कार्टूनिस्ट मंजुल | 2016 के आसपास से यह निर्देश आने शुरू हो गए थे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का चेहरा कार्टून में नहीं दिखाना है.

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ कार्टूनिस्ट मंजुल के साथ जो सैको की मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित ग्राफिक नॉवेल को लेकर उठे विवाद पर चर्चा की. बातचीत के दौरान मंजुल ने इसे केवल एक किताब का मामला नहीं, बल्कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी और बढ़ती सेल्फ-सेंसरशिप का प्रतीक बताया.

मंजुल ने समझाया कि जो सैको केवल कार्टूनिस्ट नहीं, बल्कि ग्राफिक पत्रकार हैं, जो वर्षों की रिपोर्टिंग और शोध को चित्रों और कथाओं के जरिए पेश करते हैं. उनके मुताबिक ग्राफिक नॉवेल का असर साधारण रिपोर्टिंग से अधिक होता है क्योंकि चित्र घटनाओं को पाठकों के सामने जीवंत बना देते हैं.

चर्चा का केंद्र यह रहा कि पेंग्विन रैंडम हाउस कथित तौर पर किताब में कुछ बदलाव चाहता है, जबकि सैको उन्हें सेंसरशिप मानते हुए स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. मंजुल का कहना था कि यदि किसी व्यक्ति के बयान या किसी घटना के तथ्य दर्ज किए गए हैं, तो उन्हें हटाने की मांग पत्रकारिता की मूल भावना के खिलाफ है.

बातचीत के दौरान मंजुल ने दावा किया कि पिछले एक दशक में भारत में प्रत्यक्ष सेंसरशिप से ज्यादा सेल्फ-सेंसरशिप बढ़ी है. उनके अनुसार मीडिया संस्थान, प्रकाशक और अन्य संस्थाएं संभावित दबावों के डर से खुद ही सीमाएं तय करने लगी हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यधारा के मीडिया में सत्ता के शीर्ष नेताओं पर राजनीतिक कार्टून लगभग गायब हो चुके हैं, जो इस माहौल की ओर इशारा करता है.

मंजुल का मानना है कि किताबों, विचारों और आलोचनात्मक अभिव्यक्तियों को सीमित करने की कोशिशें नई नहीं हैं, लेकिन डिजिटल दौर में विचारों को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है. सोशल मीडिया, स्वतंत्र मीडिया और नए प्लेटफॉर्म सूचना को नए रास्तों से लोगों तक पहुंचा देते हैं.

चर्चा के अंत में उन्होंने कहा कि जो सैको की किताब का विवाद दरअसल एक बड़े सवाल को सामने लाता है. क्या भारत में लोकतंत्र के भीतर असहमति, व्यंग्य, आलोचना और वैकल्पिक विचारों के लिए पहले जैसी जगह बची हुई है. मंजुल के अनुसार विचारों को अस्थायी रूप से रोका जा सकता है, लेकिन उन्हें हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता. यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी परीक्षा भी है. पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

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