसभा में भी पार्टी के सांसद दो खेमों में बंट गए. रिपोर्टों के मुताबिक तृणमूल के 28 सांसदों में से लगभग 20 सांसद भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ सहयोग करने के पक्ष में दिखाई दिए. यह स्थिति इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि तृणमूल लंबे समय से भाजपा की सबसे आक्रामक आलोचक रही है.
क्या अभिषेक बनर्जी बने संकट की वजह?
तृणमूल में उभरती बगावत का केंद्र ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को माना जा रहा है. असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि उनके नेतृत्व में पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हुईं और पुराने नेताओं को हाशिए पर धकेला गया.
चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अभिषेक की भूमिका पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे. उनका कहना था कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं और अनुभवी नेताओं की जगह चुनावी रणनीतिकारों और सलाहकारों को अधिक महत्व दिया जाने लगा. यही कारण है कि पार्टी का जमीनी संपर्क कमजोर होता गया.
दिलचस्प बात यह है कि बागी नेता ममता बनर्जी को अब भी अपना नेता मानते हैं. उनका विरोध सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली से जुड़ा हुआ है. इस वजह से कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसकी तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से की है, जहां नेतृत्व के उत्तराधिकार का प्रश्न राजनीतिक संकट का कारण बना था.
नेता प्रतिपक्ष का विवाद और खुली बगावत
तृणमूल कांग्रेस के भीतर संकट तब और स्पष्ट हो गया जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर विवाद खड़ा हो गया. पार्टी ने वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए चुना था, लेकिन कुछ विधायकों ने दावा किया कि उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से इस्तेमाल किए गए.
इसके बाद पुलिस जांच शुरू हुई और मामला राजनीतिक विवाद में बदल गया. कुछ ही दिनों बाद असंतुष्ट विधायकों ने अलग बैठक कर रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया. विधानसभा अध्यक्ष ने उनके नाम को तुरंत मंजूरी भी दे दी. तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, लेकिन तब तक यह स्पष्ट हो चुका था कि पार्टी के भीतर एक बड़ा समूह नेतृत्व से असंतुष्ट है.
भाजपा की भूमिका पर आरोप
तृणमूल कांग्रेस का वफादार गुट इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपा को जिम्मेदार ठहराता है. पार्टी नेताओं का आरोप है कि भाजपा सत्ता, राजनीतिक संरक्षण और जांच एजेंसियों के दबाव का इस्तेमाल कर तृणमूल नेताओं को अपने पक्ष में ला रही है.
उनका तर्क है कि जो नेता कल तक अभिषेक बनर्जी की प्रशंसा करते थे, वे अचानक उनके विरोधी कैसे बन गए? उनके अनुसार इसका कारण वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियां हैं. सत्ता से बाहर होने के बाद कई नेताओं को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताने लगी है और वे नए विकल्प तलाश रहे हैं.
संगठन की कमजोरी सबसे बड़ा कारण?
हालांकि तृणमूल कांग्रेस के संकट को केवल वंशवाद या भाजपा की रणनीति से नहीं समझा जा सकता. पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी भी एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है.
पिछले कुछ वर्षों में तृणमूल पर यह आरोप लगता रहा है कि वह अपने जमीनी संगठन की तुलना में चुनावी प्रबंधन और राजनीतिक सलाहकारों पर अधिक निर्भर हो गई है. चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था आई-पैक की भूमिका को लेकर भी पार्टी के भीतर असंतोष रहा है.
कई नेताओं का मानना है कि पार्टी ने धीरे-धीरे अपने पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे को कमजोर होने दिया. जब तक सत्ता थी, यह कमजोरी दिखाई नहीं दी. लेकिन सत्ता हाथ से निकलते ही संगठन के भीतर दरारें सामने आने लगीं.
यूसुफ पठान और 'पैराशूट राजनीति' का सवाल
पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान का मामला भी इसी बहस को मजबूत करता है. बहारामपुर से सांसद चुने जाने के बावजूद उन पर अपने क्षेत्र से दूरी बनाए रखने के आरोप लगे. तृणमूल लंबे समय से ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाने के लिए आलोचना झेलती रही है जिनकी पहचान चुनावी प्रचार से बनी लेकिन जिनकी जमीनी राजनीतिक पकड़ सीमित रही.
यह प्रवृत्ति पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को और बढ़ाती है, क्योंकि ऐसे नेता संकट के समय संगठन को संभालने में सक्षम नहीं होते.
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
तृणमूल कांग्रेस का मौजूदा संकट केवल कुछ नेताओं की बगावत नहीं है. यह उस व्यापक समस्या का संकेत है जो लंबे समय से पार्टी के भीतर विकसित हो रही थी. अभिषेक बनर्जी को लेकर असंतोष, भाजपा की कथित राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक ढांचे का कमजोर होना—इन तीनों ने मिलकर पार्टी को गहरे संकट में धकेल दिया है.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी को फिर से एकजुट कर पाएंगी? या फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति में वही होने जा रहा है जो कभी महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ हुआ था? आने वाले महीनों में इसका जवाब साफ हो जाएगा, लेकिन फिलहाल तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखरती हुई दिखाई दे रही है.

