हाईवे विस्तार की भेंट चढ़ रहे कश्मीर के विरासत चिनार, जो हैं कश्मीरी पहचान का प्रतीक

कश्मीर की पहचान सिर्फ उसकी बर्फ़, झीलों और पहाड़ों से नहीं बनती. वहां की आत्मा उन विशाल चिनार पेड़ों में भी बसती है, जिनकी छांव में पीढ़ियां बड़ी हुईं, जिनके नीचे गांवों ने सांस ली और जिनकी लाल होती पत्तियों ने सदियों से घाटी को रंग दिया. लेकिन अब वही चिनार तेजी से गायब हो रहे हैं.

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, उत्तर कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के गणपोरा गांव में रहने वाले 51 वर्षीय अब्दुल रशीद भट के लिए 23 अप्रैल 2026 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक निजी शोक का दिन है. उनके घर के सामने खड़ा दशकों पुराना विशाल चिनार, जिसे गांव वाले मिलन की जगह मानते थे, NH-701 हाईवे चौड़ीकरण परियोजना के दौरान काट दिया गया.

भट बताते हैं कि गर्मियों में उनका दिन उसी पेड़ की छांव में नमकीन नून चाय पीते हुए शुरू होता था. खेतों से लौटते मजदूर वहीं आराम करते, बच्चे उसकी जड़ों पर खेलते और धान के मौसम में किसान वहीं बैठकर खाना खाते थे. पतझड़ में उसकी लाल पत्तियां पूरे इलाके को ढक देती थीं.

अब वहां सिर्फ एक ठूंठ बचा है.

भट कहते हैं, “जब पेड़ कटा तो लगा जैसे घर का एक हिस्सा खत्म हो गया. अब धूप सीधे खेतों पर पड़ती है. गर्मी बढ़ गई है, लेकिन उससे ज्यादा दर्द उस खालीपन का है.”

विकास की कीमत पर पर्यावरण

कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर हाईवे विस्तार, रिंग रोड, रेलवे और “स्मार्ट सिटी” परियोजनाएं शुरू हुई हैं. सरकार इन्हें आधुनिक विकास और बेहतर कनेक्टिविटी का हिस्सा बताती है. लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि इस विकास की सबसे बड़ी कीमत घाटी की पारंपरिक पारिस्थितिकी चुका रही है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1970 के दशक में कश्मीर में 42 हजार से अधिक चिनार पेड़ थे. 2021 तक यह संख्या करीब 40 हजार रह गई. अब सरकारी “ट्री आधार” परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक सैयद तारिक का अनुमान है कि जम्मू-कश्मीर में सिर्फ 32 से 33 हजार चिनार बचे हैं. यानी पांच वर्षों में लगभग 8 हजार चिनार खत्म हो चुके हैं.

सिर्फ श्रीनगर रिंग रोड परियोजना के दौरान 2018 से 2021 के बीच 1.1 लाख से अधिक पेड़ काटे गए, जिनमें सेब, अखरोट, शहतूत और चिनार शामिल थे.

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि कागजों में संरक्षण के कानून मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर विकास परियोजनाओं के सामने सब कमजोर पड़ जाते हैं.

सिर्फ पेड़ नहीं, संस्कृति भी

चिनार कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहे हैं. मुगल गार्डनों, दरगाहों, गांवों और पुरानी सड़कों के किनारे ये पेड़ सदियों से खड़े हैं. इन्हें जम्मू-कश्मीर भूमि राजस्व अधिनियम 1939 के तहत “रॉयल ट्री” का दर्जा मिला हुआ है. इनके काटने पर कानूनी रोक भी है.

फिर भी पर्यावरण कार्यकर्ता राजा मुजफ्फर भट का आरोप है कि “प्रूनिंग” यानी शाखाएं काटने की अनुमति का इस्तेमाल धीरे-धीरे पूरे पेड़ हटाने के लिए किया जा रहा है.

वे कहते हैं, “पहले भारी कटाई की जाती है, फिर पेड़ को असुरक्षित घोषित कर दिया जाता है और आखिर में उसे पूरी तरह काट दिया जाता है.”

