वीवीपी शर्मा | संस्थापक और उत्तराधिकारी: संकट क्यों बन जाता है राजनीतिक उत्तराधिकार

वरिष्ठ पत्रकार वीवीपी शर्मा ने राजनीति विज्ञान के एक बेहद जटिल और शाश्वत प्रश्न का विश्लेषण किया है: "संगठन अपने संस्थापकों के बाद कैसे जीवित रहते हैं?" उनका तर्क है कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा संकट चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अधिकार का हस्तांतरण होता है.

इस विषय को भारतीय राजनीति के ऐतिहासिक उदाहरणों और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के हालिया संकट के संदर्भ में समझा जा सकता है.

राजनीतिक सिद्धांतों के माध्यम से शर्मा स्पष्ट करते हैं कि करिश्माई नेतृत्व वाले दलों में संस्थागत ढांचा अक्सर कमजोर होता है. मसलन, मैक्स वेबर का सिद्धांत, जो कहता है कि ‘करिश्माई अधिकार’ किसी औपचारिक नियम या संस्था के बजाय नेता के व्यक्तिगत गुणों से पैदा होता है. यह समर्थकों को एकजुट करने में तो प्रभावी है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी 'उत्तराधिकार' के समय दिखती है. नेता को इस व्यक्तिगत प्रभाव को टिकाऊ व्यवस्था में बदलना होता है, जिसे वेबर ने "करिश्मे का रूढ़िवादीकरण" कहा है.

इसी तरह रॉबर्ट मिशेल्स ने अपनी पुस्तक ‘पॉलिटिकल पार्टीज़’ (1911) में बताया कि सफल दल सत्ता को एक छोटे समूह में केंद्रित कर लेते हैं, जिससे नेता और संगठन का अंतर मिट जाता है. नेता जितना अनिवार्य होता जाता है, उसके बिना पार्टी की कल्पना उतनी ही असंभव हो जाती है.

एंजेलो पनेबियांको और सैमुअल हंटिंगटन: पनेबियांको का मानना है कि पार्टियाँ तब स्थिर होती हैं जब अधिकार व्यक्ति के बजाय संगठन में निहित हो. वहीं हंटिंगटन ने ‘पॉलिटिकल ऑर्डर इन चेंजिंग सोसाइटीज’ में तर्क दिया कि मजबूत व्यवस्थाएं मजबूत नेताओं पर नहीं, बल्कि उन नियमों और आदतों पर निर्भर करती हैं जो नेतृत्व बदलने के बाद भी बची रहें.

पार्टियाँ तब कमजोर होती हैं जब उनके संस्थापक इस कठिन बातचीत और प्रक्रिया को तब तक टालते रहते हैं, जब तक कि उनका खुद का प्रभाव कम नहीं होने लगता.

शर्मा ने भारतीय राजनीति के विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि केवल पद सौंपने से 'राजनैतिक अधिकार' हस्तांतरित नहीं होता, उसे अर्जित करना पड़ता है:

कांग्रेस पार्टी: नेहरू से शास्त्री और इंदिरा गांधी तक का बदलाव एक स्थापित संगठनात्मक ढांचे के तहत हुआ. लेकिन बाद में सत्ता गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमट गई. राजीव और सोनिया गांधी ने विपरीत परिस्थितियों में कमान संभाली, लेकिन राहुल गांधी के मामले में यह साबित हुआ कि 'विरासत' और 'स्वीकार्यता' दो अलग बातें हैं. पद औपचारिक रूप से दिया जा सकता है, पर स्वीकार्यता कमानी पड़ती है.

शिवसेना बनाम द्रमुक (डीएमके): शिवसेना में बाल ठाकरे के जीते जी उत्तराधिकार का सवाल टाला गया, जिसका परिणाम उनकी मृत्यु के बाद पार्टी के ऐतिहासिक बिखराव के रूप में सामने आया. इसके विपरीत, द्रमुक में एम. करुणानिधि ने एम.के. स्टालिन को सीधे थोपा नहीं. स्टालिन ने दशकों तक संगठन में काम किया, चुनाव लड़े और अपनी जमीन बनाई. इसलिए जब औपचारिक बदलाव हुआ, तो पार्टी ने उन्हें सहजता से स्वीकार कर लिया.

समाजवादी पार्टी: मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव तक का सफर भले ही कड़वा और पारिवारिक विवाद से भरा रहा, लेकिन अखिलेश ने पार्टी के भीतर राजनैतिक मुकाबला जीतकर संगठन और विधायकों का वास्तविक समर्थन हासिल किया, न कि केवल घोषणा के दम पर.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का वर्तमान संकट

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान दुर्दशा का कारण केवल चुनाव हारना या भाजपा की रणनीति नहीं है. हार ने केवल उस आंतरिक असंतोष को सतह पर ला दिया जो वर्षों से दबा हुआ था.

अभिषेक बनर्जी बनाम पुरानी पीढ़ी: संकट के केंद्र में यह सवाल था कि ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द बनी पार्टी अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को कैसे स्वीकार करे? विद्रोह ममता के कद के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस 'सिकुड़ते दायरे' के खिलाफ है जिसके तहत बिना संगठनात्मक सहमति के अभिषेक को आगे बढ़ाया जा रहा था.

वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा: वरिष्ठ नेता सौगत रॉय के सार्वजनिक बयानों ने इसी दर्द को हवा दी. जब तक पार्टी चुनाव जीतती रही, स्थानीय नेताओं और प्रतिनिधियों ने इस बात को दबाए रखा कि पार्टी में प्रभाव काम के बजाय शीर्ष तक पहुंच से तय हो रहा है. लेकिन हारते ही यह फुसफुसाहट संगठनात्मक बगावत में बदल गई.

बाहरी गठबंधन बनाम आंतरिक समझ: ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से हालिया मुलाकातें यह दिखाती हैं कि वे संकट के समय बाहर रास्ते तलाश रही हैं, जबकि तृणमूल का असली संकट सहयोगियों की कमी नहीं, बल्कि आंतरिक अधिकार के प्रयोग और उसके हस्तांतरण के नियमों का अभाव है.

कुलमिलाकर, तृणमूल कांग्रेस के इस संकट से राजनीति जगत को एक सीधा और कड़ा सबक मिलता है. ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत—यानी व्यक्तिगत प्रभाव से पूरी पार्टी पर हावी रहने की क्षमता—ही अंततः उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई. उन्होंने अपने राजनैतिक विरोधियों का आकलन तो सही किया, लेकिन उत्तराधिकार के अनुचित तौर-तरीकों को लेकर अपनी ही पार्टी के भीतर पनप रहे गहरे असंतोष को कम आंक गईं.

कोई भी राजनैतिक उत्तराधिकारी केवल इसलिए सफल नहीं होता क्योंकि उसे 'चुन' लिया गया है; वह तब सफल होता है जब उसके चुने जाने से पहले ही संगठन का हर स्तर उसे अपना नेता स्वीकार कर चुका होता है. यदि यह आंतरिक स्वीकार्यता गायब हो, तो उत्तराधिकार कभी भी शांतिपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन नहीं बनता, बल्कि वह विनाशकारी नियंत्रण का संघर्ष बन जाता है.

(वीवीपी शर्मा के लेख का यह हिंदी में अनुदित सारांश है)


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