श्रवण गर्ग | मानसून सत्र सिर्फ कानून बनाने का सत्र नहीं, लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला सत्र भी हो सकता है.

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने संसद के मानसून सत्र, जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन, कॉकरोच जनता पार्टी की पहल, सोनम वांगचुक के समर्थन में उभरते जन प्रतिरोध और सरकार के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या यह मानसून सत्र केवल विधायी कामकाज का सत्र होगा या भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है.

चर्चा की शुरुआत जंतर-मंतर पर प्रस्तावित छात्र मार्च और उसके पहले पुलिस की कार्रवाई से होती है. श्रवण गर्ग का कहना है कि संसद शुरू होने से पहले जिस तरह आंदोलनों पर रोक, गिरफ्तारियों और प्रशासनिक सख्ती की खबरें सामने आई हैं, उससे टकराव का माहौल बनता दिखाई देता है. उनका मानना है कि यह स्थिति स्वतः भी पैदा हो सकती है और योजनाबद्ध भी हो सकती है. उन्होंने आशंका जताई कि यदि आंदोलन का नेतृत्व धीरे-धीरे राजनीतिक दलों और विभिन्न समूहों के हाथ में चला जाता है, तो इसकी दिशा और प्रभाव दोनों बदल सकते हैं.

बातचीत का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा संसद के मानसून सत्र को लेकर है. श्रवण गर्ग का तर्क है कि सरकार के सामने इस समय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर कई चुनौतियां एक साथ मौजूद हैं. उनके अनुसार विपक्ष भले संख्या के लिहाज से कमजोर दिखाई देता हो, लेकिन सरकार के खिलाफ मुद्दों की कमी नहीं है. उन्होंने छात्र आंदोलनों, परीक्षा विवाद, राम मंदिर से जुड़े आरोपों, केन-बेतवा परियोजना, विदेश नीति, बेरोजगारी और शहीदों के आंकड़ों पर उठे सवालों को ऐसे मुद्दों के रूप में गिनाया जिन्हें विपक्ष संसद में उठा सकता है.

चर्चा में परिसीमन और संभावित विधायी एजेंडे पर भी विस्तार से बात हुई. श्रवण गर्ग ने आशंका व्यक्त की कि यदि सरकार परिसीमन से जुड़ा कोई बड़ा कदम उठाती है तो उसका देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष को संसद के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर रणनीतिक तैयारी करनी होगी. हालांकि यह उनके राजनीतिक आकलन और आशंकाएं थीं, न कि स्थापित तथ्य.

इस बातचीत का एक बड़ा हिस्सा जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन और उसमें शामिल युवाओं पर केंद्रित रहा. श्रवण गर्ग का कहना था कि हाल के वर्षों में नागरिक आंदोलनों में युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है. उनके अनुसार परीक्षा व्यवस्था, रोजगार और भविष्य को लेकर असंतोष अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर भी दिखाई देने लगा है. उन्होंने कहा कि जब संस्थागत विपक्ष कमजोर होता है तो समाज के अलग-अलग वर्ग प्रतिरोध की भूमिका में सामने आने लगते हैं.

विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी चर्चा हुई. रूस से तेल खरीद, संभावित अमेरिकी टैरिफ, रुपये की स्थिति, चीन से बढ़ते आयात और युवाओं में बेरोजगारी जैसे मुद्दों को सरकार के लिए चुनौती बताया गया. श्रवण गर्ग का तर्क था कि इन सभी विषयों का असर संसद की बहसों में भी दिखाई दे सकता है.

बातचीत के अंत में दोनों वक्ताओं ने कहा कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर होने वाली बहसों के साथ-साथ संसद के बाहर नागरिक समाज और छात्रों की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी. उनके अनुसार यह सत्र केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि सरकार, विपक्ष और नागरिक समाज के बीच विश्वास, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद की भी परीक्षा होगा. आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि राजनीतिक मतभेद संवाद के जरिए सुलझते हैं या टकराव और गहरा होता है. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं. 

Previous
Previous

संसद की तरफ मार्च कर रहे सीजेपी प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई, वांगचुक का भूख हड़ताल जारी रखने का संकल्प, सरकार-सीजेपी के बीच बातचीत 

Next
Next

अपूर्वानंद | आंदोलन अब सोनम वांगचुक और सीजेपी से भी बड़ा हो चुका है