परिसीमन की राजनीति:उत्तर-दक्षिण असंतुलन और कंपनसेशन पॉलिटिक्स

हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में अर्थशास्त्री रथिन रॉय से परिसीमन, उत्तर बनाम दक्षिण का संतुलन, और बदलती राजनीति  पर गहन चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर भारत में “वन पर्सन, वन वोट” का सिद्धांत व्यवहार में क्यों लागू नहीं है.1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का जो फिक्सेशन हुआ, उसने आज एक ऐसी स्थिति बना दी है जहां जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच असंतुलन स्पष्ट दिखता है. 

डॉ. रॉय विस्तार से समझाते हैं कि अगर आज के जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर सीटों का पुनर्विभाजन किया जाए, तो उत्तर और पूर्वी भारत को भारी राजनीतिक बढ़त मिल सकती है. वहीं दक्षिण और पश्चिम भारत, जो आर्थिक रूप से ज़्यादा मज़बूत हैं और देश की आधुनिक अर्थव्यवस्था (आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज) का बड़ा हिस्सा संभालते हैं, उन्हें यह डर है कि उनकी निर्णय लेने की शक्ति कम हो जाएगी. इस पूरे विवाद में दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण से सही हैं यानी यह एक टकराव नहीं, बल्कि संतुलन का सवाल है. 

राजनीति के बदलते स्वरूप पर तीखी टिप्पणी सामने आती है. डॉ. रॉय ने "कंपनसेशन पॉलिटिक्स" का ज़िक्र किया, जहां सरकारें विकास के कठिन रास्ते पर चलने के बजाय मुफ्त योजनाओं, नकद हस्तांतरण और लाभार्थी राजनीति के ज़रिये वोट हासिल करने की कोशिश करती हैं. उनका तर्क है कि असली विकास वह है जिसमें लोगों को रोज़गार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर मिलें, न कि केवल असफलताओं की भरपाई के रूप में सहायता. 

उत्तर और दक्षिण के बीच आर्थिक असमानता पर भी गहराई से चर्चा की. जहां दक्षिण भारत में निवेश, उद्योग और आधुनिक अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है, वहीं उत्तर भारत के कई हिस्सों में औद्योगिकीकरण की गति धीमी रही है. इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है, सामाजिक एकीकरण की कमी. माइग्रेशन के बावजूद “रोटी-बेटी” का संबंध नहीं बन पा रहा, जिससे एक वास्तविक राष्ट्रीय एकता का निर्माण अधूरा रह जाता है. 


डॉ. रॉय यह भी बताते हैं कि भारत तेज़ी से “मिडिल इनकम ट्रैप” की ओर बढ़ रहा है, एक ऐसी स्थिति जहां आय तो बढ़ती है, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन गुणवत्ता में सुधार नहीं हो पाता. वे उदाहरण देते हैं कि कैसे समृद्धि का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो रहा, और बड़ी आबादी अब भी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रही है. 

भारत की राजनीति का “भविष्य” की बजाय “अतीत” में उलझ जाना, एक अहम वजह है. जाति, धर्म और पहचान की राजनीति के बीच विकास का एजेंडा पीछे छूटता जा रहा है. खासकर एक युवा देश होने के बावजूद, निर्णय लेने की शक्ति बुजुर्ग नेतृत्व के हाथों में केंद्रित है, जिससे नई सोच और ऊर्जा का सही उपयोग नहीं हो पा रहा. 

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