राकेश कायस्थ | अमृतकाल के अ-राजनीतिक चोट्टे

अ-राजनीतिक कुछ भी नहीं होता है. दुनिया की हर चीज़ राजनीतिक होती है. देश को ज्यादा बड़ा खतरा स्वयंभू अ-राजनीतिक या अर्ध-शिक्षित राजनीतिक लोगों से हैं. वैज्ञानिक, शिक्षाविद, स्थानीय अधिकारों के योद्धा सोनम वांगचुक पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी धारा लगाकर उन्हें जेल में डाला.

अचानक सारे चार्ज वापस ले लिये गये और सोनम जेल से रिहा हो गये. क्या इस देश का कानून सिर्फ सत्ता के हाथों का खिलौना है कि जिस पर चाहे देशद्रोह की धारा लगा दें और जब चाहे हटा लें?

कायदे से इस अपमान के लिए सोनम वांगचुक को केंद्र सरकार को अदालत में घसीटना चाहिए था और सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ राष्ट्रव्यापी कैंपेन करना चाहिए था लेकिन उन्होंने ये सब कुछ नहीं किया.

जब देश छात्रों के बीच असंतोष बढ़ा और जंतर-मंतर का धरना शुरू हुआ तो वांगचुक छात्रों के समर्थन में आये. यहां तक ठीक था लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ वो हर किसी की आंखें खोलने वाला है.

वांगचुक ने पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को जंतर-मंतर ना आने के लिए कोसा और फिर उनकी पत्नी ने प्रधानमंत्री के घर के बाहर विपक्ष के धरने की आलोचना की. ये व्यवहार कुछ ऐसा है, जैसे वांगचुक दंपत्ति ये मान रहे हैं कि अनशन की वजह से पेपर लीक प्रकरण पर उनका कॉपी राइट हो गया है और विपक्ष को उनसे अनुमति लेनी पड़ेगी कि इस मुद्दे पर कब कहां और कैसे बोलना है.

जिस केंद्र सरकार के खिलाफ वांगचुक का अनशन था, उन्हीं के मंत्रियों के हाथों जूस पीकर उन्होंने बिना एक भी मांग पूरी हुए अपना अनशन तोड़ दिया. ठीक से सोचियेगा के इस प्रकरण में समझने लायक बातें क्या है.

अन्ना हजारे के तथाकथित गैर-राजनीतिक आंदोलन ने जो बोया उसकी जहरीली फसल पूरा देश आज तक काट रहा है. अगर शिक्षा की पूरी संरचना ध्वस्त हो चुकी है तो इस मूल कारण प्रधानमंत्री मोदी का अनपढ़ होना और आरएसएस के अफलातूनी आइडियाज़ को लागू किया जाना है.

देश भर में एक लाख के करीब सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं. अच्छे सरकारी शैक्षणिक संस्थानों को जान-बूझकर खराब किया जा रहा है. फीस बेतहाशा बढ़ाई जा रही है. जो निजी शिक्षण संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं, उनमें लुटेरे राजनेता और भ्रष्ट अफसरों का बेशुमार पैसा लगा हुआ है. ग्रेजुएशन स्तर की जो डिग्री सरकारी कॉलेजों से बहुत सस्ते में मिल जाती थी, लिफाफेबाजी करके निजी संस्थान उन्हें लाखों में बेच रहे हैं और नादान अभिभावक यह धोखाधड़ी समझ नहीं पा रहे है.

यह सब नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली ग्लोबल आईटी सम्मिट में गलगोटिया वालों से चोरी का चाइनीज़ रोबो कुत्ता अपना बताकर प्रदर्शित करवाती है और बड़ी टेक कंपनियों के सीईओ को लाइन लगाकर राजनीतिक रैली की तरह हाथ उठाने को मजबूर करती है. ये अलग बात है कि भारत से निकलते ही ये सीईओ मोदी की जमकर खिल्ली उड़ाते हैं.

क्या किसी न्यूज़ चैनल ने पिछले 12 साल में कोई ऐसा कार्यक्रम या डिबेट किया है, जिसमें पिछली यूपीए सरकार की शिक्षा नीति और मौजूदा सरकार की नीतियों की तथ्यपरक तुलना की गई हो? न्यूज़ चैनल ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि संघ-बीजेपी के वृहत एजेंडे के तहत उन्हें भारत को सस्ते मजदूरों वाला अनपढ़ देश बनाना है. इस राजनीति के खिलाफ जो भी बोलेगा उसपर ‘राजनीति करने’ का इल्जाम लगेगा.

राजनीति ने शिक्षा व्यवस्था चौपट की है और सिर्फ पढ़े लिखे लोगों की बेहतर राजनीति ही इसे सुधार सकती है.

Previous
Previous

अरावली समिति द्वारा ऑनलाइन सुझाव मांगे जाने का ग्रामीण हितधारक कैसे पालन करेंगे?

Next
Next

जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों में पारंपरिक मीडिया क्यों निशाने पर है?