असम सीएम की पत्नी पर टिप्पणी मामला: पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की उस याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने असम पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के संबंध में अग्रिम जमानत की मांग की है.यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से जुड़ा है.
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल चांदुरकर की पीठ ने पवन खेड़ा की उस याचिका पर सुनवाई की, जो गौहाटी उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद दायर की गई थी.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई देशों के पासपोर्ट हैं और उनके विदेशी वित्तीय हित हैं. इसके बाद गुवाहाटी क्राइम ब्रांच में रिनिकी भुइयां सरमा ने एफआईआर दर्ज कराई. इसएफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराएं लगाई गई हैं, जिनमें धारा 175 चुनाव के संबंध में झूठा बयान देने, धारा 318 धोखाधड़ी, धारा 338 व 337 महत्वपूर्ण सुरक्षा या सार्वजनिक रिकॉर्ड का जालसाजी, धारा 340 जाली दस्तावेजों को असली के रूप में उपयोग करना एवं धारा 352 व 356 शांति भंग करने के लिए अपमान और मानहानि शामिल है.
पवन खेड़ा की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे एक अभूतपूर्व मामला करार दिया. उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है. सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने खेड़ा को असम की जेल में जीवन बिताने की धमकी दी है. उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “डॉ. अंबेडकर अपनी कब्र में करवटें बदल रहे होंगे, यदि उन्होंने कल्पना की होती कि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ‘संवैधानिक काउबॉय’ या ‘संवैधानिक रैम्बो’ की तरह बात करेगा.”
सिंघवी ने तर्क दिया कि मुख्य मामला मानहानि और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का है, जिसके लिए कस्टोडियल पूछताछ (हिरासत में पूछताछ) की कोई आवश्यकता नहीं है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब खेड़ा जांच में सहयोग करने और देश न छोड़ने का आश्वासन दे रहे हैं, तो उन्हें अपमानित करने के लिए गिरफ्तार करना क्यों जरूरी है? उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली के निजामुद्दीन में 50-60 पुलिसकर्मियों का पहुंचना ऐसा था जैसे वे किसी आतंकवादी को पकड़ने आए हों.
राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध किया. उन्होंने पीठ को बताया कि यह केवल मानहानि का मामला नहीं है, बल्कि दस्तावेजों की जालसाजी का गंभीर मामला है. सॉलिसिटर जनरल ने आरोप लगाया कि खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो पासपोर्ट की तस्वीरें दिखाई थीं, वे जांच में फर्जी पाई गई हैं.
सॉलिसिटर जनरल ने कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि पुलिस को यह पता लगाना है कि ये फर्जी दस्तावेज किसने बनाए. क्या इसमें कोई विदेशी ताकतों का हाथ है जो भारतीय चुनावों में हस्तक्षेप करना चाहते हैं? दस्तावेजों का स्रोत क्या है और इनके पीछे का वास्तविक इरादा क्या था?
उन्होंने यह भी दावा किया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद से पवन खेड़ा ‘फरार’ रहे हैं और जांच के लिए हिरासत में पूछताछ अनिवार्य है क्योंकि यह सामान्य पूछताछ से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है.
अदालती कार्यवाही और उच्च न्यायालय का रुख
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने बीएनएस की धारा 339 (जाली दस्तावेजों का कब्जा) का उल्लेख किया, जो कुछ मामलों में आजीवन कारावास या 7 साल तक की सजा का प्रावधान करती है. इससे पहले, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि खेड़ा अपने आरोपों को साबित करने में विफल रहे और उन्होंने एक निजी व्यक्ति को राजनीतिक विवाद में घसीटा है.
सिंघवी ने उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई जिसमें शिकायतकर्ता को निर्दोष महिला कहा गया था. उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला ट्रायल के दौरान तय होना चाहिए, अदालत को पहले से ही इस पर कोई राय नहीं बनानी चाहिए.
पवन खेड़ा ने अनुच्छेद 21 के तहत अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गुहार लगाई है, जबकि असम सरकार इसे एक गहरी साजिश और जालसाजी का मामला बता रही है. दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या देश की शीर्ष अदालत कांग्रेस नेता को राहत देती है या उन्हें असम पुलिस की जांच का सामना करने के लिए हिरासत में जाना पड़ेगा.

