ईरान में अमेरिका की 'शह और मात'?
रॉबर्ट केगन का “द एटलांटिक” में 10 मई 2026 का लेख “चेक मेट इन ईरान” (ईरान में शह-मात) अमेरिका-इजराइल के ईरान अभियान को अमेरिका की बड़ी रणनीतिक हार बताता है. केगन, एक प्रमुख नव-संरक्षणवादी विचारक, लिखते हैं कि 37 दिनों की हमलों के बावजूद ईरानी शासन नहीं गिरा. ईरान अब हार्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखता है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर उसकी ताकत बढ़ाता है. इससे चीन-रूस मजबूत हुए हैं, अमेरिका की विश्वसनीयता घटी है और विश्व व्यवस्था में अमेरिका का वर्चस्व कम हो रहा है. विशेषज्ञ इस लेख को काफी गंभीरता से ले रहे हैं क्योंकि केगन खुद हस्तक्षेपवादी नीतियों के समर्थक रहे हैं. सोशल मीडिया पर यह तेजी से वायरल हुआ है. ईरानी मीडिया इसे अपनी जीत का प्रमाण मान रहा है. वाली नासर जैसे विशेषज्ञ इसे “सुलगता आकलन” बता चुके हैं. पॉडकास्ट, समाचार चैनल और थिंक-टैंक में इसकी चर्चा हो रही है. कुछ इसे अतिरंजित मानते हैं, पर लेखक की प्रतिष्ठा के कारण इसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता.
इतिहास में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जब कोई महाशक्ति एक ऐसी हार झेलती है जिसे न पलटा जा सके, न भुलाया जा सके. द अटलांटिक में प्रकाशित लेख में अमेरिकी विश्लेषक रॉबर्ट केगन का मानना है कि ईरान के साथ मौजूदा टकराव में अमेरिका ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ा है.
पर्ल हार्बर की तबाही के बाद अमेरिका ने वापसी की. वियतनाम और अफ़गानिस्तान की हार कड़वी थी, लेकिन वे मुख्य भू-रणनीतिक क्षेत्रों से दूर थे, इसलिए अमेरिका की समग्र वैश्विक स्थिति पर कोई स्थायी दाग़ नहीं लगा. इराक़ में शुरुआती असफलता को रणनीति बदलकर काफ़ी हद तक सँभाल लिया गया. लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण एक बिल्कुल अलग किस्म की हार है — ऐसी हार जिसका कोई इलाज नहीं है.
37 दिन की बमबारी, फिर भी ईरान झुका नहीं
अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर 37 दिनों तक ईरान पर भीषण हमले किए. ईरानी नेतृत्व का बड़ा हिस्सा मारा गया और उसकी अधिकांश सैन्य क्षमता तबाह कर दी गई. फिर भी ईरान की सरकार टस से मस नहीं हुई — एक भी रियायत नहीं, एक भी समझौता नहीं.
असली मोड़ 18 मार्च को आया, जब इज़रायल ने ईरान के दक्षिण पार्स गैस क्षेत्र पर हमला किया. ईरान ने जवाब में क़तर के रास लफन औद्योगिक शहर — दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस निर्यात संयंत्र — पर हमला कर दिया. इस हमले से हुआ नुक़सान इतना गहरा था कि उसकी भरपाई में कई साल लग जाएँगे. इसके बाद ट्रम्प ने ईरान की ऊर्जा सुविधाओं पर हमलों को रोकने की घोषणा की और फिर युद्धविराम का ऐलान कर दिया — बिना ईरान से एक भी शर्त मनवाए.
आगे के रास्ते बंद क्यों हैं?
ट्रम्प प्रशासन अब ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी पर दाँव लगा रहा है. लेकिन सवाल यह है कि जो सरकार पाँच हफ़्ते की लगातार बमबारी से नहीं झुकी, वह आर्थिक दबाव से कैसे झुकेगी? ईरान की विद्वान सुज़ेन मेलोनी ने सटीक टिप्पणी की है कि जिस सरकार ने जनवरी में अपने ही नागरिकों के विरोध-प्रदर्शन को कुचलने के लिए उनकी जान ली, वह अब आर्थिक तकलीफ़ से डरने वाली नहीं है.
दोबारा सैन्य हमले की माँग करने वाले भी यह नहीं बता पाते कि एक और दौर की बमबारी वह काम कैसे करेगी जो 37 दिनों में नहीं हो सका. और अगर हमले फिर शुरू हुए, तो ईरान के पास अभी भी पर्याप्त मिसाइलें और ड्रोन हैं जो खाड़ी देशों के तेल और गैस के ढाँचे को तबाह कर सकते हैं — जिससे दुनिया एक लंबे आर्थिक संकट में धँस जाएगी. यही जोखिम ट्रम्प को पहले भी रोकता रहा है और आगे भी रोकेगा.
