छत्तीसगढ़ में पेसा कानून का ग़लत इस्तेमाल: आदिवासियों को सशक्त करने वाला कानून बना ईसाइयों के ख़िलाफ़ हथियार

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में आदिवासियों के अधिकारों के लिए बनाया गया कानून पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम,1996 (पेसा) अब ईसाई समुदाय को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है. यह बात स्क्रॉल की एक रिपोर्ट में सामने आई है

रिपोर्ट के अनुसार, इस कानून का इस्तेमाल कई गांवों में ईसाई समुदाय को निशाना बनाने और उनके सामाजिक बहिष्कार के लिए किया जा रहा है, जबकि इसके मूल उद्देश्य, ज़मीन और संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकार, अक्सर नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं. 

बस्तर के कांकेर जिले के डोमपदर गांव के सरपंच देवलाल वट्टी का मामला इस बढ़ते तनाव को दिखाता है. वट्टी ने एक बार अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए धर्म की स्वतंत्रता की बात लिखी थी.  इसके कुछ ही समय बाद उन्हें गांव की बैठक में बुलाकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया. वट्टी, जो खुद आदिवासी पारंपरिक धर्म कोया पुनेम के अनुयायी हैं, का कहना है कि बस्तर में कई धर्म आए हैं और सभी ने स्थानीय संस्कृति को प्रभावित किया है, लेकिन निशाना केवल ईसाइयों को बनाया जा रहा है. 

बस्तर क्षेत्र लंबे समय से आदिवासी समुदायों का पारंपरिक इलाका रहा है, जहां वे अपने स्थानीय धर्मों का पालन करते रहे हैं.  हालांकि समय के साथ यहां हिंदू और ईसाई धर्म का प्रभाव भी बढ़ा है. 1952 में संघ परिवार ने जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की थी, जबकि 1990 के दशक में भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव ने “घर वापसी” अभियान शुरू किया.  पिछले कुछ वर्षों में बस्तर में भी ऐसे कार्यक्रम बढ़े हैं और इसके साथ ही ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ तनाव और घटनाएं भी बढ़ी हैं. 

2025 में कांकेर जिले के कई गांवों में ऐसे बोर्ड लगाए गए, जिनमें ईसाई पादरियों और बाहरी ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है.  इन बोर्डों में पेसा कानून की धारा 4(d) का हवाला दिया गया, जो ग्राम सभा को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार देती है.  स्थानीय प्रशासन ने भी इन कदमों को आदिवासी संस्कृति बचाने के प्रयास के रूप में सही ठहराया है.

इन प्रतिबंधों को अदालत में चुनौती दी गई, जहां याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह संविधान के तहत मिले धर्म और आवागमन के अधिकारों का उल्लंघन है.  हालांकि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इन बोर्डों को असंवैधानिक मानने से इनकार कर दिया और कहा कि ये आदिवासी हितों की रक्षा के लिए लगाए गए हैं. बाद में फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन याचिकाओं को खारिज कर दिया और शिकायतों को ग्राम सभा और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर उठाने की बात कही. 

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई जगहों पर ईसाई बने आदिवासियों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. उन्हें गांवों से निकालना, दुकानों से सामान न देना, सरकारी योजनाओं से वंचित करना, खेती करने से रोकना और यहां तक कि मृतकों को गांव में दफनाने से रोकने जैसी घटनाएं सामने आई हैं. कुछ ग्राम सभाओं ने ऐसे प्रस्ताव भी पारित किए हैं जिनमें ईसाइयों को किसी भी तरह की मदद न देने की बात कही गई है. 

इसका असर लोगों की ज़मीन और आजीविका पर भी पड़ा है. कुछ मामलों में ईसाई बने लोगों की ज़मीन पर उनका अधिकार खत्म करने की कोशिश की गई. उदाहरण के तौर पर, एक व्यक्ति को गांव से निकाल दिया गया और उसकी ज़मीन ग्राम सभा के क़ब्ज़े में ले ली गई. अब वह दिहाड़ी मज़दूरी कर रहा है और बेघर हो चुका है. 

गांवों में इस मुद्दे को लेकर गहरे मतभेद भी हैं. कुछ ग्रामीणों का मानना है कि धर्म परिवर्तन के बाद लोग पारंपरिक देवी-देवताओं और त्योहारों से दूरी बना लेते हैं, जिससे सामाजिक एकता प्रभावित होती है. वहीं ईसाई समुदाय का कहना है कि उन्हें ही समाज से अलग किया जा रहा है और उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. 

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई परिवारों को अपना गांव छोड़कर शहरों के बाहरी इलाकों में अस्थायी झोपड़ियों में रहना पड़ रहा है. कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें मारपीट कर घरों से बाहर निकाला गया. एक मामले में तो ग्राम सभा ने लोगों को चेतावनी दी कि अगर वे ईसाई परिवारों से बात करेंगे तो उन्हें जुर्माना देना होगा. 

दिसंबर 2025 में एक गंभीर घटना में, एक व्यक्ति को अपने ही पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोक दिया गया क्योंकि वह ईसाई बन चुका था. बाद में उसके घर और एक चर्च को जला दिया गया। इस घटना के बाद उसका परिवार लापता बताया गया. 

कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेसा कानून का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जा रहा है. जब खनन, जंगल कटाई या भूमि अधिग्रहण जैसे मामलों में ग्राम सभा की सहमति ज़रूरी होती है, तब इस कानून की अनदेखी की जाती है. लेकिन धर्म परिवर्तन के मामलों में इसे सख्ती से लागू किया जा रहा है. 

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आदिवासी समुदाय अपनी अलग धार्मिक पहचान की मांग कर रहे हैं, जैसे कोया पुनेम, सरना और डोनी पोलो. हालांकि कुछ राजनीतिक नेताओं का मानना है कि आदिवासी हिंदू धर्म का ही हिस्सा हैं. गांवों में इस विषय को लेकर भ्रम भी देखा गया. कुछ लोग आदिवासी धर्म और हिंदू धर्म को एक मानते हैं, जबकि कुछ अपनी अलग पहचान पर जोर देते हैं. 

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