‘लाखों मतदाताओं का छूटना हमारे लोकतंत्र पर कलंक है’: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने चुनाव आयोग (ईसीआई) की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं. ‘द वायर’ के एमके वेणु को दिए इंटरव्यू में रावत ने कहा कि जिस बड़े पैमाने पर लाखों पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब पाए जा रहे हैं, वह "हमारे लोकतंत्र पर एक बड़ा कलंक" है. उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि हर पात्र नागरिक का नाम सूची में हो और वह वोट दे सके. यदि लाखों लोग मतदान के अधिकार से वंचित रह जाते हैं, तो यह चुनाव की शुचिता पर सवाल खड़ा करता है.
उन्होंने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग को टी.एन. शेषन के उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए था और विपक्षी नेताओं को भी दूरदर्शन पर उतना ही समय देना चाहिए था जितना 18 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया गया. उन्होंने इस बात को भी दोहराया कि चुनाव आयोग के लिए आधिकारिक तौर पर किसी एक अकेली पार्टी को 'क्या करें और क्या न करें' (डूज़ एण्ड डॉन्ट्स) जारी करना स्पष्ट रूप से अवैध है – यदि ऐसा किया जाता है, तो यह चुनाव लड़ रहे सभी दलों के लिए होना चाहिए. उनके अनुसार, एक "लेवल प्लेइंग फील्ड" (समान अवसर) सुनिश्चित करना आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है.
रावत ने इस बात की कड़ी आलोचना की कि चुनाव आयोग ने केवल एक विशेष दल (विपक्ष) को आधिकारिक तौर पर निर्देश जारी किए. उन्होंने इसे "स्पष्ट रूप से अवैध" बताया. उनका तर्क था कि यदि चुनाव आयोग कोई निर्देश या आचार संहिता से जुड़ी चेतावनी जारी करता है, तो वह चुनाव लड़ रहे सभी दलों के लिए समान रूप से होनी चाहिए, न कि किसी एक को निशाना बनाकर.
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने हालिया ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) की प्रक्रिया पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि पहले की प्रक्रियाएं सरल थीं, लेकिन ऐन चुनाव के पहले अब मतदाताओं पर खुद को साबित करने का बोझ डाल दिया गया है, जो कि गलत है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को 100 करोड़ मतदाताओं की नागरिकता की जांच करने का कोई जनादेश नहीं है; यह उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है.
उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि वर्तमान में चुनाव आयोग की छवि एक निष्पक्ष संस्था के रूप में धूमिल हो रही है. उन्होंने कहा कि जब आयोग सत्ता पक्ष के उल्लंघन पर आंखें मूंद लेता है और केवल विपक्ष पर सख्त होता है, तो जनता का भरोसा डगमगाने लगता है.
ओम प्रकाश रावत का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव आयोग का निडर और निष्पक्ष होना अनिवार्य है. उन्होंने अंत में चेतावनी दी कि यदि चुनाव आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया और मतदाताओं के विश्वास को बहाल नहीं किया, तो भविष्य के चुनावों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है.

