श्रवण गर्ग | राहुल अब रुकने वाले नहीं हैं ! ‘इंडिया’ साथ चलेगा क्या ?
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की आठ जून को दिल्ली में हुई बैठक में राहुल गांधी ने आख़िर ऐसा क्या कह दिया कि उसके बाद से बीजेपी और संघ में भी सन्नाटा है और विपक्ष के उन दलों के नेताओं के बीच भी जो उस मीटिंग में उपस्थित थे ? क्या राहुल ने ऐसा कह दिया कि गठबंधन के सहयोगी दल अगर बीजेपी और संघ के साथ लड़ाई अपने पुराने तरीक़ों से ही जारी रखना चाहते हैं और कांग्रेस की तरह सड़कों पर उतर कर दमन के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की राजनीति से बचना चाहते हैं तो फिर अपनी लड़ाई वे ख़ुद लड़ें और बीजेपी से रक्षा करें ?
‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक के तीन दिन बाद जारी हुए राहुल की स्पीच के संक्षिप्त ऑडियो के बाद से देश की राजनीति में हलचल मच गई है और उनके कहे के अलग-अलग विश्लेषण किए जा रहे हैं ! राहुल ने बैठक में जो कहा उसे उनके दो दशकों से ज़्यादा समय की संसदीय राजनीति की सबसे आक्रामक अभिव्यक्ति या आज़ादी की दूसरी लड़ाई के लिए पार्टी का घोषणापत्र माना जा रहा है.
राहुल ने जो कहा उसे इस नज़रिए से देखा जाना चाहिए है कि बैठक में सोनिया गांधी भी उपस्थित थीं और पार्टी अध्यक्ष मल्लीकार्जुन खड़गे भी. इस बात पर शक ज़ाहिर किया जा सकता है कि अपने ज्ञात स्वभाव के विपरीत जाकर राहुल ने अपनी स्पीच को लेकर माँ सोनिया से पूर्व-स्वीकृति ली होगी या खड़गेजी अथवा पार्टी के किसी बड़े नेता को विश्वास में लिया होगा.वे कुछ ऐसा कुछ करने की जा रहे थे जिसके नतीजे कुछ भी निकल सकते हैं !
गठबंधन के सहयोगी दलों (सपा, माकपा,राजद,आदि )के नेताओं द्वारा की गई आलोचनाओं को मुस्कुराते हुए सुन लेने के बाद अपने संक्षिप्त भाषण में राहुल ने कहा :’ मुझे अफ़सोस है हमारे संगठन के सदस्यों के बीच कुछ भ्रम है. वह यह कि जिन राजनीतिक औज़ारों का इस्तेमाल वे अब तक करते आए हैं वे आगे भी काम कर पाएँगे.ऐसा मुमकिन नहीं हो पाएगा.बीजेपी देश के सभी संस्थानों (क़ानून-व्यवस्था, नौकरशाही, ख़ुफ़िया एजेंसियों, चुनाव आयोग )पर क़ब्ज़ा कर चुकी है.’
( पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम चार जून को आने के पहले ही VVPAT की पर्चियों किसी कूड़े के ढेर में मिलती हैं. विपक्ष पचास से ज़्यादा सीटों के नतीजों पर आपत्ति जताता है.कोई कार्रवाई नहीं होती. और फिर 11 जून को खबर आती है कि चार हज़ार EVM जलकर राख हो गईं.उसके बाद TMC के दो-तिहाई से ज़्यादा सांसद और विधायक बीजेपी से जुड़ जाते हैं. लगभग तीन दशक पुराने एक राजनीतिक दल की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है.)
राहुल गांधी की स्पीच का उपसंहार यही मान सकते हैं कि विपक्षी दलों को अपने अस्तित्व की लड़ाई अब उन औज़ारों लड़ना होगी जिन पर कांग्रेस को भरोसा है. यानी विपक्षी गठबंधन के दल अगर उसके लिए तैयार नहीं हैं तो फिर कांग्रेस अकेले ही लड़ेगी और परिणामों का सामना भी करेगी. उसे दिखावे के गठबंधन की ज़रूरत नहीं है.
बीजेपी हुकूमत की बर्ख़ास्तगी और लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रतिरोध की जिस राजनीति की शुरुआत राहुल गांधी करना चाहते हैं वह निश्चित ही असीमित ख़तरों से भरी हुई है. एक ऐसी हुकूमत जिसके पितृ-संगठन में हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है, साध्य की प्राप्ति के लिए हिंसा के उपयोग के प्रति जिसका विरोध नहीं है, जो सांप्रदायिक हिंसा और विभाजन की राजनीति के ज़रिए सत्ताओं को प्राप्त कर उनपर क़ाबिज़ रहना चाहती है वह राहुल गांधी के अहिंसक प्रतिरोध की भ्रूण हत्या के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है.
मानकर चला जाना चाहिए कि राहुल गांधी इन सभी ख़तरों के प्रति सचेत हैं और उन्हें झेलने के लिए उनकी तैयारी भी है. सवाल यह है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक के वे सहयोगी दल जो पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल की उपस्थिति का लाभ ले चुके हैं अब उनके साथ ख़तरों में भी भागीदारी निभाएंगे कि नहीं ? ‘आम आदमी पार्टी’ की टूट के अनुभव से ममता ने कोई सबक़ नहीं लिया ! तृणमूल का हश्र सामने है. गेंद अब अखिलेश और उद्धव के पालों में है. राहुल अब रुकने वाले नहीं हैं !

