डेटा सेंटर किस तरह दलित समुदायों को उनकी जमीन से बेदखल कर रहे हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित कर रहे हैं. फरवरी 2026 में नई दिल्ली के 'एआई इम्पैक्ट समिट' में गूगल, ओपनएआई और एंथ्रोपिक के प्रमुखों ने भारतीय दिग्गजों से मुलाकात की. 5 लाख से अधिक लोगों की भागीदारी वाले इस मंच पर पीएम मोदी ने आव्हान किया— "भारत में डिजाइन और विकास करें; दुनिया और मानवता को सौंपें."
माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ भारत में डेटा सेंटर बनाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं. इस कतार में ओपनएआई ने टाटा ग्रुप के साथ और अडानी ग्रुप ने नवीकरणीय ऊर्जा आधारित हाइपरस्केल डेटा सेंटरों के लिए $100 बिलियन के निवेश का संकल्प लिया है. सरकार इन निवेशों के बदले भूमि, बिजली पर रियायतें और 2047 तक टैक्स टालने (टैक्स ब्रेक) जैसी छूट दे रही है.
लेकिन मुंबई से लेकर चेन्नई तक, इस अनियंत्रित विकास की भारी कीमत सबसे कमजोर समुदायों, विशेषकर कम आय वाले दलित परिवारों को चुकानी पड़ रही है. डेटा सेंटरों के लिए उन्हें बेदखल किया जा रहा है या जमीन बेचने का दबाव बनाया जा रहा है. शमशीर यूसुफ और मोनिका झा ने ‘द वायर’ के लिए एक रिपोर्ट में विस्तार से बताया है कि पूरे भारत में रियल एस्टेट डेवलपर्स इसका फायदा उठा रहे हैं और जमीन के बड़े टुकड़ों को डेटा सेंटर बनाने के लिए डाइवर्ट कर रहे हैं. इस रिपोर्ट का सारांश कहता है: डेटा सेंटरों की चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली-पानी की मांग पूरा करने के लिए सरकार ने पुराने बिजली संयंत्रों को बंद करने की योजना टाल दी है और दर्जनों नए कोयला संयंत्रों को मंजूरी दी है. विशेषज्ञों का कहना है कि डेटा सेंटरों की पर्यावरणीय समीक्षा महज एक औपचारिकता है, क्योंकि इनके संचयी पर्यावरणीय प्रभाव या स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले संयुक्त दबाव का कोई समग्र मूल्यांकन नहीं किया जाता.
केस स्टडी 1: मुंबई में भूमि का संकट और 'जय भीम नगर' का विध्वंस
रियल एस्टेट डेवलपर्स उदार सरकारी सब्सिडी, लचीले जोनिंग नियमों और किफायती आवास बनाने की अनिवार्यता से छूट का फायदा उठाकर तेजी से डेटा सेंटर सेगमेंट की ओर बढ़ रहे हैं. यह संकट मुंबई में सबसे गंभीर है, जहाँ की आधी आबादी झुग्गियों में रहती है. डेटा सेंटरों की आमद ने भूमि की होड़ और किफायती आवास संकट को और गहरा कर दिया है.
जून 2024 में, मानसून की शुरुआत में, हीरानंदानी गार्डन्स टाउनशिप के पास 80 के दशक से बसी लगभग 650 दलित परिवारों की बस्ती 'जय भीम नगर' पर बुलडोजर चला दिया गया. 30 वर्षों से वहाँ रह रही श्रीमती चौहान ने बताया कि अधिकारियों ने उन्हें और उनके परिवार को घसीटकर बाहर निकाला और शाम तक पूरी बस्ती मलबे में बदल गई. डेवलपर हीरानंदानी ग्रुप यहाँ एक नया डेटा सेंटर बनाने की योजना बना रहा है. इस कार्रवाई का विरोध करने पर चौहान को जेल जाना पड़ा और उनका बेटा घायल हो गया.
