बंगाल चुनाव में आलू का भी दर्द; भाजपा को क्यों दिख रही है उम्मीद
पश्चिम बंगाल के हुगली और बर्धमान जिलों में, जो राज्य की आलू अर्थव्यवस्था का केंद्र हैं, किसानों के बीच गहरी हताशा और अनिश्चितता का माहौल है. जिस आलू ने कभी इन क्षेत्रों को समृद्धि दी थी, वही आज बंपर पैदावार के कारण किसानों के लिए 'श्राप' बन गया है.
कोलकाता से लगभग 130 किलोमीटर दूर, भतार विधानसभा सीट के छोर पर, आलू किसान एक चाय की दुकान पर बैठकर अपने अस्तित्व के संघर्ष पर चर्चा कर रहे थे. उन्हें उन एसयूवी की कोई परवाह नहीं थी जो हाईवे पर तेज़ी से गुज़र रही थीं—जिनमें से कुछ पर्यटकों को बीरभूम ले जा रही थीं और कुछ चुनाव आयोग के अधिकारियों को बंगाल में ड्यूटी पर.
सौर्ज्य भौमिक की रिपोर्ट के अनुसार, आलू किसानों की समस्याएँ अचानक बंगाल के विधानसभा चुनाव के सीज़न में केंद्र बिंदु बन गई हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने चुनावी भाषणों में बार-बार आलू उत्पादकों की दुर्दशा का ज़िक्र किया है, जिससे बंगाल की सबसे आम सब्जियों में से एक अब एक राजनीतिक हथियार बन गई है.
क्षेत्र के एक किसान जतिन माझी ने कहा, "आलू किसान रो रहे हैं. हमें ज़हर पीना पड़ेगा. लेकिन उन्हें हमारी कीमत पर कोलकाता का पेट भरने दें. हमसे तो उत्तर प्रदेश के किसान भी बेहतर स्थिति में हैं. आलू अभी भी खेतों में पड़े हुए हैं. न केवल बर्धमान में, बल्कि बीरभूम ज़िले में भी यही हाल है."
29 अप्रैल को, पूर्व बर्धमान और हुगली की कुल 38 विधानसभा सीटों पर बंगाल चुनाव के दूसरे चरण में मतदान होगा. ये दोनों ज़िले बंगाल की आलू अर्थव्यवस्था का गढ़ हैं. लगभग 15 लाख किसान आलू की खेती से जुड़े हुए हैं, जिनका सबसे भारी जमावड़ा हुगली और बर्धमान में है.
दामोदर नदी के किनारे, जिसकी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी खेती के लिए अनुकूल है, मेमारी, जमालपुर, बर्धमान उत्तर, बर्धमान दक्षिण और आरामबाग जैसे निर्वाचन क्षेत्र स्थित हैं. दशकों से ये क्षेत्र पूरे बंगाल और उसके बाहर भी आलू की आपूर्ति करते रहे हैं. लेकिन अब बंपर पैदावार ही इनके लिए श्राप बनती जा रही है.
पिछले साल बंगाल में लगभग 110 लाख टन आलू का उत्पादन हुआ था. इसके बावजूद, लाखों किसानों को घाटे में अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि कटाई शुरू होते ही कीमतें गिरकर करीब 3.50 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गईं. बंगाल सरकार ने पिछले साल 9 रुपये प्रति किलो का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित किया था, जबकि किसानों का कहना है कि उत्पादन लागत ही लगभग 8-9 रुपये प्रति किलो आती है.
पिछले वर्षों में भी जब भी उत्पादन 100 लाख टन के आंकड़े को पार कर गया, उत्पादकों ने कीमतों में गिरावट और कर्ज के बोझ की शिकायत की. इस साल, कई किसान ममता बनर्जी सरकार के अंतर्राज्यीय निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उनका तर्क है कि इस फैसले ने आपूर्ति को बंगाल के भीतर ही कैद कर दिया, जिससे कीमतें और अधिक गिर गईं.
बहरहाल, चुनावों को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक रैली में कहा, "इस क्रूर टीएमसी सरकार के धोखे ने आलू किसानों को बर्बाद कर दिया है.” उसी दिन, अमित शाह ने एक अन्य रैली में कहा कि अंतर्राज्यीय व्यापार पर प्रतिबंधों के कारण आलू किसानों को अपनी उपज सस्ते में बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है. भाजपा सरकार बंगाल में 'सिंडिकेट सिस्टम' को पूरी तरह से खत्म कर देगी.
दो दिन बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पलटवार करते हुए कहा, "वे दावा करते हैं कि बंगाल में आलू की खेती बर्बाद हो रही है. मैं पूछती हूँ, जब बाढ़ ज़मीन को तबाह कर देती है, तब आप कहाँ होते हैं? आप सोते हैं और खर्राटे लेते हैं."
कुल मिलाकर, किसान आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है. उसके लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या उच्च अर्थशास्त्र की बातें बेमानी हैं; उसकी मांग केवल इतनी है कि उसे उसकी मेहनत का वाजिब दाम मिले. 29 अप्रैल को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि 'आलू' का यह दर्द बंगाल की राजनीति में क्या बदलाव लाता है.

