अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान नहीं, मृत्यु पर समान लाभ का दावा नहीं कर सकते: केंद्र ने अदालत से कहा

केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में पिछले सप्ताह दायर एक हलफनामे में सूचित किया है कि युद्ध या ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने की स्थिति में, अग्निवीर अपने परिजनों के लिए पेंशन लाभ के मामले में नियमित सैनिकों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते. यह हलफनामा एक मृतक अग्निवीर की माँ द्वारा दायर याचिका के जवाब में दिया गया है.

‘पीटीआई’ के मुताबिक, मुरली नायक पिछले साल 9 मई को जम्मू-कश्मीर के पुंछ में तब शहीद हो गए थे, जब पाकिस्तान सेना ने भारी सीमा पार गोलाबारी और मोर्टार हमले किए थे. यह हमला भारत द्वारा अप्रैल में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले (जिसमें 26 लोग मारे गए थे) के जवाब में शुरू किए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान हुआ था. उनकी माँ, ज्योतिबाई नायक की याचिका में तर्क दिया गया था कि अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान ही कर्तव्यों का पालन करते हैं और समान जोखिमों का सामना करते हैं, फिर भी इस अल्पकालिक भर्ती योजना के तहत भर्ती किए गए लोगों के परिवारों को दीर्घकालिक पेंशन और अन्य कल्याणकारी लाभों से वंचित रखा जाता है.

अधिवक्ता संदेश मोरे, हेमंत घाडीगांवकर और हितेंद्र गांधी के माध्यम से पिछले साल दायर इस याचिका में कहा गया था कि केंद्र की 'अग्निपथ योजना' अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच एक "मनमाना" अंतर पैदा करती है. याचिका में परिवार को पूर्ण मृत्यु लाभ देने से इनकार करने को "भेदभावपूर्ण" बताते हुए सवाल उठाए गए थे. सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि अग्निवीर नियमित सैनिकों की तरह "समान स्थिति" में नहीं हैं. सरकार ने कहा कि जहाँ अग्निवीरों को चार साल की निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है, वहीं सशस्त्र बलों में पेंशन लाभ और अन्य उपलब्धियाँ दीर्घकालिक सेवा से जुड़ी होती हैं.

सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, "अलग-अलग श्रेणियों के व्यक्तियों के बीच कोई समानता नहीं हो सकती. यह वर्गीकरण और भेदभाव अग्निपथ योजना के उद्देश्यों के साथ एक तर्कसंगत संबंध रखता है और इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत संवैधानिक रूप से वैध है."

इसमें आगे कहा गया कि जहाँ 'सेना अधिनियम' सैन्य बलों के लिए ऐतिहासिक और कानूनी आधार प्रदान करता है, वहीं अग्निपथ नीति वर्तमान समय की राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए तैयार किया गया एक आधुनिक विधायी और कार्यकारी विकास है.

हलफनामे में कहा गया कि योजना के सेवा नियमों और शर्तों को स्वीकार करने के बाद, मृतक अग्निवीर की माँ अब अग्निवीर श्रेणी पर नियमित सैनिकों के सेवा लाभों को भूतलक्षी रूप से लागू करने की मांग नहीं कर सकती हैं.

इसमें रेखांकित किया गया कि अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच का वर्गीकरण 'सुस्पष्ट अंतर' पर आधारित है, जिसमें सेवा का कार्यकाल, नियुक्ति की प्रकृति और भर्ती की शर्तें शामिल हैं. सशस्त्र बलों के लिए नई अग्निपथ योजना के माध्यम से व्यक्तियों की भर्ती करने का केंद्र का निर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से लिया गया एक नीतिगत निर्णय है.

सरकार ने याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए कहा कि राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से संबंधित ऐसे नीतिगत निर्णयों की न्यायिक समीक्षा सीमित होती है. सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता इस "गलत धारणा" में थीं कि अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान पेंशन लाभ के हकदार हैं.

हलफनामे में कहा गया कि अग्निपथ योजना में मृतक अग्निवीर के परिजनों को पारिवारिक पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं है. सरकार ने तर्क दिया कि अग्निपथ योजना का उद्देश्य एक "युवा, फुर्तीली और तकनीकी रूप से उन्नत" सशस्त्र बल बनाए रखना है, और इस योजना की संवैधानिक वैधता को दिल्ली उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले ही बरकरार रखा जा चुका है.

हलफनामे में कहा गया कि सीमा की विशिष्ट स्थिति, निरंतर खतरों और शत्रुतापूर्ण पड़ोसी देशों द्वारा सीमाओं में घुसपैठ की कोशिशों को देखते हुए, भारत को एक ऐसी विशिष्ट सेना की आवश्यकता है जो सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए ऐसी शत्रुता, घुसपैठ, छद्म युद्ध और आक्रमणों से निपट सके.

इसमें आगे जोड़ा गया कि मुरली नायक को 'बैटल कैजुअल्टी' (युद्ध हताहत) और 'किल्ड इन एक्शन' (कार्रवाई में शहीद) घोषित किया गया था और सशस्त्र बलों में "शहीद" शब्द का उपयोग नहीं किया जाता है.

हलफनामे में कहा गया कि याचिकाकर्ता के बेटे का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया था, और उन्हें रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर से एक "हार्दिक" शोक पत्र मिला था, जैसा कि नियमित सैनिकों के लिए किया जाता है.

इसमें कहा गया, "अग्निपथ योजना के तहत सभी स्वीकार्य वित्तीय और सेवा-समाप्ति लाभ विधिवत रूप से याचिकाकर्ता को वितरित कर दिए गए हैं. कुल मुआवजे की राशि लगभग ₹2.3 करोड़ है, जिसमें बीमा कवर और मुआवजा शामिल है."

अंत में कहा गया कि इसलिए याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है. इस याचिका पर 18 जून को सुनवाई होगी.

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