जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों में पारंपरिक मीडिया क्यों निशाने पर है?

‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर, जो लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है, एक नए तरह के टकराव का गवाह बना. यहाँ नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मूल्यांकन में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की माँग को लेकर युवाओं का आंदोलन जारी है. लेकिन इन मुद्दों के साथ एक और सवाल प्रमुखता से उभरा है कि मुख्यधारा का मीडिया प्रदर्शनकारियों के निशाने पर क्यों है?

कॉकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े छात्र समूहों ने कई मौकों पर पत्रकारों का विरोध किया. कुछ संवाददाताओं को हूटिंग का सामना करना पड़ा तो कुछ कैमरा टीमों को प्रदर्शन स्थल छोड़ना पड़ा. प्रदर्शनकारियों ने उन्हें "गोदी मीडिया" कहकर संबोधित किया. यह केवल नाराजगी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मीडिया के प्रति गहराते अविश्वास का संकेत है.

"गोदी मीडिया" शब्द कहाँ से आया?

"गोदी मीडिया" शब्द को वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने लोकप्रिय बनाया. वर्ष 2014 के बाद यह शब्द उन मीडिया संस्थानों की आलोचना के लिए इस्तेमाल होने लगा, जिन पर सत्ता के पक्ष में खड़े होने और सरकार के पक्ष को आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं.

"गोदी" शब्द उस मीडिया की छवि प्रस्तुत करता है, जो सत्ता की गोद में बैठकर स्वतंत्र पत्रकारिता के बजाय सत्ता समर्थक भूमिका निभाता हुआ दिखाई देता है. समय के साथ यह शब्द मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण, दर्शक संख्या आधारित पत्रकारिता और जवाबदेही की कमी से जुड़ी बहसों का प्रतीक बन गया.

जंतर-मंतर का आंदोलन कैसे शुरू हुआ?

जंतर-मंतर का यह आंदोलन जून 2026 में शुरू हुआ. कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत सामाजिक माध्यमों पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया के रूप में हुई थी, जिसके बाद यह सड़क पर उतर आया.

आंदोलन की प्रमुख माँगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में सुधार, प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए ठोस व्यवस्था और प्रभावित छात्रों को मुआवजा शामिल हैं. पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आमरण अनशन और 20 जुलाई के "चलो संसद" मार्च के बाद इस आंदोलन ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया. यह आंदोलन अब शिक्षा और रोजगार से जुड़े व्यापक सवालों का प्रतीक बन चुका है.

मुख्यधारा का मीडिया विरोध के केंद्र में क्यों है?

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मुख्यधारा के मीडिया ने आंदोलन को पर्याप्त कवरेज नहीं दी. उनका कहना है कि जिस आंदोलन को सामाजिक माध्यमों पर व्यापक समर्थन मिल रहा था, उसे समाचार चैनलों और बड़े मीडिया संस्थानों ने लंबे समय तक नजरअंदाज किया.

जब पत्रकार प्रदर्शन स्थल पर पहुँचे, तो उन पर पक्षपातपूर्ण सवाल पूछने के आरोप लगे. प्रदर्शनकारियों के अनुसार, कई संवाददाता आंदोलन के मूल मुद्दों से हटकर छात्रों से "नीट की वर्तनी बताइए" या "कॉकरोच की वर्तनी बताइए" जैसे सवाल पूछ रहे थे. कुछ मामलों में मीडिया पर आंदोलन को राजनीतिक या राष्ट्रवादी बहस की दिशा में मोड़ने के आरोप भी लगे.

इन्हीं कारणों से कई प्रदर्शनकारी मीडिया को सत्ता के विस्तार के रूप में देखते हैं, न कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में.

पत्रकारों के सामने भी हैं चुनौतियाँ.

दूसरी ओर, जमीनी स्तर पर काम कर रहे पत्रकारों को भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. कई पत्रकारों ने हूटिंग, धमकी और असुरक्षित माहौल की शिकायत की है. महिला पत्रकारों को भी असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है.

मीडिया संस्थानों का कहना है कि मैदान में मौजूद पत्रकार अक्सर उन संस्थागत आलोचनाओं का सामना करते हैं, जिनके लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं होते. ऐसे ध्रुवीकृत माहौल में निष्पक्ष और तथ्यपरक रिपोर्टिंग करना भी एक बड़ी चुनौती है.

यह दूरी क्यों बढ़ रही है और इसे कैसे कम किया जा सकता है?

मीडिया और जनता के बीच बढ़ती दूरी के पीछे कई कारण हैं. वर्षों से मीडिया की विश्वसनीयता पर उठते सवाल, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव तथा युवाओं का वैकल्पिक डिजिटल मंचों पर बढ़ता भरोसा इस अविश्वास को मजबूत कर रहा है.

कॉकरोच जनता पार्टी जैसे आंदोलनों की डिजिटल और विकेंद्रीकृत प्रकृति ने इस टकराव को और अधिक स्पष्ट बना दिया है. सामाजिक माध्यमों के दौर में प्रदर्शनकारी अपनी बात सीधे जनता तक पहुँचा सकते हैं, जिससे पारंपरिक मीडिया की भूमिका चुनौती के दायरे में आ गई है.

इस स्थिति से निकलने के लिए मीडिया संस्थानों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह पत्रकारिता अपनानी होगी. वहीं प्रदर्शनकारियों को भी पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लोकतांत्रिक महत्व को स्वीकार करना होगा.

जंतर-मंतर पर मीडिया के खिलाफ दिखाई दे रही नाराजगी कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है. यह वर्षों से जमा होते अविश्वास और एक नए राजनीतिक रूप से जागरूक युवा आंदोलन के बीच टकराव का परिणाम है.

यदि मीडिया और जनता के बीच विश्वास की इस खाई को पाटने के प्रयास नहीं किए गए, तो यह केवल पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के बीच का संघर्ष नहीं रहेगा, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन सकता है.

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