मनोज कुमार झा | दबी हुई आवाज़ें

‘द टेलीग्राफ’ में मनोज कुमार झा का यह लेख भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति और नागरिक 'आवाज़' के धीरे-धीरे कमज़ोर होने का एक गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन है. इसमें विभिन्न दार्शनिकों, अर्थशास्त्रियों और सामाजिक सिद्धांतकारों के विचारों के आलोक में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार भारतीय लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ—समाचार, सोशल मीडिया और कला/मनोरंजन—एक अभूतपूर्व दबाव का सामना कर रहे हैं.

अमेरिकी दार्शनिक अलेक्जेंडर मीकलजॉन के अनुसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह स्व-शासन के लिए अनिवार्य है. यदि नागरिकों को स्वयं पर शासन करना है, तो उन्हें सभी प्रासंगिक विचारों को सुनने का अधिकार होना चाहिए.

असंतोष का माध्यम: अर्थशास्त्री अल्बर्ट हिर्शमैन के ‘एग्जिट, वॉइस एण्ड लॉयल्टी’ (निकास, आवाज़ और वफ़ादारी) मॉडल का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि असंतुष्ट उपभोक्ता बाज़ार से बाहर निकल (एग्जिट) सकता है, लेकिन नागरिक के पास केवल 'आवाज़' उठाने का विकल्प होता है. यदि आवाज़ उठाना खतरनाक हो जाए, तो नागरिकता का दायरा क्षीण होने लगता है.

कमज़ोर वर्गों का सशक्तीकरण: बी.आर. आंबेडकर ने 'संवैधानिक नैतिकता' और असहमति की तय सीमाओं का समर्थन किया था. वहीं, अमर्त्य सेन के अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र प्रेस और विपक्षी राजनीति के कारण ही अकाल जैसी त्रासदियों को रोका जा सका है.  आवाज़ वंचितों और शोषितों की स्थितियों को राजनीतिक रूप से सामने लाने का मुख्य माध्यम है.

भारतीय संदर्भ में अभिव्यक्ति पर हमले के तीन आयाम

लेखक के अनुसार, यदि भारत में डराने-धमकाने, भीड़ की हिंसा (विजिलेंटे वायलेंस), और राज्य के संस्थानों के चुनिंदा इस्तेमाल के ज़रिए आवाज़ को कमज़ोर किया जा रहा है, तो उन तीन आयामों को अलग करके समझना मददगार हो सकता है जिनमें ऐसा हो रहा है, क्योंकि प्रत्येक को कुछ भिन्न साधनों द्वारा कमज़ोर किया जा रहा है.

समाचार (न्यूज़): प्रेस स्व-शासन का ज्ञान संबंधी आधार (एपिस्टेमिक इंफ्रास्ट्रक्चर) है. औपचारिक सेंसरशिप के बिना भी छापों, देशद्रोह, और आपराधिक मानहानि के जरिए पत्रकारों पर दबाव बनाया जाता है.  फ्रेडरिक शॉवर के 'चिलिंग इफ़ेक्ट' के अनुसार, सज़ा के डर से लोग स्वयं चुप हो जाते हैं. स्टीवन लेवित्स्की और डैनियल ज़िब्लैट के अनुसार, आधुनिक अधिनायकवाद चुनावों को रोके बिना 'रेफरी संस्थाओं' का राजनीतिक इस्तेमाल कर पनपता है.

सोशल मीडिया: यह सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक स्फेयर) सूचना को परखने का काम करता है. जहाँ हैबरमास और नैन्सी फ्रेजर के विचारों के अनुरूप यह हाशियों के समूहों (काउंटरपब्लिक) की आवाज़ बना था, वहीं अब यह संगठित उत्पीड़न, डॉक्सिंग, और हेट स्पिन का शिकार है. राज्य मध्यवर्ती नियमों और टेकडाउन आदेशों के माध्यम से इसे नियंत्रित करता है, जिससे महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए भागीदारी कठिन हो जाती है.

सिनेमा और मनोरंजन: रेमंड विलियम्स की 'संरचनात्मक भावना' (स्ट्रक्चर ऑफ फीलिंग) के अनुसार, कला समाज की उभरती संवेदनाओं को आकार देती है. हन्ना एरांट के विचारों के आलोक में, यह दूसरों के दृष्टिकोण को समझने में मदद करती है. लेकिन पटकथाओं की जाँच और कलाकारों से माफ़ी मंगवाने से समाज की वैचारिक सोच ही कुंद हो जाती है.

सूचना निर्णय का आधार देती है, सार्वजनिक क्षेत्र इसे राय में बदलता है, और कला संवेदनशीलता तय करती है. यदि ये तीनों आयाम कमज़ोर पड़ते हैं, तो नियमित चुनाव होने के बावजूद जनता अपनी वास्तविक लोकतांत्रिक क्षमताएँ खो देती है.

झा ने लेवित्स्की और ज़िब्लैट की प्रसिद्ध पुस्तक ‘हाऊ डेमोक्रेसीज़ डाई’  (लोकतंत्र कैसे मरते हैं) का उल्लेख करते हुए लिखा है कि आधुनिक अधिनायकवाद चुनावों को रोके बिना 'रेफरी संस्थाओं' (न्यायालय, चुनाव आयोग आदि) को अपने अधीन करके पनपता है. यदि तीनों क्षेत्र (न्यूज़, सोशल मीडिया, कला) एक साथ बाधित होते हैं, तो चुनाव तो होंगे, लेकिन नागरिक अपनी लोकतांत्रिक निर्णय-क्षमता खो देंगे.

उनके अनुसार, भय का प्रभाव केवल राज्य द्वारा नहीं थोपा जाता; इसमें समाज की भागीदारी भी होती है. भीड़ में आम नागरिक शामिल हैं और एल्गोरिदम पर आधारित आक्रोश को लोगों का ध्यान स्वतः प्राप्त हो रहा है.राज्य कानून का मनमाना उपयोग सीख रहा है और समाज को इससे कोई आपत्ति नहीं दिख रही है.

लेकिन, तमाम दबावों, तंत्र की सख्ती और सामाजिक उदासीनता के बावजूद, भारत में नागरिकों की 'आवाज़' पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है: जोखिम उठाकर भी सच लिखने वाले पत्रकार मौजूद हैं. दबाए जाने वाले डिजिटल मंचों के कोनों में छोटे समूह अब भी बहस में लगे हैं. लेखक और फ़िल्म निर्माता किसी भावना को नाम मिलने से पहले उसे पर्दे पर उतारने का साहस दिखा रहे हैं.

लेख का सार कहता है कि आवाज़ एक ऐसा संसाधन है जो केवल प्रयोग से जीवित रहता है और प्रयोग न करने पर घट जाता है. इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जो लोग बोल रहे हैं, वे न केवल अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए उस क्षमता को जीवित रख रहे हैं जिसे हम अन्यथा खो बैठते.

(लेखक मनोज कुमार झा राष्ट्रीय जनता दल से राज्य सभा सदस्य हैं. अंग्रेजी में उनके मूल लेख का यह हिंदी में अनुदित सारांश है)

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