गुटों को एक इकाई में एकजुट करना ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है

सत्य हिंदी के सह-संस्थापक और पत्रकार, लेखक आशुतोष ने ‘फ्री प्रेस जर्नल’ में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के हालिया विभाजन, क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर संकट और भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति का गहन विश्लेषण किया है, जिसका हिंदी में अनुदित सारांश कहता है:

पश्चिम बंगाल के बाद अब टीएमसी संसदीय दल भी औपचारिक रूप से विभाजित हो चुका है. यह विभाजन बेहद जटिल है क्योंकि टीएमसी दो स्तरों पर टूटी है: राज्य स्तर पर: कोलकाता का विद्रोही गुट खुद को 'असली टीएमसी' बता रहा है और ममता बनर्जी को अपना मुख्य सलाहकार मानता है. राष्ट्रीय स्तर पर: यह गुट 'नेशनल सिटीजन्स पार्टी' (एनसीपी) नामक एक नई इकाई में विलीन हो गया है, जिसका ममता बनर्जी से कोई सीधा संबंध नहीं है. ममता गुट: वर्तमान में ममता बनर्जी के साथ केवल मुट्ठी भर विधायक और सांसद बचे हैं.

आशुतोष का स्पष्ट मानना है कि टीएमसी का यह पतन भाजपा के इशारे पर हुआ है. राष्ट्रीय स्तर का विद्रोही गुट एनडीए को समर्थन दे रहा है, लेकिन कोलकाता गुट के सामने खुद को राज्य में मुख्य विपक्ष साबित करने की बड़ी चुनौती है. यदि वे भाजपा और सुवेंदु अधिकारी के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो वे अपनी विश्वसनीयता खो देंगे और विपक्ष का स्थान कांग्रेस, वामपंथ या ममता गुट के पास चला जाएगा.

भाजपा का 'विन-विन' परिदृश्य और क्षेत्रीय दलों का भय

भाजपा के लिए यह स्थिति पूरी तरह से फायदेमंद है. ममता बनर्जी जैसी तीन बार की ताकतवर मुख्यमंत्री की पार्टी को ताश के पत्तों की तरह बिखेरकर भाजपा ने पूरे 'इंडिया' गठबंधन को कड़ा संदेश दिया है.  इससे क्षेत्रीय दलों में अस्तित्व का डर पैदा हो गया है. दलबदल के इसी डर के कारण उद्धव ठाकरे की बुलाई बैठक में सभी सांसद नहीं पहुंचे, और अखिलेश यादव ने यहाँ तक कह दिया कि यदि भाजपा दोबारा जीती, तो यह देश का आखिरी चुनाव होगा.

विश्लेषण में तर्क है कि 24 से अधिक बिखरे हुए दलों के बजाय विपक्ष को दलबदल से बचने के लिए तीन मुख्य वैचारिक मंचों के तहत एकजुट होना चाहिए:

कांग्रेस का मंच: जो दल पहले कांग्रेस से अलग हुए थे—जैसे ममता की टीएमसी, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा—उन्हें वापस कांग्रेस में विलय कर लेना चाहिए ताकि वे सुरक्षित और मजबूत हो सकें.

समाजवादी मंच: 1989 के पुराने 'जनता दल' की तरह राजद (आरजेडी), सपा (समाजवादी पार्टी) और बीजद (बीजेडी) जैसी बिखरी हुई समाजवादी ताकतों को आपस में लड़ने के बजाय एक छत के नीचे आना चाहिए.

वामपंथी मंच: वामपंथी दलों को अपने पुराने मतभेद भुलाकर 1960 के दशक की तरह फिर से एकजुट हो जाना चाहिए.

आशुतोष के अनुसार, 24 अलग-अलग पार्टियों के मुकाबले इन तीन वैचारिक समूहों के बीच समन्वय करना बहुत आसान होगा. ये तीनों मिलकर 'प्रतिरोध के अग्रदूत' का निर्माण कर सकते हैं. वह राहुल गांधी की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं कि क्या वे भाजपा से लड़ने के पारंपरिक तरीके को छोड़कर इन तीन मंचों और एक समन्वय समिति को आकार देने की पहल करेंगे? यह आज की राजनीति का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है.

(यह आशुतोष के लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ सकते हैं.)

 

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