शुभनीत कौशिक | फुटबॉल और हिन्दी-जगत

भारत में फुटबॉल की कहानी केवल एक खेल की कहानी नहीं है. यह उस सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलाव की भी कहानी है जिसने औपनिवेशिक भारत को गहराई से प्रभावित किया. शुभनीत कौशिक अपने लेख में दिखाते हैं कि किस तरह फुटबॉल जैसा विदेशी खेल धीरे-धीरे भारतीय समाज का हिस्सा बना और राष्ट्रवाद से लेकर हिंदी साहित्य तक अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराता गया.

उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान फुटबॉल, क्रिकेट और हॉकी जैसे खेल भारत आए. शुरुआत में इन्हें पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा माना गया, लेकिन समय के साथ भारतीयों ने इन्हें अपनाना शुरू कर दिया. स्कूलों, कॉलेजों और बोर्डिंग संस्थानों में इन खेलों को बढ़ावा मिलने से युवाओं के बीच इनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी. इतिहासकारों के अनुसार ब्रिटिश शासन खेलों को अनुशासन और साम्राज्यवादी मूल्यों के प्रसार का माध्यम मानता था, लेकिन भारतीय समाज ने इन्हें अपने अनुभवों और आकांक्षाओं के अनुरूप नया अर्थ दिया.

1911 में मोहन बागान की आईएफए शील्ड जीत इस परिवर्तन का सबसे चर्चित उदाहरण बनी. जहां अंग्रेज़ी प्रेस ने इसे औपनिवेशिक व्यवस्था की सफलता के रूप में देखा, वहीं भारतीय भाषाओं के अखबारों ने इसे राष्ट्रीय आत्मविश्वास और अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ प्रतीकात्मक विजय माना.

लेख में बताया गया है कि हिंदीभाषी क्षेत्र भी फुटबॉल के इस प्रभाव से अछूता नहीं रहा. बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में फुटबॉल पर हिंदी में पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं. 1908 में कालिदास माणिक की पुस्तक ‘फुटबॉल का खेल’ प्रकाशित हुई, जिसमें खेल के नियमों के साथ खिलाड़ियों के लिए अनुशासन और खेल भावना पर जोर दिया गया था. इसके बाद बम्बहादुर सिंह नेपाली ने ‘फुटबॉल की नियमावली’ जैसी पुस्तकें लिखीं और हिंदी में खेल साहित्य की कमी को दूर करने का प्रयास किया. उनका मानना था कि हिंदी में खेल संबंधी पुस्तकों के अभाव के कारण बड़ी संख्या में खिलाड़ी तकनीकी ज्ञान से वंचित रह जाते हैं.

फुटबॉल का प्रभाव हिंदी साहित्य में भी दिखाई देता है. प्रेमचंद के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग बताता है कि चुनार में एक फुटबॉल मैच के दौरान उन्होंने एक अंग्रेज़ सैनिक द्वारा भारतीय खिलाड़ी के अपमान का विरोध किया था. उनकी कहानियों में भी फुटबॉल का उल्लेख मिलता है. दूसरी ओर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ फुटबॉल के बड़े प्रेमी थे. वे मैच देखने भी जाते थे और स्वयं भी खेलते थे. एक बार खेलते समय उनके पैर में चोट लग गई थी, जिसका जिक्र उन्होंने अपने पत्रों में किया है.

लेख का निष्कर्ष यह है कि फुटबॉल भारत में केवल एक विदेशी खेल नहीं रहा. वह राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति, सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बना. हिंदी साहित्य और हिंदी समाज में उसकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि वे अपने समय के समाज, राजनीति और संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित करते हैं.

(यह शुभनीत कौशिक के लेख का संक्षिप्त रूपांतरण है.)

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