राकेश कायस्थ | बांकीपुर का नतीजा बताता है कि प्रशांत किशोर ने विपक्ष से ज्यादा भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार एवं व्यंग्यकार राकेश कायस्थ बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की बदलती भूमिका और बांकीपुर उपचुनाव में उनकी जीत के राजनीतिक मायनों पर विस्तार से चर्चा करते हैं. बातचीत इस सवाल से शुरू होती है कि जिन प्रशांत किशोर ने पिछले डेढ़ दशक में नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, एम. के. स्टालिन और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं की चुनावी जीत की रणनीति तैयार की, वही जब खुद राजनीति में उतरे तो पहले विधानसभा चुनाव में बुरी तरह असफल रहे. अब बांकीपुर से मिली जीत ने उन्हें एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है.
राकेश कायस्थ का मानना है कि प्रशांत किशोर को केवल भाजपा की "बी टीम" कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं है. उनके अनुसार, अधिक महत्वपूर्ण यह समझना है कि वे बिहार की राजनीति में किस खाली स्थान को भरने की कोशिश कर रहे हैं. बांकीपुर के नतीजे बताते हैं कि उन्होंने सिर्फ विपक्ष का ही नहीं, बल्कि भाजपा के परंपरागत शहरी और सवर्ण वोट बैंक में भी सेंध लगाई है. इससे यह संकेत मिलता है कि बिहार का एक वर्ग पारंपरिक राजनीति से अलग किसी नए विकल्प की तलाश में है.
चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि प्रशांत किशोर अपनी राजनीति को जातीय समीकरणों से आगे ले जाकर बिहार के विकास, पलायन, शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर केंद्रित करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सभाओं में केवल सरकार ही नहीं, बल्कि मतदाता से भी सवाल पूछे जाते हैं. राकेश कायस्थ के अनुसार, यह शैली आज की राजनीति में असामान्य है, क्योंकि अधिकांश नेता अपने समर्थकों को खुश रखने की राजनीति करते हैं, जबकि प्रशांत किशोर मतदाता को भी उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी का एहसास कराने का प्रयास करते हैं.
हालांकि, उनकी राजनीति पर गंभीर सवाल भी उठते हैं. राष्ट्रीय मुद्दों, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और केंद्र सरकार की नीतियों पर उनका स्पष्ट रुख दिखाई नहीं देता. बातचीत में यह आशंका भी जताई गई कि वे अपने संभावित समर्थकों को नाराज करने से बचने के लिए कई संवेदनशील विषयों पर रणनीतिक चुप्पी साधे हुए हैं. यही कारण है कि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर बहस लगातार बनी हुई है.
बातचीत तेजस्वी यादव की राजनीति पर भी केंद्रित होती है. राकेश कायस्थ का कहना है कि 2020 के बाद तेजस्वी यादव बिहार के लिए कोई नया राजनीतिक दृष्टिकोण या विकास का स्पष्ट खाका पेश नहीं कर सके हैं, जबकि प्रशांत किशोर लगातार राज्य के मूल आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
चर्चा के अंत में निधीश त्यागी कहते हैं कि प्रशांत किशोर को अभी सफल राजनीतिक कहानी कहना जल्दबाजी होगी. फिलहाल वे भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण प्रयोग हैं. आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि बांकीपुर की जीत केवल एक उपचुनाव की सफलता थी या बिहार में वैकल्पिक राजनीति की किसी नई शुरुआत का संकेत. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

