क्या खतरे में है भारत की चुनावी निष्पक्षता? 

‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद भारत की चुनावी प्रणाली पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. हारने वाले दलों ने मतदान के आंकड़ों और ईवीएम की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं. पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के नतीजों ने न केवल सत्ता के समीकरण बदले हैं, बल्कि चुनावी शुचिता को लेकर नई चिंताएं भी पैदा कर दी हैं. मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दे मतदाता सूची का पुनरीक्षण, आगामी परिसीमन और ईवीएम संदेह लोकतंत्र की साख को प्रभावित कर रहे हैं.

मतदाता सूची और एसआईआर का विवाद

चुनावों से पहले 'विशेष गहन पुनरीक्षण' के नाम पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए. चुनाव आयोग ने इसे फर्जी और मृत मतदाताओं को हटाने की एक आवश्यक सफाई प्रक्रिया बताया. अकेले पश्चिम बंगाल में लगभग 90 लाख नाम हटाए गए और पूरे देश में यह आंकड़ा करोड़ों में था.

विपक्ष और नागरिक समाज का आरोप है कि इस प्रक्रिया ने गरीब, प्रवासी और अल्पसंख्यक मतदाताओं को सबसे ज्यादा प्रभावित किया. पुरानी सूचियों और जटिल दस्तावेजों की मांग के कारण कई वास्तविक मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित रह गए. आलोचकों का मानना है कि यह एक "छिपी हुई नागरिकता जांच" थी जिसने मतदान से पहले ही चुनावी आधार को प्रभावित कर दिया. इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने जनता के बीच संदेह को और गहरा किया है.

परिसीमन का क्षेत्रीय संकट

2026 के बाद होने वाला परिसीमन भारत के संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती है. जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण दक्षिण भारतीय राज्यों तमिलनाडु और केरल के लिए चिंता का विषय है. इन राज्यों ने सफलतापूर्वक जनसंख्या नियंत्रण किया और आर्थिक प्रगति की, लेकिन अब उन्हें डर है कि इस सफलता के बदले उन्हें संसद में सीटें खोनी पड़ेंगी. इसके विपरीत, अधिक जनसंख्या वाले उत्तर भारतीय राज्यों की ताकत बढ़ेगी. यह क्षेत्रीय असंतुलन देश की एकता और संघीय समानता के लिए खतरा बन सकता है.

ईवीएम और भरोसे का सवाल

ईवीएम पर संदेह का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है. हालांकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार इन मशीनों को सुरक्षित बताया है, लेकिन विपक्षी दल अब भी पूर्ण वीवीपैट जांच की मांग कर रहे हैं. तकनीकी गड़बड़ियों की खबरें और मतदान के अंतिम आंकड़ों में विसंगतियां जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं. भले ही धोखाधड़ी का कोई बड़ा सबूत न मिला हो, लेकिन ऑडिट प्रक्रिया का सीमित होना इस मुद्दे को जीवित रखता है.

पारदर्शिता ही एकमात्र मार्ग

लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का नाम है. चुनाव आयोग को चाहिए कि वह मतदाता सूची से नाम हटाने के कारणों को सार्वजनिक करे और अपील की प्रक्रिया को सरल बनाए. साथ ही, ईवीएम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए स्वतंत्र तकनीकी जांच और व्यापक ऑडिट की अनुमति दी जानी चाहिए.

भारत का लोकतंत्र दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है, लेकिन इसकी मजबूती तभी बनी रहेगी जब चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष हो. हर नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि उसका वोट सुरक्षित है और उसकी सही गिनती हुई है. बिना इन बुनियादी सुधारों के, चुनावी नतीजे अपनी नैतिक चमक खो सकते हैं. समय आ गया है कि सुधारों के जरिए संदेह के बादलों को हटाया जाए ताकि गणतंत्र का आधार मजबूत बना रहे.

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