मणिपुर हिंसा: तीन साल बाद, न्याय और शांति सिर्फ ‘शब्द’
मणिपुर हिंसा को अब तीन साल होने को आए हैं, लेकिन इस सीमावर्ती राज्य में शांति और सामान्य स्थिति आज भी एक कोरी कल्पना बनी हुई है. 'शिलॉन्ग टाइम्स' की संपादक पेट्रीसिया मुखिम ‘द वायर’ में प्रकाशित अपने लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, भाजपा की राजनीति और मणिपुर के जटिल जनजातीय संघर्षों पर तीखा प्रहार करती हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी भी ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने नहीं आए हैं जो देश के हर हिस्से को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर चुपचाप चिंतन कर सकें. विभिन्न राज्यों के उनके दौरे सावधानीपूर्वक तैयार (कोरियोग्राफ) किए गए कार्यक्रम होते हैं और आमतौर पर परियोजनाओं का उद्घाटन करने या चुनाव अभियानों के लिए होते हैं. उन्होंने इस साल 9 अप्रैल को हुए राज्य विधानसभा चुनाव से पहले कई मौकों पर असम की यात्रा की. उन्होंने पश्चिम बंगाल की भी व्यापक यात्रा की है, जहाँ 23 अप्रैल को पहले चरण के चुनाव हुए और 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण के.
मोदी की नेतृत्व शैली 'प्रदर्शनकारी' है. उनके भाषण बयानबाजी से भरे और विभाजनकारी होते हैं; वह राज्य को एकजुट करने के बजाय विभाजित करने के लिए राजनीतिक संदेशों का उपयोग करते हैं. इसलिए, कोई मोदी से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि उनके पास युद्धरत पक्षों को आमंत्रित करने और संघर्ष समाधान की रणनीतियों पर शांति से काम करने के लिए उनके साथ बैठने का समय या झुकाव होगा. मोदी के लिए संघर्ष प्रबंधन से ज्यादा राजनीतिक संदेश देना महत्वपूर्ण है.
मणिपुर के लोग 3 मई, 2023 से इस तूफान के केंद्र में हैं. संघर्ष की तीसरी वर्षगांठ आ चुकी है, लेकिन इंफाल घाटी और कुकी-ज़ो बहुल पहाड़ी जिलों चूड़ाचाँदपुर और कांगपोकपी के राहत शिविरों में अभी भी रह रहे 65,000 से अधिक लोगों का मानसिक आघात समाप्त नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री संघर्ष प्रबंधन की बारीकियों को अपने डिप्टी अमित शाह—केंद्रीय गृह मंत्री—पर छोड़ना पसंद करते हैं, जो एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनका ट्रैक रिकॉर्ड आम सहमति बनाने वाले रणनीतिकार का नहीं रहा है. क्या हमें 2002 के गुजरात दंगों और वहां उनकी भूमिका याद है?
भाजपा एक ऐसी पार्टी के रूप में नजर आती है जो धौंस जमाती है, और धौंस जमाने वालों से बातचीत की भाषा समझने की उम्मीद नहीं की जा सकती.
मणिपुर का त्रिकोणीय संघर्ष और ऐतिहासिक घाव
मणिपुर में संघर्ष मुख्य रूप से तीन समुदायों—मैतेई, नागा और कुकी-ज़ो—के बीच है. वर्तमान में नागा समुदाय कुकी-ज़ो पर जमीन अतिक्रमण का आरोप लगा रहा है. लेख याद दिलाता है कि 1992-97 के दौरान भी इन दोनों समुदायों के बीच भीषण रक्तपात हुआ था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे. वह संघर्ष सुलझा नहीं था, बल्कि केवल 'युद्ध की थकान' के कारण थम गया था. मणिपुर में हिंसा की जड़ें हमेशा जमीन और सीमाओं के दावों में रही हैं. मुखिम पुरानी कांग्रेस सरकारों को भी दोषमुक्त नहीं करतीं, जिनकी नीति 'रुको और देखो' की रही है.
राष्ट्रपति शासन और प्रशासनिक विफलता
मई 2023 में हिंसा भड़कने के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाने में लगभग दो साल की देरी की (फरवरी 2025). लेख के अनुसार, यह देरी दर्शाती है कि भाजपा के लिए पूर्वोत्तर के इस दूरस्थ राज्य की कोई खास अहमियत नहीं है. एन. बीरेन सिंह की सरकार को लंबे समय तक काम करने दिया गया, जबकि उन पर आरोप थे कि वे पक्षपाती हैं और एक विशेष घाटी-आधारित उग्रवादी गुट का समर्थन कर रहे हैं.
हिंसा का तात्कालिक कारण मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने का उच्च न्यायालय का विवादास्पद आदेश था. हालांकि बाद में अदालत ने अपनी गलती मानी, लेकिन तब तक राज्य में जातीय विभाजन की ऐसी लकीर खिंच चुकी थी जिसे मिटाना असंभव हो गया.
राहत शिविरों की भयावह वास्तविकता
दिसंबर 2023 में राहत शिविरों में पैदा हुए बच्चे अब दो साल के हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने अपने घर की दहलीज तक नहीं देखी है. युवाओं और बच्चों के जीवन के तीन कीमती साल बर्बाद हो चुके हैं. राज्य में ऐसी भौगोलिक सीमाएं खिंच गई हैं कि मैतेई केवल घाटी में और कुकी-ज़ो केवल पहाड़ियों में सिमट कर रह गए हैं. गांवों की रक्षा के लिए युवा वर्दी पहनकर चौबीसों घंटे बंकरों में पहरा दे रहे हैं.
भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताएं
केंद्र सरकार ने हाल ही में राहत के लिए 947 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, लेकिन मुखिम इसे लेकर आशंकित हैं. वे कहती हैं कि पूर्वोत्तर विकास कोष का कोई पारदर्शी हिसाब नहीं रखा जाता और यह पैसा अक्सर मंत्रियों, नौकरशाहों और उग्रवादी गुटों की जेबों में चला जाता है. आरटीआई के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 58,881 लोग विस्थापित हैं, जो सरकार की घोर अक्षमता का प्रमाण है.
निष्कर्ष यह है कि मणिपुर में मानवाधिकारों का उल्लंघन कल्पना से परे है. हजारों घर जला दिए गए हैं, महिलाओं के साथ वीभत्स अत्याचार हुए हैं और सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका है. मुखिम कहती हैं कि भले ही कल को स्थिति 'सामान्य' दिखने लगे, लेकिन जो घाव और अविश्वास पैदा हो गया है, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती. अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति सहानुभूति का अभाव और बहुसंख्यकवाद की राजनीति ने मणिपुर को एक ऐसी 'कड़वी वास्तविकता' में बदल दिया है, जहाँ न्याय और शांति केवल शब्दों तक सीमित रह गए हैं.