ऐसे में ट्रम्प के पास फिलहाल एकमात्र विकल्प बचा है — "जीत की घोषणा करके चले जाना." ख़बरें हैं कि उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से यह आकलन करने को कहा है कि बस विजय का दावा ठोककर पीछे हट जाने के क्या परिणाम होंगे.
होर्मुज़ — एक नया हथियार
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के तेल और गैस व्यापार की जीवनरेखा है. ईरान अब इसे पहले जैसा खुला नहीं छोड़ेगा. यह जलमार्ग अब उसके हाथ में एक ऐसा हथियार बन गया है जिसकी धार किसी परमाणु बम से कम नहीं — बल्कि ज़्यादा तात्कालिक और असरदार है.
ईरान जिन देशों से अच्छे संबंध रखेगा, उनके जहाज़ गुज़रेंगे. जो उसकी नाराज़गी मोल लेंगे, उन्हें रोका जाएगा या धीमा किया जाएगा. इस नए समीकरण में ईरान के पास यह ताक़त होगी कि वह दुनिया के किसी भी देश पर — यहाँ तक कि बड़ी ताक़तों पर भी — ऊर्जा आपूर्ति का दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवा सके. इसके साथ-साथ ईरान ने अपनी संभावित परमाणु क्षमता भी बरकरार रखी है.
क्षेत्रीय और वैश्विक उथल-पुथल
खाड़ी के अरब देश — जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ दशकों से अमेरिकी सैन्य छत्रछाया में फली-फूली हैं — अब ईरान की ओर देखने पर मजबूर होंगे. विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी वर्चस्व और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता खत्म होते ही, खाड़ी के देश अनिवार्य रूप से तेहरान के दरवाज़े खटखटाएँगे.
इज़रायल भी पहले से कहीं ज़्यादा अकेला पड़ जाएगा. जब ईरान के हाथ में इतने देशों की ऊर्जा आपूर्ति की चाबी हो, तो कोई भी देश ईरान को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा — और इज़रायल पर लेबनान, गाज़ा या कहीं और ईरानी प्रॉक्सी के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करने का भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा.
वैश्विक स्तर पर, पूरी दुनिया ने देखा है कि एक 'दूसरी श्रेणी की ताक़त' के साथ कुछ हफ़्तों के युद्ध में ही अमेरिका के हथियार भंडार ख़तरनाक हद तक कम हो गए. यह देखकर यूरोप और पूर्वी एशिया के सहयोगी सोचने पर मजबूर हैं — अगर भविष्य में चीन ताइवान पर हमला करे या रूस यूरोप में आक्रामकता बढ़ाए, तो क्या अमेरिका टिका रह सकेगा? इस संदेह का सीधा फ़ायदा बीजिंग और मॉस्को को मिलेगा.
यह सब भारत के लिए क्यों मायने रखता है?
भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है. होर्मुज़ पर ईरानी नियंत्रण का मतलब है तेल की कीमतों में भारी उछाल — $150 से $200 प्रति बैरल तक — जिसका असर महँगाई, परिवहन, खेती और आम जनजीवन पर सीधे पड़ेगा. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करने वाला भारतीय प्रवासी समुदाय भी इस अस्थिरता से प्रभावित होगा. और एक बड़े स्तर पर, इस पूरे घटनाक्रम से एक नई बहुध्रुवीय दुनिया आकार ले रही है जिसमें भारत को अपनी विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा करनी होगी.
केगन का यह लेख एक कड़वी सच्चाई सामने रखता है — कि ताक़त और रणनीति दो अलग चीज़ें हैं, और बिना सुविचारित रणनीति के ताक़त का इस्तेमाल भी हार का रास्ता बन सकता है. अमेरिका ने ईरान पर भारी सैन्य बल झोंका, लेकिन जब होर्मुज़ की असली क़ीमत सामने आई — यानी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का जोखिम — तब वह पीछे हटने पर मजबूर हो गया. और यही पीछे हटना उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी साबित हो रही है.
दुनिया के देश इस बदलाव को देख रहे हैं और अपने हिसाब से क़दम उठा रहे हैं. जो दुनिया अमेरिकी नेतृत्व में चलती थी, वह धीरे-धीरे अतीत बनती जा रही है.

