जाति, उत्तर-दक्षिण और कुपोषण: भारत के बच्चों की सेहत में छिपी सामाजिक खाई

स्क्रोल के मुताबिक, भारत में बाल कुपोषण सिर्फ गरीबी या भोजन की कमी का संकट नहीं है, बल्कि यह देश की गहरी सामाजिक संरचनाओं का भी आईना है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, देश में पाँच साल से कम उम्र के लगभग एक-तिहाई बच्चे ठिगनेपन यानी अवरुद्ध शारीरिक विकास का शिकार हैं. यह स्थिति केवल बच्चों की लंबाई तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके मानसिक विकास, शिक्षा और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को भी प्रभावित करती है.

लेकिन यह समस्या सभी समुदायों में समान नहीं है. अनुसूचित जाति के बच्चों में कुपोषण और ठिगनेपन की दर लंबे समय से अधिक पाई जाती रही है. अब एक नए शोध ने इस असमानता को भारत के ऐतिहासिक उत्तर-दक्षिण विभाजन और जातिगत भेदभाव से जोड़ते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है. क्या सामाजिक भेदभाव बच्चों की सेहत तय कर रहा है?

जर्नल ऑफ इकनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकाशित इस शोध ने विंध्य पर्वतमाला को अध्ययन का आधार बनाया. इतिहास में विंध्य को उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक तथा सामाजिक सीमा माना जाता रहा है. शोधकर्ताओं का तर्क है कि विंध्य के उत्तर में जाति व्यवस्था और छुआछूत की परंपराएँ सामाजिक जीवन में अधिक गहराई से मौजूद रही हैं, जबकि दक्षिण भारत में इनकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम रही.

इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने विंध्य के दोनों ओर रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य आँकड़ों की तुलना की. परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे.

उच्च जाति के हिंदू बच्चों में उत्तर और दक्षिण के बीच कोई खास अंतर नहीं मिला. लेकिन अनुसूचित जाति के बच्चों के मामले में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. विंध्य के दक्षिण में रहने वाले अनुसूचित जाति के बच्चों में ठिगनेपन की दर काफी कम थी और उनकी औसत लंबाई भी उत्तर भारत के बच्चों से बेहतर पाई गई.

शोध के अनुसार, दक्षिण भारत में रहने वाले अनुसूचित जाति के बच्चे औसतन अधिक लंबे पाए गए और उनमें ठिगनेपन की संभावना लगभग 7 से 8 प्रतिशत कम थी. यह अंतर मामूली नहीं है, क्योंकि भारत में कुल ठिगनेपन की दर पहले से ही बहुत अधिक है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इस अंतर को केवल आर्थिक कारणों से जोड़ने से इनकार किया है. उन्होंने गरीबी, शिक्षा, स्वच्छता, पानी, मातृ स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों जैसे कई कारकों की जाँच की. इन सभी का प्रभाव तो दिखा, लेकिन वे उत्तर-दक्षिण अंतर को पूरी तरह नहीं समझा सके.

यानी केवल पैसा या सरकारी योजनाएँ ही इस समस्या का पूरा उत्तर नहीं हैं.

शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जिन समुदायों का इतिहास जातिगत भेदभाव से जुड़ा रहा है, उन्हीं में यह उत्तर-दक्षिण अंतर स्पष्ट दिखाई देता है. उदाहरण के तौर पर, दलित मुसलमानों में भी इसी तरह का पैटर्न मिला, जबकि अन्य आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन जातिगत रूप से अलग समूहों में ऐसा अंतर नहीं दिखा.

यह निष्कर्ष भारत के सामाजिक ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. क्या आज भी जातिगत अपमान, सामाजिक दूरी और भेदभाव बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य तक को प्रभावित कर रहे हैं? क्या सामाजिक सम्मान और बराबरी की कमी का असर बच्चों की थाली तक पहुँच रहा है?

दरअसल, कुपोषण केवल कैलोरी का प्रश्न नहीं है. यह इस बात से भी जुड़ा है कि समाज किन समुदायों को कितना सम्मान, अवसर और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुँच देता है. अगर किसी समुदाय को लगातार हाशिए पर रखा जाएगा, तो उसका असर आने वाली पीढ़ियों के शरीर और दिमाग दोनों पर पड़ेगा.

इसीलिए यह शोध केवल स्वास्थ्य का अध्ययन नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आईना है. यह बताता है कि बाल कुपोषण से लड़ाई केवल राशन, आंगनवाड़ी और अस्पतालों से नहीं जीती जा सकती. इसके लिए सामाजिक भेदभाव, जातिगत असमानता और छुआछूत जैसी गहरी संरचनाओं को भी चुनौती देनी होगी.

भारत अगर वास्तव में “पोषित भारत” बनना चाहता है, तो उसे बच्चों के शरीर के साथ-साथ समाज की सोच को भी स्वस्थ करना होगा.

यह लेख अश्विनी देशपांडे और राजेश रामचंद्रन द्वारा लिखा गया है. अश्विनी देशपांडे अशोका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग की प्रमुख और सेंटर फॉर इकनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस की शैक्षणिक निदेशक हैं, जबकि राजेश रामचंद्रन मोनाश विश्वविद्यालय मलेशिया से जुड़े हुए हैं. पूरी लेख यहाँ पढ़ी जा सकती है.

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