‘पहले से तय नाकामी’: क्या मोदी सरकार अपनी ही जाति जनगणना को कमजोर कर रही है?

‘स्क्रोल’ के मुताबिक, अप्रैल 2025 में मोदी सरकार ने बड़ा यू-टर्न लेते हुए घोषणा की कि भारत की अगली जनगणना में जातियों की गणना भी की जाएगी. उस समय सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि अधिकांश राजनीतिक दल जाति जनगणना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन सरकार ने जनगणना की जगह सामाजिक-आर्थिक एवं जाति सर्वेक्षण कराया. अब एक साल बाद मोदी सरकार ने जाति गणना के लिए उसी तरह की प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया है, जिसने 2011 में भारी अव्यवस्था पैदा की थी. इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार की अपनी जाति जनगणना को ही “फेल होने के लिए डिजाइन” किया जा रहा है.

जनसंख्या गणना का चरण जल्द शुरू होगा और 1931 के बाद पहली बार जाति को आधिकारिक जनगणना का हिस्सा बनाया जाएगा. गणनाकर्मी पहले यह पूछेंगे कि व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है या नहीं. इसके बाद उससे अपनी जाति बताने को कहा जाएगा. व्यक्ति के पास यह विकल्प भी होगा कि वह जाति न बताए या खुद को किसी जाति से जुड़ा हुआ न बताए.

विवाद की सबसे बड़ी वजह जाति के लिए रखा गया खुला प्रश्न है. 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जाति सर्वेक्षण में भी लोगों से खुलकर अपनी जाति बताने को कहा गया था. नतीजा यह हुआ कि करीब 46 लाख अलग-अलग प्रविष्टियां सामने आईं. एक ही जाति के अलग-अलग नाम, स्थानीय पहचान और वर्तनी की गलतियों ने डेटा को इतना जटिल बना दिया कि उसे उपयोगी रूप में जारी ही नहीं किया जा सका.

समाजशास्त्री सतीश देशपांडे इसे “planned failure” यानी पहले से तय नाकामी बताते हैं. उनके अनुसार केवल स्पेलिंग में अंतर के कारण हजारों अलग-अलग प्रविष्टियां बन सकती हैं. उनका सुझाव है कि राज्यों के पास पहले से उपलब्ध जातियों की सूची को डिजिटल ड्रॉप-डाउन विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाए. जिनकी जाति सूची में न मिले, उनके लिए “अन्य” का विकल्प हो और बाद में विशेषज्ञ समितियां क्षेत्रीय स्तर पर डेटा को व्यवस्थित करें.

योगेंद्र यादव का आरोप है कि मौजूदा डिजाइन सरकार में जाति गणना के प्रति राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखाता है. उनका सवाल है कि जब सरकार जातियों की एक संरचित सूची तक तैयार नहीं करना चाहती, तो बाद में करोड़ों अव्यवस्थित प्रविष्टियों को साफ करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कहां से आएगी. उनके मुताबिक पूरी प्रक्रिया का मकसद डेटा को उपयोगी बनने से रोकना हो सकता है.

यह विवाद केवल तकनीकी नहीं, बल्कि ओबीसी राजनीति और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है. प्रस्तावित प्रक्रिया में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान अलग से दर्ज की जाएगी, लेकिन ओबीसी को अलग श्रेणी के रूप में नहीं पूछा जाएगा. 1980 में मंडल आयोग ने ओबीसी की आबादी करीब 52 प्रतिशत आंकी थी. विपक्षी दलों और सामाजिक न्याय आंदोलनों का तर्क है कि विश्वसनीय जातिगत डेटा के बिना ओबीसी की वास्तविक आबादी और उनके प्रतिनिधित्व का सही आकलन संभव नहीं है.

कांग्रेस और राहुल गांधी लगातार जाति जनगणना को सामाजिक न्याय और आरक्षण की बहस से जोड़ते रहे हैं. राहुल गांधी ने सत्ता में आने पर आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा हटाने की बात कही है. लेकिन इसके लिए अदालतों के सामने ठोस और विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत होगी. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट बार-बार नीतियों और आरक्षण के लिए डेटा की मांग करता है, लेकिन देश में व्यापक और विश्वसनीय जातिगत आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं.

बिहार ने अपने जाति सर्वेक्षण में दिखाया कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग मिलाकर राज्य की आबादी का 63 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं. तेलंगाना ने भी अपेक्षाकृत संरचित तरीके से जाति सर्वेक्षण कराया. आलोचकों का सवाल है कि केंद्र सरकार ने इन राज्यों के अनुभवों से सीखने के बजाय 2011 के उसी मॉडल को क्यों चुना, जिसके आंकड़े कभी उपयोगी रूप में सामने नहीं आए.

कांग्रेस के ओबीसी विभाग और ओबीसी संगठनों का आरोप है कि यह प्रक्रिया ओबीसी समुदाय के साथ राजनीतिक धोखा है. कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि भाजपा ने बिहार चुनाव के राजनीतिक दबाव में जाति जनगणना पर अपना रुख बदला था, लेकिन अब उसके वास्तविक क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं दिखा रही.

हालांकि इस बहस का दूसरा पक्ष भी है. कांग्रेस सांसद और डेटा विशेषज्ञ प्रवीण चक्रवर्ती का मानना है कि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से “राजपूत” और “रजपूत” जैसी अलग-अलग स्पेलिंग को एक ही जाति के रूप में पहचाना जा सकता है. यानी खुला प्रश्न खराब तरीका जरूर है, लेकिन 2011 की तुलना में आज डेटा को साफ करना तकनीकी रूप से आसान हो सकता है. सतीश देशपांडे भी मानते हैं कि डेटा को व्यवस्थित करना असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए कहीं ज्यादा मेहनत और राजनीतिक प्रतिबद्धता चाहिए.

यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल है. मोदी सरकार ने जाति जनगणना की मांग स्वीकार कर ली है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. क्या यह प्रक्रिया वास्तव में देश की सामाजिक संरचना का विश्वसनीय नक्शा तैयार करेगी, या फिर करोड़ों लोगों की जानकारी इकट्ठा होने के बावजूद डेटा इतना बिखरा होगा कि उससे सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व से जुड़े ठोस फैसले नहीं लिए जा सकेंगे? आलोचकों के मुताबिक यही तय करेगा कि जाति जनगणना ऐतिहासिक सुधार बनेगी या फिर सरकार की अपनी ही योजना की “पहले से तय नाकामी”.

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