चौराहे पर इंडिया गठबंधन: क्या जनता पार्टी जैसा प्रयोग संभव है?

 ‘साउथ फर्स्ट’ केलिए पत्रकार पीवी कोंडल राव की रिपोर्ट

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक यक्ष प्रश्न लगातार गूँज रहा है: आखिर इंडिया गठबंधन, भाजपा और एनडीए  के अभेद्य चुनावी रथ को रोकने के लिए 1977 की जनता पार्टी की तर्ज पर एक ठोस और एकीकृत इकाई क्यों नहीं बन पाया? हालांकि विपक्षी एकता की कोशिशें जारी हैं, लेकिन एक पूर्ण 'विलय' या जनता पार्टी जैसा ऐतिहासिक प्रयोग अब भी एक दूर का सपना नजर आता है. इसके पीछे वैचारिक मतभेद, नेतृत्व का संकट और क्षेत्रीय राजनीति की विवशताएं प्रमुख कारण हैं.

1977 का जनता पार्टी प्रयोग किसी सामान्य गठबंधन का परिणाम नहीं था. वह आपातकाल के विरुद्ध उपजा एक नैतिक और राजनीतिक विद्रोह था. इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल ने अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को अपनी व्यक्तिगत पहचान मिटाकर एक होने पर मजबूर कर दिया था. उस समय जयप्रकाश नारायण जैसे कद के नेता थे, जिनका सम्मान सभी गुटों में था. लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली के लिए वैचारिक और व्यक्तिगत मतभेदों को हाशिए पर धकेल दिया गया था.

आज के इंडिया  गठबंधन के सामने सबसे बड़ी बाधा एक सर्वमान्य नेतृत्व की कमी है. जनता पार्टी के पास 'मोरारजी देसाई' या 'जगजीवन राम' जैसे दिग्गज थे, लेकिन आज कांग्रेस का वह वर्चस्व नहीं रहा कि वह अकेले पूरे गठबंधन की धुरी बन सके. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन और दिल्ली-पंजाब में अरविंद केजरीवाल जैसे नेता अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन रखते हैं. इन नेताओं के लिए अपने क्षेत्रीय अस्तित्व को किसी केंद्रीय नेतृत्व के अधीन करना चुनावी रूप से घाटे का सौदा लगता है. यह गठबंधन एक एकीकृत शक्ति बनने के बजाय 'महत्वाकांक्षाओं का समूह' बनकर रह गया है.

जनता पार्टी का मूल आधार 'कांग्रेस विरोध' था, जिसने दक्षिणपंथ और वामपंथ को एक मंच पर ला दिया था. इसके विपरीत, इंडिया गठबंधन के भीतर वैचारिक विरोधाभास गहरे हैं. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गठबंधन के साथी ही एक-दूसरे के मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी हैं. भाजपा के 'मजबूत राष्ट्रवाद' और 'विकास' के नैरेटिव के सामने विपक्षी गठबंधन अब तक कोई ऐसा साझा एजेंडा पेश नहीं कर पाया है जो मतदाताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ सके. केवल 'भाजपा विरोध' मतदाताओं को एकजुट करने के लिए पर्याप्त नहीं दिख रहा है.

भाजपा के पास आरएसएस जैसा एक अनुशासित कैडर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा एक शक्तिशाली चेहरा है, जो चुनाव को 'प्रेसिडेंशियल' (राष्ट्रपति शैली) बना देता है. इसके मुकाबले, इंडिया गठबंधन का ढांचा बिखरा हुआ है. सीट-बंटवारे की जटिलताएं और संगठनात्मक तालमेल की कमी इसे एक 'प्रतिक्रियावादी' समूह तक सीमित कर देती है.

जनता पार्टी का प्रयोग अंततः अंतर्कलह के कारण विफल रहा था, लेकिन उसने यह सिद्ध किया था कि बड़े लक्ष्यों के लिए छोटे हितों का त्याग जरूरी है. इंडिया गठबंधन आज उसी चौराहे पर खड़ा है. यदि यह केवल एक 'लेन-देन' वाला गठबंधन बना रहता है, तो यह एनडीए के वर्चस्व को चुनौती देने में विफल हो सकता है.

राजनीति में अवसर बार-बार दस्तक नहीं देते. जनता पार्टी जैसा एकीकरण जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल में अनिर्णय उससे भी बड़ा जोखिम है.गठबंधन को सीटों के गणित से ऊपर उठकर एक साझा 'राजनीतिक कल्पना' और 'साझा संगठन' की दिशा में बढ़ने की सख्त जरूरत है.

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