उनका कहना है कि अगर जम्मू-कश्मीर में वर्षों पहले वृक्ष प्रत्यारोपण कानून बना होता, तो कई पुराने पेड़ों को दूसरी जगह स्थानांतरित किया जा सकता था.

बदलता मौसम, बढ़ती गर्मी

चिनारों की कटाई ऐसे समय में हो रही है जब कश्मीर जलवायु संकट का सामना कर रहा है. घाटी में तापमान लगातार बढ़ रहा है. 2025 में श्रीनगर ने पिछले कई दशकों के सबसे गर्म दिन दर्ज किए. जून का औसत तापमान सामान्य से लगभग तीन डिग्री ज्यादा था.

कश्मीर में बर्फबारी कम हो रही है, बारिश घट रही है और सूखे जैसे हालात बढ़ रहे हैं. जनवरी-फरवरी 2025 में लगभग 80 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई.

पुलवामा की स्कूल शिक्षिका शबनम जान कहती हैं, “पहले सड़कें पेड़ों की वजह से ठंडी रहती थीं. अब सड़कें चौड़ी हो गई हैं, लेकिन दोपहर में उन पर चलना मुश्किल हो गया है.”

श्रीनगर के पास रहने वाले दुकानदार गुलाम नबी डार कहते हैं, “अब ज्यादा धूल है, ज्यादा तेज धूप है और पक्षी भी कम दिखाई देते हैं.”

क्यूआर कोड से संरक्षण?

2025 में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने चिनारों को बचाने के लिए “डिजिटल संरक्षण” अभियान शुरू किया. हर पेड़ पर क्यूआर कोड लगाकर उसकी लोकेशन, उम्र और अन्य जानकारी दर्ज की जा रही है.

सरकार ने इसे ऐतिहासिक संरक्षण पहल बताया. करीब 29 हजार पेड़ों को जियो-टैग किया जा चुका है.

लेकिन लोगों का सवाल है कि अगर वही पेड़ विकास परियोजनाओं में काटे जा रहे हैं, तो इस डिजिटल रिकॉर्ड का क्या मतलब?

श्रीनगर के पर्यावरण शोधकर्ता फ़ैयाज़ अहमद कहते हैं, “सरकार तकनीक आधारित संरक्षण दिखाना चाहती है, लेकिन संरक्षण सिर्फ फोटो, प्रेस रिलीज और पर्यटन विज्ञापनों से नहीं होता.”

गांवों की लड़ाई

अनंतनाग जिले के मट्टन इलाके में एक सदियों पुराने चिनार को सड़क विस्तार परियोजना में हटाने की योजना बनी थी. लेकिन गांव वालों ने विरोध किया और आखिरकार सड़क की दिशा थोड़ी बदलनी पड़ी.

गांव के किसान बशीर अहमद वानी कहते हैं, “यह सिर्फ लकड़ी नहीं है. इसमें गांव की यादें हैं.”

23 वर्षीय छात्रा इंशा मुश्ताक कहती हैं, “हर कश्मीरी परिवार की यादें चिनार से जुड़ी हैं — शादी, पिकनिक, बचपन की तस्वीरें. जब ये पेड़ खत्म होते हैं तो कश्मीर अपनी पहचान खोने लगता है.”

सवाल सिर्फ विकास का नहीं

असल बहस यह नहीं कि विकास होना चाहिए या नहीं. सवाल यह है कि क्या विकास टिकाऊ तरीके से हो रहा है?

एक 300 साल पुराने चिनार को काटकर उसकी जगह छोटा पौधा लगाना सिर्फ प्रतीकात्मक भरपाई है. वह न तो वही छांव दे सकता है, न वही पारिस्थितिकी और न ही वही सांस्कृतिक स्मृति.

कश्मीर में आज चिनार सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि उस संघर्ष का प्रतीक बन चुके हैं जिसमें एक तरफ तेज विकास मॉडल है और दूसरी तरफ एक ऐसी विरासत, जो धीरे-धीरे सड़क किनारे कटती जा रही है.

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