संतोष मेहरोत्रा | हम एक ऐसी पीढ़ी का सामना कर रहे हैं जिसकी आकांक्षाओं में क्रांति आ गई है

‘हरकारा डीप डाइव’ में निधीश त्यागी ने अर्थशास्त्री प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा के साथ जंतर-मंतर पर युवाओं के प्रदर्शन को शिक्षा, बेरोजगारी और भारत के जनसांख्यिकीय भविष्य के बड़े परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश की. प्रोफेसर मेहरोत्रा की किताब "इंडिया आउट ऑफ वर्क: रीथिंकिंग इंडियाज ग्रोथ स्टोरी" भारत में रोजगार और आर्थिक विकास के इसी संकट की पड़ताल करती है.

प्रोफेसर मेहरोत्रा ने कहा कि मौजूदा संकट की जड़ें भारत की शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में हैं. आजादी के बाद शुरुआती दशकों में स्कूली शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी और महिलाओं का बड़ा हिस्सा शिक्षा से वंचित रहा. बाद के दशकों में स्कूली और उच्च शिक्षा में नामांकन तेजी से बढ़ा, लेकिन उसी अनुपात में शिक्षा की गुणवत्ता और सरकारी निवेश नहीं बढ़ा. निजी कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों के विस्तार के साथ शिक्षा पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा परिवारों के कंधों पर आ गया.

निधीश त्यागी ने इसे एक दुचक्र के रूप में रखा. कमजोर शिक्षा के कारण ट्यूशन और कोचिंग की जरूरत बढ़ती है, रोजगार के सीमित अवसर प्रतियोगिता को और कठिन बनाते हैं और आखिर में परिवार उस व्यवस्था की आर्थिक कीमत चुकाता है, जिसे मजबूत करने की जिम्मेदारी सरकार की थी.

प्रोफेसर मेहरोत्रा के मुताबिक संकट केवल शिक्षा का नहीं, रोजगार का भी है. उन्होंने कहा कि 2000 से 2012 के बीच गैर-कृषि क्षेत्र में सालाना करीब 75 लाख रोजगार पैदा हो रहे थे, लेकिन बाद के वर्षों में रोजगार सृजन की रफ्तार कमजोर हुई. उन्होंने नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन और कोरोना महामारी के प्रबंधन को भी अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़े नकारात्मक असर से जोड़ा. नतीजा यह है कि पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या बढ़ी, लेकिन उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप रोजगार नहीं बढ़े.

चर्चा का अहम हिस्सा भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश पर रहा. प्रोफेसर मेहरोत्रा ने कहा कि महिलाओं की शिक्षा बढ़ने से परिवार छोटे हुए हैं, लेकिन अब पढ़ी-लिखी लड़कियां भी रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता चाहती हैं. उनके मुताबिक भारत के पास जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने के लिए सीमित समय बचा है. आने वाले वर्षों में बुजुर्ग आबादी की हिस्सेदारी बढ़ेगी. ऐसे में आज के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार नहीं मिला तो यह अवसर संकट में बदल सकता है.

समाधान के तौर पर उन्होंने उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण, तकनीकी शिक्षा को मजबूत करने और गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने की जरूरत बताई.

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