हालांकि, बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांचकर्ताओं ने पाया कि ध्वस्तीकरण का आदेश देने वाले सरकारी आयोग के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था और यह कार्रवाई मानसून में बेदखली विरोधी कानूनों का उल्लंघन थी. अधिकांश निवासी इलाका छोड़ चुके हैं, लेकिन चौहान का परिवार प्लास्टिक की शीट और बांस के सहारे वहीं डटा है. उनका कहना है, "वे हमें बिखेरकर सब कुछ छीनना चाहते हैं, पर हम टस से मस नहीं होंगे."
केस स्टडी 2: विशाखापत्तनम में गूगल प्रोजेक्ट और 'तारलुवाड़ा' की जमीन
गूगल ने विशाखापत्तनम के पास संयुक्त राज्य अमेरिका से बाहर अपने सबसे बड़े 1 गीगावाट परिसर की घोषणा की है, जिसके लिए वह 5 वर्षों में $15 बिलियन निवेश करेगा. इसके बाद रातों-रात काजू, सागौन और फूलों के बागानों के लिए प्रसिद्ध 'तारलुवाड़ा' गाँव का नाम गूगल मैप्स पर "तारलुवाड़ा आईटी हब एंड डेटा सेंटर हब" हो गया.
गूगल यहाँ सरकार के साथ मिलकर 480 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर रहा है. तारलुवाड़ा में चिन्हित 200 एकड़ भूमि दलित परिवारों की है, जिन पर जमीन बेचने का भारी दबाव है. पूर्व ग्राम प्रधान और किसान पायला कोंडम्मा कहती हैं, "वे दबंग जातियों की जमीन को नहीं छू रहे हैं, केवल दलितों की जमीन ली जा रही है. लेकिन हम डरेंगे नहीं और अपनी जमीन नहीं सौंपेंगे."
विशाखापत्तनम जिले में 68% दलित परिवारों के पास जमीन नहीं है. 1970 के दशक में भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत भूमिहीन दलित परिवारों को प्रति परिवार दो एकड़ जमीन आवंटित की गई थी; अब उसी जमीन को गूगल प्रोजेक्ट के लिए वापस अधिग्रहित किया जा रहा है.
केस स्टडी 3: चेन्नई का एन्नोर— प्रदूषण और 'पावर-हंगर'
चेन्नई के बाहरी इलाके में स्थित एन्नोर का कट्टुकुप्पम गाँव 70 के दशक से कोयला बिजली संयंत्रों के प्रदूषण से जूझ रहा है. रासायनिक कचरे और गर्म पानी से नदियाँ व समुद्र प्रदूषित हुए, जिससे मछलियाँ कम हो गईं और स्थानीय मछुआरों की आजीविका छिन गई. प्रदूषण के कारण यहाँ कैंसर और बांझपन के मामले बढ़े.
2017 में एक पुराने संयंत्र के बंद होने से निवासियों को राहत मिली थी, लेकिन यह अस्थायी साबित हुई. 2025 में, सरकार ने डेटा सेंटरों जैसे "बिजली के भूखे उद्योगों" की मांग पूरी करने के लिए उसी जगह पर नए संयंत्र की घोषणा की. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार, राज्य 2035 तक ऊर्जा संकट से जूझेगा. एआई डेटा सेंटरों के कारण भारत सरकार ने अब तक 44 नए कोयला संयंत्रों को मंजूरी दी है.
एन्नोर के निवासियों की चिंताओं को अनसुना कर दिया गया है. वर्तमान में यहाँ एक संयंत्र का विस्तार हो रहा है और दो नए संयंत्र निर्माणाधीन हैं. 'सेव एन्नोर क्रीक कैंपेन' की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, तीनों संयंत्र चालू होने पर वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर पहुंच जाएगी. 'नेचर' जर्नल में प्रकाशित हार्वर्ड के अध्ययन के मुताबिक, कोयला संयंत्रों के प्रदूषक अन्य स्रोतों की तुलना में दोगुने घातक होते हैं, जिससे फेफड़े, लीवर और ब्लैडर के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. स्थानीय निवासी के. सरवनन कहते हैं, "वे हमारे स्वास्थ्य और शांति पर पड़ने वाले असर की जांच किए बिना एक के बाद एक संयंत्र लगाते जा रहे हैं. उन्होंने हमसे हमारा सब कुछ छीन लिया है."

